Saturday, April 13, 2019

शब्दों की गरिमा बनाये रखना भी जिम्मेदारी

PULSE. 

शब्दों की गरिमा बनाये रखना भी जिम्मेदारी 

हम एक घटना का जिक्र करेंगे, अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी वाराणसी से चुनाव का नामांकन करने पहुंचे। वहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में हराने वाले समाजवादी नेता राजनारायण भी पहुंच गए। राजनारायण ने कमलापति के पांव छुये और उनके खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए आशिर्वाद मांगा। कमलापति ने उनकी जमानत राशि जमा करने के साथ ही चुनाव लड़ने के लिए 10 हजार रुपए दिए। कमलापति चुनाव जीत गए तो सबसे पहले राजनारायण ने पांव छूकर उन्हें माला पहनाई। कमलापति ने उनको कार्यकर्ताओं का मुंह मीठा कराने के लिए एक हजार रुपए और दिए। यह व्यवहार हमारी संस्कृति और संस्कार का प्रतीक है। हमने इसी तरह का व्यवहार 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी का भी देखा, जब वह कई उन बड़ों के पास गए जो कांग्रेसी विचारधारा के थे मगर वाजपेयी ने झुककर प्रणाम करने में कोई देरी नहीं की। एक अन्य उदाहरण, हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का है। उन्होंने वैचारिक विरोधी समझे जाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया था। डॉ. अंबेडकर कांग्रेस प्रत्याशी काजरोल्कर जो दूध बेचते थे, से चुनाव हार गए। यह दोनों लोग अंग्रेजी हुकूमत में भी लाभ के पद पर रहे थे मगर पंडित नेहरू ने उन्हें सम्मान दिया। पंडित नेहरू और कमलापति ने अपने व्यवहार से अपने व्यक्तित्व की एक बड़ी लकीर बगैर किसी की काट किए खींच दी, जिसे इतिहास मिटा नहीं सकता।
भाजपा का मायने संस्कारित भाषा और व्यवहार वाली पार्टी होता था। हमने अटल बिहारी वाजपेयी को निजी तौर पर देखा है। उनके व्यवहार में कभी अमर्यादित भाषा नहीं दिखी। वह प्रधानमंत्री न होते हुए भी कई बार उस पद से अधिक बड़े दिखते थे। कई बार व्यक्ति छोटा होता है और पद बड़ा, तो कई बार पद बड़ा होता है और कद छोटा। आज के परिवेश में चिंतन मौजूं है। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में दो बातें कहीं, एक पाकिस्तान चाहता है कि मैं हार जाऊं और दूसरी, कांग्रेस ने हमें काम नहीं करने दिया। हमें आश्चर्य हुआ कि हमने जिसे न केवल केंद्र में बल्कि राज्यों में भी भरपूर समर्थन दिया, वह प्रधानमंत्री जो खुद को मजबूत नेतृत्व साबित करने के लिए अभियान चलाता है, क्या इतना कमजोर है कि नेता प्रतिपक्ष का पद भी न ले पाने वाली कांग्रेस से डर गया। 44 सदस्यों वाली कांग्रेस ने उसे काम नहीं करने दिया। हालांकि पाकिस्तानी राग पुराना है। गुजरात चुनाव के दौरान इसी तरह का तमाशा देखने को मिला था। मणिशंकर अय्यर सबको याद हैं, अगर अय्यर ने साजिश रची थी तो एफआईआर क्यों नहीं हुई? चुनाव के बाद चर्चा भी नहीं हुई। पांच साल की सत्ता संभालने के बाद अपनी उपलब्धियों पर चुनाव लड़ा जाता है न कि विपक्षी दलों को कोस कर। निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग प्रधानमंत्री जैसे पद की गरिमा को गिराता है। हमें याद है कि पिछले चुनावों में मोदी ने कभी खुद को नीच जाति का तो कभी चायवाला और अब चौकीदार जैसी संज्ञाओं से विभूषित किया है। यही नहीं कई बार ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया जिनको लिखना हमारे संस्कारों के विपरीत है।
संस्कारों का सृजन करने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हमें ऐसे शब्द और व्यवहार तो नहीं सिखाये थे। भाषा की मर्यादा बेहद जरूरी है क्योंकि पद और सत्ता वक्ती होती है मगर शब्द इतिहास रचते हैं। इतिहास में दर्ज विचारक जिन्होंने कोई पद नहीं पाया मगर उनके शब्दों का वक्त बे वक्त संदर्भ लिया जाता है। हमारे मनीषियों ने स्पष्ट किया है कि सत्ता शक्ति के साथ कुछ बुराइयां भी आती हैं। अगर हम उनके शिकार नहीं होते तभी श्रेष्ठ कहलाते हैं। हम लोकतंत्र में रहते हैं और लोकतंत्र जनता जनार्दन में निहित है। अगर वह मोदी को दोबारा चुनती है, तो उनका फैसला सिर माथे पर। लेकिन, क्या सत्ता में आने के बाद वे शब्द वापस आ पाएंगे, जो सार्वजनिक मंच से बोले जा चुके हैं? बिल्कुल नहीं, ये शब्द तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए।
हमारे नीति नियताओं की यह महती जिम्मेदारी है कि वे शब्दों का संयम और संस्कार बनायें रखें। बड़े पदों पर बैठे लोगों से सत्य और तथ्य पर शालीन बातों की उम्मीद की जाती है। उनसे मनगढ़ंत बातें और मिथ्या इतिहास को जनता नहीं सुनना चाहती बल्कि उनकी उपलब्धियों पर स्वस्थ चर्चा की अपेक्षा करती है। अधिक बोलने के चक्कर में ऐतिहासिक तथ्यों का घालमेल मत कीजिए। विपक्षी दलों का मजाक बनाने के बजाय उनके आरोपों के जवाब दीजिए।
भारत वह देश है जहां अभी भी 30 करोड़ से अधिक लोग एक वक्त की रोटी के लिए अपना जीवन संकट में डालते हैं। ऐसे देश में राजनीतिक दल जब आलीशान दफ्तरों में बैठकर उनकी बात करते हैं, तो लगता है कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। निश्चित रूप से अपने दफ्तरों को अच्छा बनाना चाहिए मगर उससे पहले जिन नागरिकों के लिए सियासी दल हैं, उनके जीवन को बेहतर बनाने का काम करना चाहिए। किसी का भी चरित्रहनन करना हमारी संस्कृति नहीं है बल्कि अपनी संस्कृति का बड़प्पन प्रस्तुत करना हमारा दायित्व है। हम किसी की लकीर को छोटा करके बड़े बनने वाले लोग नहीं हैं बल्कि प्रतिस्पर्धी की लकीर से अपनी लकीर को बड़ा करने वाली संस्कृति के लोग हैं। यही विचार और ज्ञान हमें विश्व गुरु बनाता था, न कि छिछले शब्द। दुख तब होता है जब हम गलत तथ्यों को प्रस्तुत करके किसी की बुराई करते हैं और खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश करते हैं। हाल के दिनों में सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की तस्वीरों को फोटोशोप के जरिए भद्दे और अश्लील तरीके से प्रस्तुत करके सोशल मीडिया पर परोसा गया। भाजपा के आईटी सेल पर इसके विस्तार का आरोप लगा। सवाल यह उठता है कि जब ऐसी घिनौनी हरकतें होती हैं तो भाजपा और सरकार के जिम्मेदार लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते और इन हरकतों के लिए क्षमा क्यों नहीं मांगते?
हमारी संस्कृति किसी का चारित्रहनन करने की इजाजत नहीं देती। किसी मृत व्यक्ति को लांछित करना घिनौना कृत्य माना जाता है। कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि खुद को बड़ा दिखाने के लिए कुछ सियासी लोग तत्कालीन बड़ों का चरित्रहनन कर रहे हैं। इस काम के लिए लाखों रुपए वेतन पर विशेषज्ञों को रखा गया है। दुनिया के इतिहास पर गौर करेंगे तो विश्व के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका से लेकर तमाम छोटे मुल्कों तक दर्जनों ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब गरीब और भुखमरी के शिकार परिवारों की पृष्ठभूमि के लोग राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री सहित तमाम बड़े पदों पर पहुंचे। उन्होंने कभी इस बात का बखान नहीं किया कि वे दयनीय हैं। अब्राहम लिंकन हों या बराक ओबामा दो पीढ़ियों के राष्ट्रपति उदाहरण हैं। उन्होंने कभी शब्दों की मर्यादा को नहीं खोया। आलोचनाएं और सम्मान करने वालों को समान तरीके से लिया। यह बड़प्पन होता है। उच्च पदों पर पहुंचने वालों से इसी तरह के व्यक्तित्व की उम्मीद की जाती है, न कि निम्न स्तरीय शब्दों की। ऐसे शब्दों का स्थान न चुनाव प्रचार में और न ही शासन सत्ता संचालित करने में हो सकता है। उम्मीद है कि भविष्य में हमारे नेता हमारे मार्गदर्शक बनेंगे न कि पथ भ्रमित करने वाले। वे अपने व्यवहार और भाषा के संयम से इतिहास में सम्मानजनक स्थान दर्ज कराएंगे।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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