पल्स : अजय शुक्ल
ज्ञान नहीं, सिर्फ शैक्षिक प्रमाणपत्र की शिक्षा
भारत में शिक्षा व्यवस्था इस कदर पंगु हुई है कि न शिक्षकों को ज्ञान है और न शैक्षिक संस्थानों के संचालकों को। सरकारी शिक्षा व्यवस्था मरणासन्न हालत में खड़ी है। देश में तकरीबन 16 लाख स्कूल हैं जिनमें हालत यह है कि करीब सवा लाख स्कूल वे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। वह एक शिक्षक भी शैक्षिक मानदंडों के मुताबिक होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। ऐसे में हम देश का भविष्य बनाने का जिम्मा जिन हाथों को सौंप रहे हैं वह भी ज्ञान विहीन नजर आते हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन-भत्ता लगातार बहुत अच्छा हुआ मगर उनका स्तर लगातार गिरता गया है। इसका नतीजा यह है कि हमारी एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो ज्ञान नहीं बल्कि सिर्फ प्रमाणपत्र बटोरने में लगी हुई है। इन हालात में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अमूलचूल बदलाव की जरूरत है।
हम यह चर्चा अचानक क्यों कर रहे हैं यह सवाल लाजिमी है। तो बताते चलें कि पिछले दिनों हमें कुछ सरकारी स्कूलों में जाने का अवसर मिला। वहां जब शिक्षकों से बात हुई तो वह अपनी दुर्दशा को लेकर रोते नजर आए। हमने चर्चा आगे बढ़ाई तो पता चला कि 50 फीसदी शिक्षक ऐसे हैं जिन्हें अपने विषय का ही ज्ञान नहीं है। कई जगह तो यह देखने को मिला कि विज्ञान का शिक्षक कला विषय पढ़ा रहा है और कई जगह हिंदी का शिक्षक ही अंग्रेजी भी पढ़ा रहा है। एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक से जब सामान्य ज्ञान की कुछ बातें की तो वह जो उत्तर दे रही थी, उनको सुनकर कोई भी आत्मसम्मान वाला शिक्षक आत्महत्या करने को विवश हो जाए। ऐसे शिक्षक जो सामान्य भाषा और ज्ञान नहीं रखते वह भविष्य की पीढ़ी तैयार करने में जुटे हैं। सरकारों ने वोट बैंक के लालच में शिक्षकों का वेतन भत्ता इतना बढ़ा दिया कि तमाम रसूखदारों ने भी अपने घरों के तमाम नाकाबिलों को शिक्षक बनवा दिया। गलत परंपरा के जरिए भर्ती हुए यह शिक्षक क्या तैयार कर रहे हैं यह चिंतन का विषय है। अधिकारी वहीं विजिट करते हैं जहां उन्हें लाभ की उम्मीद होती है अन्यथा कुछ नहीं।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो हम यह पाते हैं कि बीते सालों में दिल्ली को छोड़कर देश के हर राज्य में सरकारी स्कूलों की दशा बद से बदतर हुई है। जहां पूरे देश में सरकारी स्कूलों में करीब 20 लाख शिक्षकों के स्वीकृत पद खाली पड़े हुए हैं, वहीं 38 फीसदी स्कूलों के भवन जीर्णशीर्ण हालत में हैं, जबकि 18 फीसदी स्कूल भवन विहीन हैं और वो विभिन्न तरह की मदद से चल रहे हैं। इन स्कूलों में भले ही सरकार मिड डे मील उपलब्ध कराती हो, मगर बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के बजाय स्कूल ड्रेस और मिड डे मील के लालच में आते हैं। इस सरकारी दशा का नतीजा यह हो रहा है कि शिक्षक अपनी नौकरी बचाने के लिए बच्चों का नाम रजिस्टर करता है, मगर उन्हें शिक्षा नहीं दे पाता। कुछ राज्यों ने मॉडल स्कूल बनाए हैं, मगर वहां भी शिक्षा के लिए कोई मॉडल व्यवस्था नहीं है। चंडीगढ़ जैसे मॉडल शहर में हमें तमाम कॉलोनियों के सरकारी स्कूलों की दशा बद से बदतर मिली। यहां कुछ स्कूल तो हाउसिंग बोर्ड के जर्जर मकानों में चल रहे हैं, जहां न बच्चे सुरक्षित हैं न शिक्षक और व्यवस्था।
शिक्षा की इस दुर्दशा का असर यह हुआ है कि सिर्फ आठ सालों में डेढ़ करोड़ बच्चों ने सरकारी स्कूलों से किनारा किया है, जबकि निजी स्कूलों में बच्चों की संख्या में भारी इजाफा हुआ और वहां करीब पौने दो करोड़ नए बच्चे आए हैं। सरकारी स्कूलों से मोह भंग होने का कारण वहां की शिक्षा का स्तर निम्नतम होना है। ऐसा भी नहीं है कि निजी स्कूलों में बहुत बेहतर शिक्षा दी जा रही है, मगर सरकारी स्कूलों की तुलना में काफी अच्छी है। इसके चलते निजी स्कूल भी लाभ-हानि के गणित को साध रहे हैं। सरकारी प्रयासों के कागजों में सिमटे होने से हालत यह हो गई है कि हर मोहल्ले-गांव में शिक्षा की दुकानें (निजी स्कूल) खुलने लगी हैं। यहां शिक्षकों की हालत बेहद खराब है क्योंकि उनको वेतन के नाम पर कुछ हजार रुपए पकड़ा दिए जाते हैं और काम दोगुना लिया जाता है। कई निजी स्कूलों में भी बहुत अच्छी स्थिति नहीं है, मगर अच्छे संसाधनों वाले सरकारी स्कूल से उनका शैक्षिक स्तर अच्छा है।
हमारे नीति नियंताओं के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह इस बात पर ध्यान दें कि कैसे स्कूल को पुन: ज्ञान का मंदिर बनाया जाए। यह नौकरी या दूसरे रोजगारों के लिए सिर्फ शैक्षिक प्रमाणपत्र बांटने वाले संस्थान में न बदलें। यह भी जरूरी है कि हम ज्ञानवान भारत का भविष्य तैयार करें, जो यह समझ सके कि गुरु नानक देव जी, गोरखनाथ जी और संत कबीर अलग-अलग शताब्दियों में हुए थे। किसी के कह देने मात्र से हम किसी व्यक्ति, नेता या शख्सियत के बारे में धारणा न बना लें, बल्कि उनके बारे में इतना प्राथमिक ज्ञान हो कि सच और झूठ को पहचान सकें। सत्य और समझ सिर्फ धन कमा लेने से विकसित नहीं हो जाती। इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। बगैर ज्ञान के प्राप्त हुआ धन भी वह सुख नहीं दे सकता, जिसकी हम तलाश करते हैं।
यह भी वक्त की जरूरत है कि हम ज्ञान के साथ साम्यक समझ और नैतिकता का दायरा बढ़ाएं। यह कार्य हमारे स्कूलों के स्तर से ही शुरू होगा। इसके लिए हमें पुन: शिक्षा के मंदिर स्थापित करने होंगे न कि प्रमाणपत्र दायी संस्थान। हमें बच्चों को सिर्फ पास होने या अधिक अंक प्राप्त करने की स्ट्रेटजी बताने के बजाय उन्हें पूर्ण योग्य बनाने वाले गुरु नियुक्त करने होंगे न कि सिफारिशी और किसी एक वैचारिक सोच के गुलाम। इस देश को अगर बचाना है तो सबसे पहले इन शिक्षा के मंदिरों की हालत सुधारनी होगी नहीं तो बेरोजगार अयोग्य प्रमाणपत्र धारियों की फौज खड़ी होगी जो अराजक होकर विध्वंसक हालात पैदा करेगी।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी के प्रधान संपादक हैं )
ज्ञान नहीं, सिर्फ शैक्षिक प्रमाणपत्र की शिक्षा
भारत में शिक्षा व्यवस्था इस कदर पंगु हुई है कि न शिक्षकों को ज्ञान है और न शैक्षिक संस्थानों के संचालकों को। सरकारी शिक्षा व्यवस्था मरणासन्न हालत में खड़ी है। देश में तकरीबन 16 लाख स्कूल हैं जिनमें हालत यह है कि करीब सवा लाख स्कूल वे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। वह एक शिक्षक भी शैक्षिक मानदंडों के मुताबिक होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। ऐसे में हम देश का भविष्य बनाने का जिम्मा जिन हाथों को सौंप रहे हैं वह भी ज्ञान विहीन नजर आते हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का वेतन-भत्ता लगातार बहुत अच्छा हुआ मगर उनका स्तर लगातार गिरता गया है। इसका नतीजा यह है कि हमारी एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो ज्ञान नहीं बल्कि सिर्फ प्रमाणपत्र बटोरने में लगी हुई है। इन हालात में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अमूलचूल बदलाव की जरूरत है।
हम यह चर्चा अचानक क्यों कर रहे हैं यह सवाल लाजिमी है। तो बताते चलें कि पिछले दिनों हमें कुछ सरकारी स्कूलों में जाने का अवसर मिला। वहां जब शिक्षकों से बात हुई तो वह अपनी दुर्दशा को लेकर रोते नजर आए। हमने चर्चा आगे बढ़ाई तो पता चला कि 50 फीसदी शिक्षक ऐसे हैं जिन्हें अपने विषय का ही ज्ञान नहीं है। कई जगह तो यह देखने को मिला कि विज्ञान का शिक्षक कला विषय पढ़ा रहा है और कई जगह हिंदी का शिक्षक ही अंग्रेजी भी पढ़ा रहा है। एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक से जब सामान्य ज्ञान की कुछ बातें की तो वह जो उत्तर दे रही थी, उनको सुनकर कोई भी आत्मसम्मान वाला शिक्षक आत्महत्या करने को विवश हो जाए। ऐसे शिक्षक जो सामान्य भाषा और ज्ञान नहीं रखते वह भविष्य की पीढ़ी तैयार करने में जुटे हैं। सरकारों ने वोट बैंक के लालच में शिक्षकों का वेतन भत्ता इतना बढ़ा दिया कि तमाम रसूखदारों ने भी अपने घरों के तमाम नाकाबिलों को शिक्षक बनवा दिया। गलत परंपरा के जरिए भर्ती हुए यह शिक्षक क्या तैयार कर रहे हैं यह चिंतन का विषय है। अधिकारी वहीं विजिट करते हैं जहां उन्हें लाभ की उम्मीद होती है अन्यथा कुछ नहीं।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो हम यह पाते हैं कि बीते सालों में दिल्ली को छोड़कर देश के हर राज्य में सरकारी स्कूलों की दशा बद से बदतर हुई है। जहां पूरे देश में सरकारी स्कूलों में करीब 20 लाख शिक्षकों के स्वीकृत पद खाली पड़े हुए हैं, वहीं 38 फीसदी स्कूलों के भवन जीर्णशीर्ण हालत में हैं, जबकि 18 फीसदी स्कूल भवन विहीन हैं और वो विभिन्न तरह की मदद से चल रहे हैं। इन स्कूलों में भले ही सरकार मिड डे मील उपलब्ध कराती हो, मगर बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के बजाय स्कूल ड्रेस और मिड डे मील के लालच में आते हैं। इस सरकारी दशा का नतीजा यह हो रहा है कि शिक्षक अपनी नौकरी बचाने के लिए बच्चों का नाम रजिस्टर करता है, मगर उन्हें शिक्षा नहीं दे पाता। कुछ राज्यों ने मॉडल स्कूल बनाए हैं, मगर वहां भी शिक्षा के लिए कोई मॉडल व्यवस्था नहीं है। चंडीगढ़ जैसे मॉडल शहर में हमें तमाम कॉलोनियों के सरकारी स्कूलों की दशा बद से बदतर मिली। यहां कुछ स्कूल तो हाउसिंग बोर्ड के जर्जर मकानों में चल रहे हैं, जहां न बच्चे सुरक्षित हैं न शिक्षक और व्यवस्था।
शिक्षा की इस दुर्दशा का असर यह हुआ है कि सिर्फ आठ सालों में डेढ़ करोड़ बच्चों ने सरकारी स्कूलों से किनारा किया है, जबकि निजी स्कूलों में बच्चों की संख्या में भारी इजाफा हुआ और वहां करीब पौने दो करोड़ नए बच्चे आए हैं। सरकारी स्कूलों से मोह भंग होने का कारण वहां की शिक्षा का स्तर निम्नतम होना है। ऐसा भी नहीं है कि निजी स्कूलों में बहुत बेहतर शिक्षा दी जा रही है, मगर सरकारी स्कूलों की तुलना में काफी अच्छी है। इसके चलते निजी स्कूल भी लाभ-हानि के गणित को साध रहे हैं। सरकारी प्रयासों के कागजों में सिमटे होने से हालत यह हो गई है कि हर मोहल्ले-गांव में शिक्षा की दुकानें (निजी स्कूल) खुलने लगी हैं। यहां शिक्षकों की हालत बेहद खराब है क्योंकि उनको वेतन के नाम पर कुछ हजार रुपए पकड़ा दिए जाते हैं और काम दोगुना लिया जाता है। कई निजी स्कूलों में भी बहुत अच्छी स्थिति नहीं है, मगर अच्छे संसाधनों वाले सरकारी स्कूल से उनका शैक्षिक स्तर अच्छा है।
हमारे नीति नियंताओं के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह इस बात पर ध्यान दें कि कैसे स्कूल को पुन: ज्ञान का मंदिर बनाया जाए। यह नौकरी या दूसरे रोजगारों के लिए सिर्फ शैक्षिक प्रमाणपत्र बांटने वाले संस्थान में न बदलें। यह भी जरूरी है कि हम ज्ञानवान भारत का भविष्य तैयार करें, जो यह समझ सके कि गुरु नानक देव जी, गोरखनाथ जी और संत कबीर अलग-अलग शताब्दियों में हुए थे। किसी के कह देने मात्र से हम किसी व्यक्ति, नेता या शख्सियत के बारे में धारणा न बना लें, बल्कि उनके बारे में इतना प्राथमिक ज्ञान हो कि सच और झूठ को पहचान सकें। सत्य और समझ सिर्फ धन कमा लेने से विकसित नहीं हो जाती। इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। बगैर ज्ञान के प्राप्त हुआ धन भी वह सुख नहीं दे सकता, जिसकी हम तलाश करते हैं।
यह भी वक्त की जरूरत है कि हम ज्ञान के साथ साम्यक समझ और नैतिकता का दायरा बढ़ाएं। यह कार्य हमारे स्कूलों के स्तर से ही शुरू होगा। इसके लिए हमें पुन: शिक्षा के मंदिर स्थापित करने होंगे न कि प्रमाणपत्र दायी संस्थान। हमें बच्चों को सिर्फ पास होने या अधिक अंक प्राप्त करने की स्ट्रेटजी बताने के बजाय उन्हें पूर्ण योग्य बनाने वाले गुरु नियुक्त करने होंगे न कि सिफारिशी और किसी एक वैचारिक सोच के गुलाम। इस देश को अगर बचाना है तो सबसे पहले इन शिक्षा के मंदिरों की हालत सुधारनी होगी नहीं तो बेरोजगार अयोग्य प्रमाणपत्र धारियों की फौज खड़ी होगी जो अराजक होकर विध्वंसक हालात पैदा करेगी।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी के प्रधान संपादक हैं )

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