गुणवत्ता परक जीवन की दिशा में काम हो
केंद्र की मोदी सरकार का आखिरी बजट संतुलित मगर चुनावी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि हर राजनीतिक दल चुनाव में लाभ लेने के लिए झूठे-सच्चे वादे करता है। बजट में घाटे को संतुलित रखते हुए मौजूदा 3.3 फीसदी के सापेक्ष घाटा 3.4 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान दिया गया है। बजट में जो लोकलुभावन घोषणाएं की गई हैं, उनसे भी वित्तीय संतुलन बिगड़ने का कोई खतरा नहीं है। छोटे किसानों, मजदूरों और मुलाजिमों के साथ ही महिलाओं को आकर्षित करने वाला बजट बना है। एक सच यह भी है कि इन रियायतों से किसी को भी बहुत फायदा नहीं मिलेगा, मगर बहुतायत वोटरों के चेहरे पर उम्मीद के भाव जरूर दिखने लगे हैं। यह एक कुशल रणनीति का परिचायक है। बजट का प्रस्ताव इस तरह से बना है कि ‘हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा’। इस परिपक्कता की परिणिति भी अच्छी रही और 24 घंटे तक बजट की रियायतें लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। कोई क्षेत्र को कुछ मिलने की बात कर रहा है, तो कोई आयकर सीमा में छूट को लेकर प्रफुल्लित है। किसी को खाते में रुपए आने का इंतजार है, तो किसी को कर्ज में रियायत का।
नरेंद्र मोदी सरकार की यह सफलता है कि उन्होंने अपने चार साल में पेश किए गए किसी भी बजट में कोई ऐसी रियायत नहीं दी मगर लोगों में निराशा नहीं थी। अच्छे दिनों के इतंजार में बैठे लोगों को आफत का सामना भी करना पड़ा। इन सब के बीच 2019 के अंतरिम बजट में यह उम्मीद की जा रही थी कि कुछ बड़ी घोषणाएं होंगी, हुर्इं भी। इन घोषणाओं से कुछ वर्ग विशेष को फायदा हुआ मगर जीवन की गुणवत्ता सुधारने जैसा कुछ नहीं मिला। बजट भी इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसे अग्रमि सरकार मोदी की ही होगी। जहां किसानों को ढांचागत सुधार की उम्मीद थी, उस दिशा में कुछ नहीं किया गया। सीमांत किसानों को साल में छह हजार रुपए देने जैसी खैराती व्यवस्था की गई। यह सच है कि देश के किसानों को मदद की दरकार है मगर भीख की नहीं। जरूरत यह थी कि किसानों की उपज को तैयार करने से लेकर बेचने तक की सुविधाएं उनके ग्राम पंचायतों के स्तर पर पहुंचाने की व्यवस्था की जाती, जो नहीं हुआ। उन्हें कर्ज में फंसे रहने और फिर कुछ खैरात देकर लुभाने जैसा काम किया गया है। किसान बीमा योजना अब तक कारपोरेट बीमा कंपनियों के फायदे का सौदा साबित हुई हैं, किसानों के नहीं। निश्चित रूप से पिछले पौने पांच सालों में सरकार ने तमाम सुधारों की दिशा में काम किया है मगर नतीजे अब तक नकारात्मकता के रहे हैं।
सरकार ने पिछले चार सालों में आयकर सीमा में रियायत देने का कोई प्रावधान नहीं किया गया था, जिसको एक बार में ही पांच लाख करके सियासी दांव खेला गया है। चुनावी साल में यह सौगात वोटबैंक में बदलने की कोशिश मात्र है। इस रियायत के साथ जो शर्तें लगी हैं, वो इसका उतना लाभ नहीं होने देंगी, जितना दिखाया जा रहा है। मध्यम वर्ग खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वहीं सबसे बड़ी समस्या युवाओं के समक्ष खड़ी हुई है। उनको रोजगार कैसे मिले और जो रोजगार में हैं, वह कैसे बचा रहे, इसके बारे में कोई व्यवस्था नहीं होना दिशाहीन होते युवाओं के लिए संकटों के मकड़जाल में उलझाने वाला है। लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए कर्ज में रियायत की गई है मगर उनको जरूरत की सुविधाएं दिए जाने के बारे में बजट मौन है। इस वर्ग को कर्ज से अधिक सुविधाओं की जरूरत थी। सरकारी तंत्र के जाल से मुक्ति की आवश्यकता सबसे अधिक इन्हें ही थी, जिस पर काम नहीं किया गया। देश में सबसे अधिक रोजगार इसी क्षेत्र में मिलता है। रोजगार देने वालों को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी सरकार ने कुछ नहीं किया है। हर साल देश में 50 लाख से अधिक व्यवसायिक शिक्षा से युक्त युवा बेरोजगारों की लिस्ट में नाम दर्ज करा रहे हैं।
कौशल विकास को लेकर सरकार पिछले कई सालों से ढिंढोरा पीट रही है मगर चिंता का विषय यह है कि जो युवा कौशल से परिपूर्ण हो चुके हैं, उनके लिए रोजगार कहां है? करोड़ों नौकरियों का वादा सरकार करती रही है मगर उस दिशा में भी वह आगे नहीं बढ़ सकी। केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों में नौकरियों में कटौती करके बजट को संतुलित किया गया है। बीमार सरकारी उद्यमों को स्वस्थ बनाकर रोजगार देने की बातें भी हवा में रह गर्इं। निजी और कारपोरेट सेक्टर में शोषण का शिकार हो रहे युवाओं के लिए भी कोई सार्थक पहल नहीं की गई है। ग्रामीण कुटीर उद्योगों के लिए भी कोई व्यवस्था बजट में नहीं होने से निराशा हुई है। किसान को कृषि आय के साथ ग्रामीण उद्योगों की आय का सहारा मिले तो उन्हें किसी भी खैरात की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। मोदी सरकार ने सीधे तौर पर छह करोड़ मतदाताओं को ध्यान में रखकर आयकर और सीमांत किसानों को नकद छह हजार रुपए देने का प्रस्ताव किया है। हालांकि इसमें भी 30 फीसदी से अधिक किसान और करदाता फायदा नहीं ले पाएंगे। ध्यान से देखें, तो लगता है कि सरकार ने पिछले कुछ सालों में बहुत सी घोषणाएं चुनावी बजट के लिए रोक रखी थीं।
देश का नागरिक, उद्यमी और भविष्य जीएसटी, आयकर सहित अन्य तमाम तरह के करों के जाल में फंसा हुआ है। विश्व के किसी भी समर्थ देश से तुलना करें तो भारतीय किसी से कम टैक्स नहीं देते हैं। इतना अधिक टैक्स देने के बाद भी उसको सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं मिलती, जबकि हम कल्याणकारी राज्य होने का दम भरते हैं। मोदी सरकार से उम्मीद की जाती थी कि वह देश के नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा और युवाओं को रोजगार के सुयोग्य अवसर देकर जीवन की गुणवत्ता बढ़ाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी इसके वादे किए गए थे। इसके लिए 60 महीने का वक्त मोदी ने अपनी हर चुनावी सभा में मांगा था मगर क्या हुआ और क्या मिला, यह यक्ष प्रश्न है। सरकार ने अंतत: वोटबैंक बनाने की दिशा में ही फैसले लिए, जो इस बजट से स्पष्ट होता है। मोदी सरकार से व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव की उम्मीद की गई थी मगर वह नहीं हुआ। ईश्वर करे, मोदी सरकार एक बार फिर से सत्ता संभाले किंतु उसे याद रखना होगा कि वोटबैंक की नहीं जनहित की राजनीति ही इतिहास में स्वर्णिम पन्ना बनाती है। इस दिशा में सजगता से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं हुआ तो सत्ता बदलाव निरर्थक समझा जाएगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
केंद्र की मोदी सरकार का आखिरी बजट संतुलित मगर चुनावी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि हर राजनीतिक दल चुनाव में लाभ लेने के लिए झूठे-सच्चे वादे करता है। बजट में घाटे को संतुलित रखते हुए मौजूदा 3.3 फीसदी के सापेक्ष घाटा 3.4 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान दिया गया है। बजट में जो लोकलुभावन घोषणाएं की गई हैं, उनसे भी वित्तीय संतुलन बिगड़ने का कोई खतरा नहीं है। छोटे किसानों, मजदूरों और मुलाजिमों के साथ ही महिलाओं को आकर्षित करने वाला बजट बना है। एक सच यह भी है कि इन रियायतों से किसी को भी बहुत फायदा नहीं मिलेगा, मगर बहुतायत वोटरों के चेहरे पर उम्मीद के भाव जरूर दिखने लगे हैं। यह एक कुशल रणनीति का परिचायक है। बजट का प्रस्ताव इस तरह से बना है कि ‘हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा’। इस परिपक्कता की परिणिति भी अच्छी रही और 24 घंटे तक बजट की रियायतें लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। कोई क्षेत्र को कुछ मिलने की बात कर रहा है, तो कोई आयकर सीमा में छूट को लेकर प्रफुल्लित है। किसी को खाते में रुपए आने का इंतजार है, तो किसी को कर्ज में रियायत का।
नरेंद्र मोदी सरकार की यह सफलता है कि उन्होंने अपने चार साल में पेश किए गए किसी भी बजट में कोई ऐसी रियायत नहीं दी मगर लोगों में निराशा नहीं थी। अच्छे दिनों के इतंजार में बैठे लोगों को आफत का सामना भी करना पड़ा। इन सब के बीच 2019 के अंतरिम बजट में यह उम्मीद की जा रही थी कि कुछ बड़ी घोषणाएं होंगी, हुर्इं भी। इन घोषणाओं से कुछ वर्ग विशेष को फायदा हुआ मगर जीवन की गुणवत्ता सुधारने जैसा कुछ नहीं मिला। बजट भी इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसे अग्रमि सरकार मोदी की ही होगी। जहां किसानों को ढांचागत सुधार की उम्मीद थी, उस दिशा में कुछ नहीं किया गया। सीमांत किसानों को साल में छह हजार रुपए देने जैसी खैराती व्यवस्था की गई। यह सच है कि देश के किसानों को मदद की दरकार है मगर भीख की नहीं। जरूरत यह थी कि किसानों की उपज को तैयार करने से लेकर बेचने तक की सुविधाएं उनके ग्राम पंचायतों के स्तर पर पहुंचाने की व्यवस्था की जाती, जो नहीं हुआ। उन्हें कर्ज में फंसे रहने और फिर कुछ खैरात देकर लुभाने जैसा काम किया गया है। किसान बीमा योजना अब तक कारपोरेट बीमा कंपनियों के फायदे का सौदा साबित हुई हैं, किसानों के नहीं। निश्चित रूप से पिछले पौने पांच सालों में सरकार ने तमाम सुधारों की दिशा में काम किया है मगर नतीजे अब तक नकारात्मकता के रहे हैं।
सरकार ने पिछले चार सालों में आयकर सीमा में रियायत देने का कोई प्रावधान नहीं किया गया था, जिसको एक बार में ही पांच लाख करके सियासी दांव खेला गया है। चुनावी साल में यह सौगात वोटबैंक में बदलने की कोशिश मात्र है। इस रियायत के साथ जो शर्तें लगी हैं, वो इसका उतना लाभ नहीं होने देंगी, जितना दिखाया जा रहा है। मध्यम वर्ग खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वहीं सबसे बड़ी समस्या युवाओं के समक्ष खड़ी हुई है। उनको रोजगार कैसे मिले और जो रोजगार में हैं, वह कैसे बचा रहे, इसके बारे में कोई व्यवस्था नहीं होना दिशाहीन होते युवाओं के लिए संकटों के मकड़जाल में उलझाने वाला है। लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए कर्ज में रियायत की गई है मगर उनको जरूरत की सुविधाएं दिए जाने के बारे में बजट मौन है। इस वर्ग को कर्ज से अधिक सुविधाओं की जरूरत थी। सरकारी तंत्र के जाल से मुक्ति की आवश्यकता सबसे अधिक इन्हें ही थी, जिस पर काम नहीं किया गया। देश में सबसे अधिक रोजगार इसी क्षेत्र में मिलता है। रोजगार देने वालों को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी सरकार ने कुछ नहीं किया है। हर साल देश में 50 लाख से अधिक व्यवसायिक शिक्षा से युक्त युवा बेरोजगारों की लिस्ट में नाम दर्ज करा रहे हैं।
कौशल विकास को लेकर सरकार पिछले कई सालों से ढिंढोरा पीट रही है मगर चिंता का विषय यह है कि जो युवा कौशल से परिपूर्ण हो चुके हैं, उनके लिए रोजगार कहां है? करोड़ों नौकरियों का वादा सरकार करती रही है मगर उस दिशा में भी वह आगे नहीं बढ़ सकी। केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों में नौकरियों में कटौती करके बजट को संतुलित किया गया है। बीमार सरकारी उद्यमों को स्वस्थ बनाकर रोजगार देने की बातें भी हवा में रह गर्इं। निजी और कारपोरेट सेक्टर में शोषण का शिकार हो रहे युवाओं के लिए भी कोई सार्थक पहल नहीं की गई है। ग्रामीण कुटीर उद्योगों के लिए भी कोई व्यवस्था बजट में नहीं होने से निराशा हुई है। किसान को कृषि आय के साथ ग्रामीण उद्योगों की आय का सहारा मिले तो उन्हें किसी भी खैरात की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। मोदी सरकार ने सीधे तौर पर छह करोड़ मतदाताओं को ध्यान में रखकर आयकर और सीमांत किसानों को नकद छह हजार रुपए देने का प्रस्ताव किया है। हालांकि इसमें भी 30 फीसदी से अधिक किसान और करदाता फायदा नहीं ले पाएंगे। ध्यान से देखें, तो लगता है कि सरकार ने पिछले कुछ सालों में बहुत सी घोषणाएं चुनावी बजट के लिए रोक रखी थीं।
देश का नागरिक, उद्यमी और भविष्य जीएसटी, आयकर सहित अन्य तमाम तरह के करों के जाल में फंसा हुआ है। विश्व के किसी भी समर्थ देश से तुलना करें तो भारतीय किसी से कम टैक्स नहीं देते हैं। इतना अधिक टैक्स देने के बाद भी उसको सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं मिलती, जबकि हम कल्याणकारी राज्य होने का दम भरते हैं। मोदी सरकार से उम्मीद की जाती थी कि वह देश के नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा और युवाओं को रोजगार के सुयोग्य अवसर देकर जीवन की गुणवत्ता बढ़ाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी इसके वादे किए गए थे। इसके लिए 60 महीने का वक्त मोदी ने अपनी हर चुनावी सभा में मांगा था मगर क्या हुआ और क्या मिला, यह यक्ष प्रश्न है। सरकार ने अंतत: वोटबैंक बनाने की दिशा में ही फैसले लिए, जो इस बजट से स्पष्ट होता है। मोदी सरकार से व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव की उम्मीद की गई थी मगर वह नहीं हुआ। ईश्वर करे, मोदी सरकार एक बार फिर से सत्ता संभाले किंतु उसे याद रखना होगा कि वोटबैंक की नहीं जनहित की राजनीति ही इतिहास में स्वर्णिम पन्ना बनाती है। इस दिशा में सजगता से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं हुआ तो सत्ता बदलाव निरर्थक समझा जाएगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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