Saturday, April 13, 2019

नारी समान नहीं श्रेष्ठ है, उसमें विश्वास जगाइए

पल्स: Ajay Shukla
नारी समान नहीं श्रेष्ठ है, उसमें विश्वास जगाइए
हम सुबह नींद से जागे और पत्नी से कहा कि हमें अपना साप्ताहिक लेख लिखना है। पत्नी बोली किस विषय पर लिखेंगे, हमने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में महिलाओं की समानता पर फैसला देकर अच्छा किया। पत्नी हंसी और बोली मूर्ख हैं, ऐसी कागजी बातें करने वाले। प्रकृति ने हमें समान नहीं बनाया तो किसी के कहने या अदालतों के आदेश से कोई समान कैसे हो जाएगा? हम समझ नहीं सके, पूछा मतलब क्या है? उसने कहा कि आप हमारे बराबर कैसे हो सकते हैं, क्या आप प्राकृतिक तरीके से कोख में बच्चा पाल सकते हैं, क्या आप मातृत्व को समझ सकते हैं, क्या आप प्रसव पीड़ा से लेकर बदलती शारीरिक स्थितियों की भावनाओं को समझ सकते हैं, क्या आप मासिक धर्म के असहनीय दिनों को समझ सकते हैं? आप दूसरों की केयर करने की स्त्री भावना को समझ पाएंगे, अगर नहीं तो समानता के नाटक करना बंद कीजिए। निश्चित रूप से प्रकृति ने जो पुरुष को दिया है वह नारी को नहीं और जो नारी को दिया है वह पुरुष को नहीं। नारी को पुरुष से कुछ अधिक मिला है मगर अधूरेपन के साथ, जो बगैर पुरुष अंश के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। नारी श्रेष्ठ है न कि समान। हम सोच में पड़ गए।
हम जब अपनी वैदिक व्यवस्था और संस्कृति पर गौर करते हैं तो यह बात सिद्ध होती है कि हमारे समाज में नारी श्रेष्ठ रही है न कि समान। पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के उचित कारण मौजूद हैं मगर बगैर महिला के वह पूर्ण नहीं होते हैं। हमारी संस्कृति में पुरुष का वरण महिला करती थी न कि महिला का वरण पुरुष। हड़प्पा की सभ्यता में हो या फिर राज सत्तात्मक व्यवस्था, दोनों में ही महिलाओं के बिना व्यवस्था चलाए जाने का नियम नहीं था। विवाह के दौरान सप्तपदी में भी छह वचन भावी पत्नी को पुरुष देता है, तब सातवां वचन पत्नी पति को देती है। लड़की का पिता कन्या दान देता है और याचक की तरह पुरुष दान ग्रहण करता है। राजा दशरथ ने जनक के पांव छूकर कहा था कि आपकी बेटी और आपने हमको ऋणी बना दिया, हम भिखारी हैं और आप दाता। तय मानिए कि हमारी यह व्यवस्था सहस्राब्दियों तक इसी तरह चलती रहीं। महिलाएं न केवल राज दरबार में बैठतीं और किसी भी निर्णय में अहम भूमिका निभाती थीं बल्कि भविष्य का निर्माण भी करती थीं।
हमें गौर करना पड़ेगा कि महिलाओं की दशा कब बिगड़ी। महिलाएं कब और कैसे निरीह बना दी गईं। राजा मनु ने अपनी राजसत्ता को स्थापित करने के लिए एक संहिता का निर्माण कराया। उसने राजा को भगवान विष्णु का अवतार घोषित किया और कोई चुनौती न रहे, इसलिए महिलाओं को नीचा दिखाया। जातिगत व्यवसाय की संस्कारित व्यवस्था को कुरीति में बदला। यहीं से नारी निचले पायदान पर पहुंचा दी गई। कालांतर में विदेशी आक्रांताओं खासकर मुस्लिम लुटेरों के आने से हमारी व्यवस्था बिगड़ी। उनके डर से हमारे देश में भी पर्दा प्रथा से लेकर तमाम तरह की कुप्रथाओं का चलन हुआ, अन्यथा हमारे देश की नारी सुसंस्कृत, विद्वान और योद्धा होती रही है। वो नीतियों के निर्धारण में अहम भूमिका निभाकर भी आत्मसंयमी रही। उसे किसी नियम या व्यवस्था से रोका नहीं जाता था बल्कि वह स्वयं जानती थी कि मासिक धर्म के समय उसे कैसा व्यवहार करना है। हमारी वैदिक व्यवस्था में जब यह स्पष्ट है कि बगैर पत्नी-पति की कोई पूजा अर्चना पूर्ण नहीं है तो उसको किसी भी धार्मिक कृत्य से रोकने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।
यह भी स्पष्ट है कि जब देवता सर्वत्र पराजित हो जाते थे तब नारी ही दुर्गा का रूप धरकर जीत दिलाती थी। वह हर ‘रण’ से कुशल और विजेता रही है। हम अगर ध्यान से देखें तो पता चलता है कि नारी ने पुरुष की विपत्ति में रक्षा की है न कि पुरुष ने नारी की। कभी भी किसी नारी को बंधक बनाकर उसके शीलभंग का हमारे वैदिक संस्कृति में कोई उदाहरण नहीं मिलता। महिलाओं की लज्जा लूटने की घटनाएं मुस्लिम आक्रांताओं के आने के बाद सामने आई हैं। यह भी तब हुआ जब मनु संहिता के अस्तित्व में आने के बाद नारी को सीमाओं में बांधा गया। नारी सीमित नहीं है, बल्कि पुरुष सीमित है क्योंकि पुरुष कोई भी काम नारी सम्मान के विपरीत नहीं कर सकता, इसका स्पष्ट वर्णन मिलता है। हमारे धर्म में किसी नारी के साथ यौन संबंध बगैर उसकी पूर्ण सहमति के नहीं बनाने की व्यवस्था है, चाहे वह पत्नी ही क्यों न हो। हमारी संस्कृति में नारी उपभोग की नहीं, उपयोग के लिए है। विवाह भी संतानोत्पत्ति के उद्देश्य की पूर्ति के लिए है न कि भोग के लिए। जरूरी है कि हम नारी की शक्ति और उसके संधान को समझें, न कि समानता की बात करके उसको नीचा दिखाने का दया भाव प्रदर्शित करें।
हम यह भी कहना चाहेंगे कि हमारी मानसिकता इतनी कलुषित हो गई है कि हम सार्वजनिक रूप से किसी नारी से बात करते हुए उसे रिश्तों में बांधने का नाटक करते हैं। कभी ‘बहन जी’, कभी ‘मां जी’, कभी ‘भाभी जी’, कभी कोई और ‘जी’। आखिर क्यों? क्या बगैर रिश्ते में बांधे हम नारी का सम्मान नहीं कर सकते? हमें एक नारी से अपनी मित्रता पर भरोसा क्यों नहीं होता? हम स्पष्ट रूप से नारी के प्रति अपने विचार नहीं रखते क्योंकि कलुष हमारे मन में है। हम यह साहस दिखाएं और सार्वजनिक रूप से कहें कि यह मेरी मित्र है। यह मेरी प्रेमिका है। सच को छिपाने से क्या सच बदल जाएगा। शायद नहीं बल्कि मन के भीतर और भी कलुष उत्पन्न होगा। अत: जरूरी है कि हम मूल समस्या पर बात करें। हमारी बेटियां, बहने, मांयें, पत्नी और मित्र कोई भी किसी गलत सोच का शिकार न हों। किसी से क्या रिश्ते बनाना है यह सिर्फ नारी के अधिकार में है। हम अपने विश्वास को बढ़ाएं और इतना कि कोई किसी के विश्वास को न तोड़े। यह तभी होगा जब हम अपनी वैदिक संस्कृति के मुताबिक नारी को श्रेष्ठ न केवल मानेंगे बल्कि उसे व्यवहार में भी लाएंगे। महिलाओं को आपके मैत्रीपूर्ण संबंध चाहिए, न कि समानता के नाटक वाले, क्योंकि वो सर्वथा श्रेष्ठ है। उसको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसमें सम्मान और विश्वास लबरेज करने की जरूरत है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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