Saturday, April 13, 2019

सिर्फ श्रेय नहीं जिम्मेदारी भी लीजिए साहेब


 PULSE.. 
सिर्फ श्रेय नहीं जिम्मेदारी भी लीजिए साहेब

हम दिल्ली में जंतर-मंतर से गुजर रहे थे, देखा भारत संचार निगम के हजारों मुलाजिम धरने पर बैठे हैं। वहां कानपुर से आए विजय भाई से मुलाकात हुई, हालचाल पूछा तो उनकी आंखें भर आर्इं। बोले, भाई बरबाद कर दिया है सरकार ने। बेटी की पढ़ाई छुड़वा दी है क्योंकि फीस नहीं भर पा रहा। सरकारी कॉलेज में भी फीस इतनी ज्यादा है कि पूछिये मत। वेतन पिछले आठ महीने से नहीं मिला है। कई लोगों को तो डेढ़ साल से नहीं मिला। आपका मीडिया भी हमारा दर्द नहीं दिखाता। समझ नहीं आ रहा कि क्या करें? बीएसएनएल की हालत यह हो गई है कि स्थाई कर्मचारियों को भी वक्त पर वेतन नहीं मिलता। न सरकार सुन रही है, न प्रबंधन। मीडिया भी हमारे प्रति चुप्पी साधे है। भविष्य अंधकार में है। विजय मिश्र की बात सुनी तो पिछले महीने बैंकिंग सेक्टर के कुछ मित्रों की बात याद आ गई। उनकी दशा भी अच्छी नहीं थी। उनका कहना था कि बैंकों को वे लोग कंगाल बना रहे हैं जिन पर उसे समृद्ध बनाने की जिम्मेदारी है। सरकार कई बैंकों को खत्म कर उनके विलय की तैयारी में है। केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह पंजाब में स्थित एक शोध संस्थान को बंद करने का फैसला कर लिया है। भाभा एटामिक संस्थान के वैज्ञानिकों को शोध कार्य के लिए फंड तो छोड़िये वेतन भी वक्त पर नहीं मिल रहा। हमारे विज्ञानी संकट के दौर में हैं। ऐसा नहीं है कि सभी जगह हालात खराब हैं। देश का कारपोरेट दिन दोगनी रात चौगुना बढ़ रहा है। कुछ सियासी दल और उसके नेताओं के लिए देश सोने की चिड़िया बन गया है।
हम भारत के नागरिक हैं और देश का कोई भी सरकारी उपक्रम हमारी खून पसीने की कमाई पर खड़ा है। उसमें देशवासियों और देश की संपत्ति लगी है। यह किसी व्यक्ति, सियासी दल या समूह की संपत्ति नहीं है। हमारे देश के नवरत्न समझे जाने वाले सरकारी उपक्रम मरणासन्न हो रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं ने अपनी साख खो दी है। केंद्र और राज्य सरकारों के करीब 23 लाख पदों को पिछले पांच सालों में भरा नहीं गया, जिन्हें खत्म करने का फैसला सरकार कर चुकी है। रोजगार मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक एक तरफ देश में शिक्षित दक्षता प्राप्त करीब 50 लाख युवा हर साल बेरोजगार हो रहे हैं तो दूसरी तरफ नए पदों के सृजन के बजाय उन्हें खत्म किया जा रहा है। ठेके और आउटर्सोसिंग के जरिए युवाओं से काम कराया जा रहा है। नतीजतन अपने भविष्य को लेकर युवा न केवल चिंतित है बल्कि पलायन की दिशा में बढ़ रहा है। नीति आयोग ने भी फरवरी, 2018 में स्वीकार किया कि रोजगार की स्थिति ठीक नहीं है। महंगाई का आंकड़ा आप यूं समझ सकते हैं कि जो बिस्कुट का पैकेट मार्च 2014 में पांच रुपए का मिलता था, वह अब 10 रुपए का मिलता है। इसबगोल की भूसी का 200 ग्राम का जो पैकेट 90 का था, वह अब 180 रुपए का मिलता है। यही नहीं सड़क किनारे जो चाय पांच रुपए की मिलती थी वह अब 10 रुपए की मिलती है। जो समोसा 5 रुपए का था, वह 15 रुपए का मिलता है।
किसान को अपनी उपज की लागत का दोगुना देने की बात की जाती थी मगर उसकी लागत भी नहीं निकल रही है। इसका हालिया उदाहरण आगरा के एक आलू किसान प्रदीप शर्मा का है। प्रदीप ने साल भर मेहनत और जमा पूंजी लगाकर आलू उपजाए। उन्होंने अपने 19 टन आलू को जब बेचा, तो लागत चुकाने के बाद उनके हाथ 490 रुपए आए। वह भी उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को मनीआॅर्डर कर दिए। किसान को भले ही अपनी उपज की लागत न मिल रही हो मगर बिचौलियों को कोई कमी नहीं है। मंडी में बैठा बनिया लग्जरी गाड़ियों से चलता है। किसान की उपज से होटल-रेस्टोरेंट चलाने वाले करोड़ों रुपए में खेलते हैं। जिस दवा को बनाने और अन्य खर्च के बाद लागत 10 रुपए आती है, वह मरीज को 50 से 100 रुपए तक में मिलती है। सवाल यहीं है कि जहां सरकार का राजस्व घाटा लगातार बढ़ रहा है। कारपोरेट जगत की पूंजी बढ़ रही है। मुनाफे वाली सरकारी कंपनियां और निगम, बीमारू उद्योगों में बदल रहे हैं। उनको खरीदकर या ठेके पर लेकर कारपोरेट कंपनियां मालामाल हो रही हैं। मोदी सरकार ने वादा किया था कि कड़े और योजनागत वित्तीय प्रबंधन के जरिए न केवल बीमार उद्योगों को सेहतमंद बनाएंगे बल्कि जो अच्छी हालत में हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाकर युवाओं के लिए रोजगार सृजित करेंगे। किसानों से लेकर उद्योगपतियों तक के लिए अच्छे दिनों के सपने दिखाए गए थे। लघु और मध्यम उद्योगों में देश के रोजगार का 45 फीसदी हिस्सा है। उसको संबल देने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया गया था। मोदी सरकार से इस उद्योग को भी काफी उम्मीदें थीं मगर पांच साल में नतीजे कुछ नहीं निकले। वजह साफ है कि देश में अच्छे दिनों पर हक सिर्फ कारपोरेट सेक्टर का ही बना है।
देश में आम चुनाव का एलान हो चुका है। वर्ष 1951 में जब संविधान के दायरे में पहला चुनाव हुआ था तब सरकार सहित सभी खर्च 10 करोड़ रुपए के थे। इस वक्त विश्व में सबसे महंगा चुनाव हमारे देश में होने लगा है। वर्ष 2013-14 में सियासी दलों की कारपोरेट फंडिंग 85.38 करोड़ रुपए थी जो 2014-15 में 1.78 अरब रुपए हो गई। 2017-18 में यह रकम बढ़कर करीब 13 अरब रुपए हो गई। पिछले चार सालों में हुए राज्यों के चुनावों में कारपोरेट फंडिंग 10 खरब रुपए हुई है। इसमें सबसे ज्यादा 6 खरब रुपए भाजपा को मिले जबकि चार खरब में बाकी सभी दल शामिल हैं। इसमें अहम बात यह है कि हमारी सरकारों ने इस दरम्यान कारपोरेट सेक्टर को 60 खरब से अधिक की रियायत देकर उनकी फंडिंग का कर्ज चुकाया है। इन आंकड़ों से एक बात साफ है कि देश की सत्ता बदलने के बाद अच्छे दिनों का इंतजार कर रहे बेरोजगार और किसान संकट में हैं। गृहणियों से लेकर कामगार तक अपने जीवन की अनिश्चितता में डूबे हैं। मिनिमम गवर्नमेंट, मैग्जिमम गवर्नेंस का वादा करने वाली सरकार में नौकरशाही के अच्छे दिन आये हैं। उनकी कमाई हर तरह से बढ़ी है, जबकि जिसे गवर्नेंस की जरूरत थी वे सरकार के बोझ में दबते चले गए हैं।
निश्चित रूप से चुनाव के दौर में हम यह विपक्ष से तो नहीं पूछेंगे कि आपने जो वादे किए थे, उनका क्या हुआ? यह सवाल तो सत्तारूढ़ दल से ही पूछा जाएगा। जब आप सैन्य सुरक्षा के नाम पर भी श्रेय लेने से नहीं चूकते तो फिर आपको नाकामियों पर जवाब तो देना ही होगा। देश के युवाओं, किसानों, गृहणियों और बच्चों की जरूरतें आपके राष्ट्रवाद के भाषणों से पूरी नहीं होंगी। उनके लिए जमीनी तौर पर करना होगा। सियासी दलों और कारपोरेट के अच्छे दिनों के लिए हमने सरकार नहीं बदली थी, बल्कि अपने देश और देशवासियों के अच्छे दिनों के लिए सत्ता सौंपी थी। अब आप वह नहीं दे सके तो इस नाकामी की जिम्मेदारी लीजिए और उसके लिए राष्ट्र से माफी भी मांगिये। हमारी भक्ति देश के प्रति है, न कि किसी सियासी दल या व्यक्ति के प्रति।

जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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