Saturday, April 13, 2019

स्वार्थ साधने को कानून का दुरुपयोग चिंतनीय

पल्स : अजय शुक्ल
स्वार्थ साधने को कानून का दुरुपयोग चिंतनीय
संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत बने किसी भी कानून के जरिए निर्दोषों को प्रताड़ित करने की घटनाएं चिंता का विषय होती हैं। यह गंभीर समस्या है कि कोई व्यक्ति, संगठन या पदधारक व्यक्ति निहित स्वार्थों के लिए कानून का दुरुपयोग करे। हम लोकतांत्रिक समानतावादी संवैधानिक व्यवस्था के नागरिक हैं। इस व्यवस्था में किसी भी नागरिक का किसी अन्य नागरिक द्वारा उत्पीड़न दुखद है। दुख तब होता है जब यह सामान्य रूप से नजर आता है कि किसी तरह किसी कानून की पेचीदगियों का फायदा उठाकर किसी को न सिर्फ अपमानित किया जाता है बल्कि उसको इन हालात तक लाकर खड़ा कर दिया जाता है कि वह अपने जीवन को भी खत्म करने की सोचने लगता है। आप सोचेंगे कि हम क्या चर्चा कर रहे हैं और इस वक्त यह चर्चा क्यों हो रही है तो बताते चलें कि हम देश और उसके नागरिकों की ‘पल्स’ पर ही बात करते हैं।
एक घटना इंडिया न्यूज चैनल के राजस्थान के संवाददाता दुर्गा सिंह राजपुरोहित के साथ हुई। उन्होंने बाड़मेर की एक भाजपा नेता के तमाम कारनामों का खुलासा किया तो वह खार खा गईं। उन्होंने बिहार के एक बाहुबली ठेकेदार के कारिंदे से अदालत में अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया। जज ने भी बगैर तथ्यों की जांच किए बाड़मेर पुलिस को राजपुरोहित की गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया। भाजपा नेता के दबाव में राजपुरोहित को अचानक गिरफ्तार कर रातोरात पटना ले जाया गया जैसे वह कोई आतंकवादी हों। अदालत ने उनकी बात सुने बिना ही उन्हें तत्काल जेल भेज दिया। पत्रकार संगठनों से लेकर समाज के अगुआ लोगों ने जब इसका विरोध किया और मुकदमा वादी राकेश पासवान को खोजा, लेकिन उसने अपने साथ किसी भी घटना के होने से इंकार किया। दूसरी घटना, नोएडा में सेना से सेवानिवृत्त 76 वर्षीय कर्नल वीपीएस चौहान के साथ घटी। उनके पास ही रहने वाले यूपी के एक ब्यूरोक्रेट ने अपनी पत्नी से दुर्व्यवहार करने की थाने में एससीएसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करा दी। पुलिस ने बुजुर्ग कर्नल को गिरफ्तार कर अदालत के जरिए जेल भेज दिया। अदालत ने भी पेश करते वक्त उनकी कोई बात नहीं सुनी।
इन दोनों घटनाओं में एक बड़ा वर्ग शामिल था। पीड़ित एक मामले में भाग्यशाली थे कि उनकी आवाज उठाने वाले बड़े लोग सामने आ गए। इसका नतीजा यह हुआ कि अदालतों को उनको जमानत देनी पड़ी। दोनों ही घटनाओं में अनुसूचित जाति विशेष के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने वाले कानून का दुरुपयोग सामने आया। इससे साफ है कि इस कानून का किसी तरह से निहित स्वार्थों के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। दिल्ली में कथित दलित उत्पीड़न के एक मामले की सुनवाई करते हुए एडीजे कामिनी लउ की अदालत ने कहा कि दुर्भाग्य से, इस तरह के मामलों की तादाद बढ़ती दिख रही है जिसके तहत इस अधिनियम के प्रावधानों का उपयोग उन लोगों की बेहतरी के लिए नहीं किया गया है जिनकी रक्षा के लिए यह है। बल्कि उन लोगों ने किया है जो साधारण विवाद को अधिनियम के तहत कथित अत्याचार का रंग देकर अपना व्यक्तिगत हिसाब-किताब बराबर करना चाहते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इन हालात को देखते हुए ही यह आदेश जारी किया था कि बगैर जांच प्रक्रिया पूरी किए आरोपी को गिरफ्तार न किया जाए। क्योंकि इस अधिनियम का दुरुपयोग बहुत अधिक हो रहा है। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि विधि ने जिन कानूनों को लोकहित और पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए बनाया है, उससे कैसे उनका अपने निहित स्वार्थों के लिए दुरुपयोग कर निर्दोष को पीड़ित बना दिया जाता है।
सत्तारूढ़ सियासी दल को अदालतों के वक्तव्य और तथ्य समझ नहीं आए क्योंकि उनको समझने से वह वोट बैंक प्रभावित होता दिखा जो वह हासिल करना चाहते हैं। वोट बैंक की राजनीति को कोसने वालों ने ही वोट बैंक की सियासत इस हद तक करने का फैसला किया कि कोई भी निर्दोष कभी भी अपमानित और प्रताड़ित हो सकता है। यह भी इत्तफाक है कि अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 भी इसी सियासी दल के सहयोग से बना था, जो अब पूर्ण सत्ता में है। उस वक्त हम कह सकते थे कि यह एक सराहनीय कदम है मगर अब हम यह कैसे कहें जब उसके दुरुपयोग करने की छूट सरकार ही दे रही है। हम इस अधिनियम के खिलाफ कभी नहीं थे मगर उसके दुरुपयोग के खिलाफ सदैव हैं। भारत का कोई भी नागरिक किसी जाति विशेष के कारण प्रताड़ित किया जाए, चाहे वह किसी भी जाति का हो तो ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही का प्रावधान बने। बगैर नैसार्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ कोई गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। प्राथमिक जांच के बगैर गिरफ्तारी का प्रावधान कभी दोष रहित नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी कानून मानवाधिकारों के साथ ही न्याय के सिद्धांतों को नष्ट करने वाला साबित होगा, जो न्याय नहीं बल्कि अन्याय को जन्म देता है।
हम जंगल के कानून में रहने वाले लोग नहीं है। विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं जहां हर जरूरी बात संविधान में तय है। हमारे देश में हर विषय पर कानून परिभाषित हैं। इन सब के बाद भी अगर कोई वोट बैंक और निजी स्वार्थों में ऐसे कानून बनाए जाएंगे जो न्यायिक व्यवस्था के विपरीत होंगे तो यह न केवल देश को तोड़ने वाले होंगे बल्कि इससे हमारा लोकतंत्र भी कमजोर होगा। यह भी समझना होगा कि जब सरकारी व्यवस्था ही विभेद और शोषक तंत्र का अंग होगी तब देश के नागरिकों में राष्ट्र गर्व की भावना कैसे उत्पन्न होगी। आवश्यकता यह है कि सत्तारूढ़ सियासी दल वोट बैंक की राजनीति से किनारा करके सामाजिक व्यवस्था को रचनात्मक बनाने की दिशा में काम करें। हर कानून में नैसार्गिक न्याय का पालन होना जरूरी हो, तभी देश आगे बढ़ेगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी के प्रधान संपादक हैं )

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