PULSE..
दागदार होती यूपी की पुलिसिंग!
यूपी पुलिस देश की ही नहीं विश्व की सबसे बड़ी एकमात्र पुलिस है। यह बात हम जितने गर्व के साथ कहते हैं उतने ही शर्म के साथ यह भी कहना पड़ता है कि अमानवीयता, भ्रष्टाचार और असुरक्षा का आभास कराने वाला सबसे बड़ा पुलिस बल भी देश में यही है। यह किसी एक घटना मात्र के कारण नहीं बल्कि सतत यूपी पुलिस की हरकतों के कारण ही कहना पड़ रहा है। यूपी में रहने वाले लोग पुलिस को मित्र या सहयोगी नहीं मानते बल्कि उससे खौफ खाते हैं या ताकतवर लोगों की सेवा करने वाले घरेलू नौकर की तरह देखते है। यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी है बल्कि लगातार हुए नैतिक और मूल्यों के क्षरण के कारण हुआ है। कभी सुरक्षा का आभास कराने वाली पुलिस आखिर कैसे निचले पायदान पर आकर खड़ी हो गई है। हमने यूपी पुलिस के स्वर्णिम काल को भी देखा है और अब बदतर होते हालातों को भी देख रहे हैं। कई बार यह लगता है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं। यूपी पुलिस में ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत बढ़ी है जो किसी भी नैतिकता को ताक पर रखकर अधिक से अधिक कमाने के फेर में लगे रहते हैं। हालात तो यह हैं कि जो युवा इस नौकरी में आ रहे हैं वह पहले ही अपना टारगेट फिक्स करते हैं। उन्हें अब जनसेवा और सुरक्षा का जुनून नहीं है बल्कि खुद के लिए ठाट बाट जुटाना ही मकसद बन गया है।
देश की आजादी के बाद यूपी पुलिस के पहले भारतीय आईजीपी बीके लहरी बने। उन्होंने पुलिसिंग के लिए जो मानक तय किये, उन्होंने इसका इतना मान बढ़ाया कि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं इसे “कलर्स” प्रदान किया था। पुलिसिंग इस स्तर की थी कि लोगों को न केवल जीवन में सुरक्षा का आभास होता था बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए पुलिस अपराध नियंत्रण से लेकर सुरक्षित नगरीय एवं ग्रामीण व्यवस्था में योगदान देती थी। पुलिस एक्ट 1861 के तहत 1863 में बनी यूपी पुलिस ने अपना ध्येय वाक्य बनाया था “सुरक्षा आपकी संकल्प हमारा”। 1982 तक यूपी पुलिस का प्रमुख आईजीपी होता था और नरेश कुमार इसके आखिरी आईजीपी और पहले डीजीपी बने थे। इसके बाद दिल्ली के पहले पुलिस आयुक्त रहे जेएन चुतुर्वेदी, प्रकाश सिंह, वीएस माथुर, श्रीराम अरुण, विक्रम सिंह और ब्रिज लाल जैसे तेज तर्रार और मूल्यों पर काम करने वाले पुलिस महानिदेश बने। इन अफसरों ने ध्येय वाक्य का पालन कराने के लिए हर संभव कोशिश की और महकमें में अनुशासन बनाये रखने पर जोर दिया। जो अब देखने को नहीं मिल रहा है।
यूपी पुलिस का मतलब अब वहां के लोग जो निकालते हैं उससे तो चेहरा ही बदल जाता है। कोई कहता है कि सबसे ज्यादा अनुशासनहीन पुलिस तो कोई कहता है घूसखोर पुलिस, कोई इसे शोषण करने वाली पुलिस बताता है तो कोई पूरे महकमें पर ही सवालिया निशान लगा देता है। यहां कि पुलिस कब किसको किसके कहने पर मुलजिम बना देगी और कब मुलजिमों को ही सलाम बजाने लगेगी नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो सदैव से पुलिस सियासी रंग में रंगी रही है मगर अब पुलिस सियासी टूल के रूप में ही पहचानी जाने लगी है। इसमें सुधार के लिए सबसे पहला प्रयास जेएन चतुर्वेदी ने किया था। उन्होंने सियासी दबाव डालकर तबादला कराने की कोशिश करने वाले एक वाराणसी में तैनात डीएसपी को जब निलंबित किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरना पड़ा था। इस विवाद के बाद जेएन चुतुर्वेदी ने पुलिस जनों का इतना मनोबल बढ़ाया था कि सियासी हुक्म पर नहीं पुलिसिंग जनता और न्याय के हितों के लिए ही होनी चाहिए। यूपी के पहले अनुसूचित जाति के डीजीपी बने श्रीराम अरुण ने दबे कुचले वर्ग को संबल देने की दिशा में सार्थक प्रयास किये। डीजीपी के रूप में प्रकाश सिंह ने एक सख्त प्रशासक का रुख अपनाया और अपराधियों पर शिकंजा कसा। उन्होंने पुलिस सुधार के लिए याचिका दाखिल की जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के लिए निर्देश जारी किये मगर उनको उचित स्थान यूपी में ही नहीं मिल सका जबकि दूसरे कई राज्यों ने पुलिस सुधार पर काम किया।
यूपी की राजधानी लखनऊ में दो सिपाहियों के गैंग ने हाल ही में मल्टीनेशनल कंपनी के मैनेजर विवेक तिवारी की हत्या कर दी। साफ है कि इस हत्या में विवेक ने सिपाहियों पर न कोई हमला किया और न ही जानलेवा प्रयास। उसने पुलिस वालों को बदमाश समझा और गाड़ी नहीं रोकी। सभी को पता है कि लखनऊ में कई बार पुलिसकर्मी लूटपाट करते पकड़े जा चुके हैं। जिस जगह घटना हुई वहां न कोई पुलिस नाका था और न ही कोई ऐसा रूट की पुलिस जांच की जरूरत पड़े। यह एक घटना नहीं है, इसी तरह नोयडा में एक थानेदार ने एनकाउंटर का ड्रामा रचा और एक निर्दोष युवक को गोली मार दी। भाग्य से वह युवक बच निकला तो सच सामने आ गया। थानेदार को निलंबित कर दिया गया मगर इससे उस युवक की सामान्य जिंदगी नहीं लौट सकती। हमें याद है कि तमाम बार यूपी पुलिस झूठे मुकदमे बनाकर लोगों को फंसाती और जिंदगी बरबाद करती रही है। जिसके तमाम उदाहरण मौजूद हैं मगर अफसरों ने न सच जानने की कोशिश की और न ही इस तरह की घटनाओं को रोकने की। इसी का नतीजा है कि गलत करने वालों के हौसले बुलंद होते गये।
प्रदेश को एक योगी मुख्यमंत्री के रूप में मिला है, तो उम्मीद की जा सकती है कि कुछ अधीन है। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण के साथ ही ईमानदार और निष्पक्ष काम करने वाले पुलिसजनों का मनोबल बढ़ाने की जरूरत है। यह भी जरूरत है कि बेईमानी के अवार्ड न दिये जायें। मानवता, नैतिकता, मूल्यों और आमजन को मित्र की तरह देखने समझने का प्रशिक्षण दिया जाये। पीड़ित को अपना दर्द लेकर धक्के न खाने पड़ें बल्कि पुलिसजन उसके समीप जायें। सियासी दबाव को रोकने के लिए थानों में नेतागिरी बंद हो। एसपी की तैनाती का मानक तय हो। सियासी पैरोकारी के आधार पर नहीं बल्कि मेरिट पर नियुक्ति की जाये और उनकी जवाबदेही तय हो। जब तक जवाबदेय पुलिसिंग तैयार नहीं होगी, पुलिस पर दाग लगते ही रहेंगे। पुलिस कर्मी को भी सम्मान और विश्वास से लबरेज करना होगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
दागदार होती यूपी की पुलिसिंग!
यूपी पुलिस देश की ही नहीं विश्व की सबसे बड़ी एकमात्र पुलिस है। यह बात हम जितने गर्व के साथ कहते हैं उतने ही शर्म के साथ यह भी कहना पड़ता है कि अमानवीयता, भ्रष्टाचार और असुरक्षा का आभास कराने वाला सबसे बड़ा पुलिस बल भी देश में यही है। यह किसी एक घटना मात्र के कारण नहीं बल्कि सतत यूपी पुलिस की हरकतों के कारण ही कहना पड़ रहा है। यूपी में रहने वाले लोग पुलिस को मित्र या सहयोगी नहीं मानते बल्कि उससे खौफ खाते हैं या ताकतवर लोगों की सेवा करने वाले घरेलू नौकर की तरह देखते है। यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी है बल्कि लगातार हुए नैतिक और मूल्यों के क्षरण के कारण हुआ है। कभी सुरक्षा का आभास कराने वाली पुलिस आखिर कैसे निचले पायदान पर आकर खड़ी हो गई है। हमने यूपी पुलिस के स्वर्णिम काल को भी देखा है और अब बदतर होते हालातों को भी देख रहे हैं। कई बार यह लगता है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं। यूपी पुलिस में ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत बढ़ी है जो किसी भी नैतिकता को ताक पर रखकर अधिक से अधिक कमाने के फेर में लगे रहते हैं। हालात तो यह हैं कि जो युवा इस नौकरी में आ रहे हैं वह पहले ही अपना टारगेट फिक्स करते हैं। उन्हें अब जनसेवा और सुरक्षा का जुनून नहीं है बल्कि खुद के लिए ठाट बाट जुटाना ही मकसद बन गया है।
देश की आजादी के बाद यूपी पुलिस के पहले भारतीय आईजीपी बीके लहरी बने। उन्होंने पुलिसिंग के लिए जो मानक तय किये, उन्होंने इसका इतना मान बढ़ाया कि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं इसे “कलर्स” प्रदान किया था। पुलिसिंग इस स्तर की थी कि लोगों को न केवल जीवन में सुरक्षा का आभास होता था बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए पुलिस अपराध नियंत्रण से लेकर सुरक्षित नगरीय एवं ग्रामीण व्यवस्था में योगदान देती थी। पुलिस एक्ट 1861 के तहत 1863 में बनी यूपी पुलिस ने अपना ध्येय वाक्य बनाया था “सुरक्षा आपकी संकल्प हमारा”। 1982 तक यूपी पुलिस का प्रमुख आईजीपी होता था और नरेश कुमार इसके आखिरी आईजीपी और पहले डीजीपी बने थे। इसके बाद दिल्ली के पहले पुलिस आयुक्त रहे जेएन चुतुर्वेदी, प्रकाश सिंह, वीएस माथुर, श्रीराम अरुण, विक्रम सिंह और ब्रिज लाल जैसे तेज तर्रार और मूल्यों पर काम करने वाले पुलिस महानिदेश बने। इन अफसरों ने ध्येय वाक्य का पालन कराने के लिए हर संभव कोशिश की और महकमें में अनुशासन बनाये रखने पर जोर दिया। जो अब देखने को नहीं मिल रहा है।
यूपी पुलिस का मतलब अब वहां के लोग जो निकालते हैं उससे तो चेहरा ही बदल जाता है। कोई कहता है कि सबसे ज्यादा अनुशासनहीन पुलिस तो कोई कहता है घूसखोर पुलिस, कोई इसे शोषण करने वाली पुलिस बताता है तो कोई पूरे महकमें पर ही सवालिया निशान लगा देता है। यहां कि पुलिस कब किसको किसके कहने पर मुलजिम बना देगी और कब मुलजिमों को ही सलाम बजाने लगेगी नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो सदैव से पुलिस सियासी रंग में रंगी रही है मगर अब पुलिस सियासी टूल के रूप में ही पहचानी जाने लगी है। इसमें सुधार के लिए सबसे पहला प्रयास जेएन चतुर्वेदी ने किया था। उन्होंने सियासी दबाव डालकर तबादला कराने की कोशिश करने वाले एक वाराणसी में तैनात डीएसपी को जब निलंबित किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरना पड़ा था। इस विवाद के बाद जेएन चुतुर्वेदी ने पुलिस जनों का इतना मनोबल बढ़ाया था कि सियासी हुक्म पर नहीं पुलिसिंग जनता और न्याय के हितों के लिए ही होनी चाहिए। यूपी के पहले अनुसूचित जाति के डीजीपी बने श्रीराम अरुण ने दबे कुचले वर्ग को संबल देने की दिशा में सार्थक प्रयास किये। डीजीपी के रूप में प्रकाश सिंह ने एक सख्त प्रशासक का रुख अपनाया और अपराधियों पर शिकंजा कसा। उन्होंने पुलिस सुधार के लिए याचिका दाखिल की जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के लिए निर्देश जारी किये मगर उनको उचित स्थान यूपी में ही नहीं मिल सका जबकि दूसरे कई राज्यों ने पुलिस सुधार पर काम किया।
यूपी की राजधानी लखनऊ में दो सिपाहियों के गैंग ने हाल ही में मल्टीनेशनल कंपनी के मैनेजर विवेक तिवारी की हत्या कर दी। साफ है कि इस हत्या में विवेक ने सिपाहियों पर न कोई हमला किया और न ही जानलेवा प्रयास। उसने पुलिस वालों को बदमाश समझा और गाड़ी नहीं रोकी। सभी को पता है कि लखनऊ में कई बार पुलिसकर्मी लूटपाट करते पकड़े जा चुके हैं। जिस जगह घटना हुई वहां न कोई पुलिस नाका था और न ही कोई ऐसा रूट की पुलिस जांच की जरूरत पड़े। यह एक घटना नहीं है, इसी तरह नोयडा में एक थानेदार ने एनकाउंटर का ड्रामा रचा और एक निर्दोष युवक को गोली मार दी। भाग्य से वह युवक बच निकला तो सच सामने आ गया। थानेदार को निलंबित कर दिया गया मगर इससे उस युवक की सामान्य जिंदगी नहीं लौट सकती। हमें याद है कि तमाम बार यूपी पुलिस झूठे मुकदमे बनाकर लोगों को फंसाती और जिंदगी बरबाद करती रही है। जिसके तमाम उदाहरण मौजूद हैं मगर अफसरों ने न सच जानने की कोशिश की और न ही इस तरह की घटनाओं को रोकने की। इसी का नतीजा है कि गलत करने वालों के हौसले बुलंद होते गये।
प्रदेश को एक योगी मुख्यमंत्री के रूप में मिला है, तो उम्मीद की जा सकती है कि कुछ अधीन है। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण के साथ ही ईमानदार और निष्पक्ष काम करने वाले पुलिसजनों का मनोबल बढ़ाने की जरूरत है। यह भी जरूरत है कि बेईमानी के अवार्ड न दिये जायें। मानवता, नैतिकता, मूल्यों और आमजन को मित्र की तरह देखने समझने का प्रशिक्षण दिया जाये। पीड़ित को अपना दर्द लेकर धक्के न खाने पड़ें बल्कि पुलिसजन उसके समीप जायें। सियासी दबाव को रोकने के लिए थानों में नेतागिरी बंद हो। एसपी की तैनाती का मानक तय हो। सियासी पैरोकारी के आधार पर नहीं बल्कि मेरिट पर नियुक्ति की जाये और उनकी जवाबदेही तय हो। जब तक जवाबदेय पुलिसिंग तैयार नहीं होगी, पुलिस पर दाग लगते ही रहेंगे। पुलिस कर्मी को भी सम्मान और विश्वास से लबरेज करना होगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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