Saturday, April 13, 2019

यह सुशासन नहीं, सुव्यवस्था चाही थी

पल्स : Ajay Shukla

यह सुशासन नहीं, सुव्यवस्था चाही थी 

देश सांप्रदायिकता के चरम पर जी रहा है। जाति और धर्म के नाम पर दंगे होना आम बात हो गई है। गाय के नाम पर मानव और मानवता की हत्या की जा रही है। धार्मिक स्थलों के नाम पर लोगों को बेसहारा किया जा रहा है। युवा कुंठा और बेरोजगारी का शिकार हैं। बेटियों की लाज उनके अपने ही लूट रहे हैं। डिजिटल इंडिया ने बच्चों तक को पोर्न इंडिया का रूप दिखा दिया है। स्मार्ट सिटी के नाम पर स्लम विकसित होने लगे हैं। अन्नदाता सरकारी नीतियों का शिकार हो रहे हैं। उद्योग धंधे संकट के दौर से गुजर रहे हैं। व्यापारी मानसिक विकलांगता का शिकार हैं। सड़कों पर अराजकता पनप रही है। व्यवस्था के नाम पर सरकारी अधिकारियों और मुलाजिमों की चांदी है। बैंकें डेडमनी के रोग से पीड़ित हैं और महंगाई दर चरम पर है। उच्च शिक्षण संस्थाओं को विचारधाराओं के नाम पर बांटा जा रहा है। विद्यार्थियों के मन में कलुष भरा जा रहा है। इन सब के बाद तुर्रा यह है कि देश में सुशासन स्थापित हो रहा है। अगर यह सुशासन है तो हमें मंजूर नहीं।

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश होने का दम भरने वाले भारत में पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हो गया कि इतने सवाल खड़े हैं मगर जवाब कोई नहीं दे पा रहा। जब भी कोई सवाल उठाता है तो उसको राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जाता है। जब कोई वैदिक और धार्मिक सिद्धांतों पर बात करता है तो उसे धर्मभ्रष्ट, वो लोग घोषित करते हैं जो धर्म का ओरछोर नहीं जानते। तब और भी अजब स्थिति होती है जब तमाम संवैधानिक और लोकतांत्रिक उच्च पदों पर बैठे लोग निम्नस्तरीय बातें करते हैं। उनके कुतर्क देख सुनकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें सिर्फ विध्वंस करने का जिम्मा सौंपा गया है। राष्ट्रवादी होने का दम भरने वाले स्वयं राष्ट्रभक्ति का अर्थ नहीं समझते। कुछ सकारात्मक करने के बजाय नकारात्मक करने के लिए उत्तेजना पैदा की जा रही है। सरकारी योजनायें सिर्फ ब्रांडिंग का साधन मात्र बन गई हैं और नतीजों से किसी को कोई सरोकार नहीं है। मूल समस्याओं और उनके निवारण के लिए कुछ नहीं किया जा रहा। नैतिकता और मूल्यों की कीमत सबसे कम हो गई है।

आप सोचेंगे कि हमको क्या हो गया और हम ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं? इसका जवाब 2013 में जाकर मिलेगा, जब हम चिंता और चिंतन में थे। देश अजब हाल से गुजर रहा था। यूपीए-2 की सरकार की कई नीतियों और काम करने के तरीकों ने देश को बेचैन कर दिया था। लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि सांप्रदायिक कौन है, वो जो हिंदुओं की राजनीति कर रहे हैं या वो जो अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की नीति अपना रहे हैं? क्योंकि दोनों ही पक्ष सांप्रदायिकता के आधार पर वोट बैंक बनाने में जुटे थे। सरकारें तमाम बड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थीं और स्वतंत्र शक्तिशाली लोकपाल की मांग विपक्ष तथा नागरिक संगठन उठा रहे थे। सब कुछ ठहर सा गया था। एक स्वच्छ, ईमानदार, जन्मुखी, लोककल्याणकारी सरकार की देश में मांग उठ रही थी। ऐसे में मृतप्राय भाजपा ने नरेंद्र मोदी का चरित्र चित्रण करते हुए उन्हें एक उम्मीद के तौर पर प्रस्तुत किया। देश ने इस व्यक्तित्व पर यकीन जताया और पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी। उनके हर फैसले को देशहित में मानते हुए सभी ने स्वीकार किया। राज्यों की सूबेदारी भी एक-एक कर सभी जगह उनके नुमाइंदों को ही सौंप दी मगर 60 महीने मांगने वाली भाजपा से जब 55 महीने बाद पूछा जाता है कि क्या किया, तो जवाब में वह सामने आता है जो पहले बताया जा चुका है।

देश उन समस्याओं के भंवरजाल में फंसा है, जो मौजूदा भाजपा सरकार की गलत नीतियों की ही देन नही बल्कि पूर्ववर्ती सरकारों की गलत नीतियों का भी नतीजा हैं। पिछली सरकारों ने अगर सार्थक और पूर्ण नियोजित तरीके से काम किया होता तो शायद ऐसी समस्यायें खड़ी ही न होतीं। न ही उन दलों को अपनी सत्ता खोनी पड़ती। बहराल, पिछली सरकारों ने कुछ ऐसा गलत किया था कि देश की जनता ने उन्हें नकार दिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को न सिर्फ सत्ता की चाबी सौंपी बल्कि पूरा समर्थन भी दिया। मोदी ने भी देश को सकारात्मक दिशा में ले जाने की राह दिखाई, वायदे किये। देश ने धैर्य रखा और उनके हर कड़े फैसले को कड़वी दवाई समझकर पी लिया। 55 माह गुजरने के बाद भी जब लोग देखते हैं कि 2013 और 2018 की विदाई के वक्त कुछ नहीं बदला। बदला है तो सिर्फ मुखौटा। बदला है तो सत्तारूढ़ दल की आर्थिक और सामाजिक दशा, बदला है तो सिर्फ सत्ताशीन नेताओं के बयान। अच्छे दिनों की आस में युवाओं ने नौकरी पाने की उम्र खो दी और किसान दर्द में कराह रहा है। बेटियां लाज बचाती घूम रही हैं।

सुशासन, से अपेक्षा की गई थी कि सरकारी दफ्तरों में घूसखोरी और सुविधा शुल्क खत्म हो जाएगा मगर दोनों में बढ़ोत्तरी हो गई है। संस्थागत शुल्क भी बढ़ा और नीचे से लिये जाने वाला भी। देश के प्रधानमंत्री इंजीनियरिंग और प्रोफेशनल डिग्रीधारी बेरोजगारों को सलाह देते हैं कि वो पकौड़े की दुकान खोल लें, चाय बेचने लगें। उनके मंत्री कहते हैं कि रेप की घटनाओं में अधिकतर निकट संबंधी ही होते हैं। रेप सामाजिक अपराध है, इस पर शोर नहीं मचाना चाहिए बल्कि समाज को चिंतन करना चाहिए। महंगाई पर जब भी सरकारी जवाब आता है तो यही कहा जाता है कि यह वैश्विक है। जनता की समस्याओं पर सवाल उठाने वाले मीडिया को न जाने किन निकृष्ठ संज्ञाओं से विभूषित किया जाता है, वह सुनकर भी शर्म आती है। हमने साढ़े चार साल पहले एक रचनात्मक सरकार का चुनाव किया था। अब चुनने वाले ही सवालों के घेरे में हैं। हमने सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने नहीं बल्कि समानता वाले समाज की रचना की अपेक्षा की थी। धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव खत्म करने वाली सरकार बनाई थी। हमने बेरोजगारी और समस्याओं को खत्म करने वाले सरकार चुनी थी, न कि पिछले कामों को सिर्फ आगे बढ़ा देने और उन्हें उपलब्धियों के तौर पर प्रस्तुत करने वाली। देश को सुव्यवस्था चाहिए, न कि अराजकता पैदा करने वाला सुशासन। हमें आरएसएस के संस्कारों वाली सरकार की जरूरत है न कि सत्तालोलुप तुष्टीकरण वाली सरकार की। समाज को बांटने नहीं बल्कि जोड़ने और हर वर्ग, संप्रदाय का दर्द महसूस करके उसे कम करने वाली सरकार चाहिए।


जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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