Saturday, April 13, 2019

अंधेरे में रहने वालों के घर रोशन कीजिए

पल्स- Ajay Shukla
अंधेरे में रहने वालों के घर रोशन कीजिए
अंधेरा अभिशाप है। यह मजबूरी भी है और सामर्थहीनता भी। हर सामर्थवान और प्रकाशमय जीवन जीने वाले व्यक्ति और संस्थाओं से समाज यह उम्मीद करता है कि वह दूसरों का भी अंधेरा दूर करेंगे। लोकसत्ता प्राप्त व्यक्ति से तो यह उम्मीद हक के साथ की जाती है। वो इस उम्मीद को बगैर किसी निहित स्वार्थ के पूरा करता है तो सर्वमान्य इतिहास के पन्नों में उसे ससम्मान याद किया जाता है। अगर वो ऐसा करने की यथाशक्ति कोशिश करता है तब भी याद किया जाता है मगर वो इसके उलट निहित स्वार्थ और कुछ वर्गों के लिए ही काम करता है तो उसको लानत दी जाती है। शायद दीप पर्व पर कुछ ऐसा ही घटा जो किसी भी स्थिति में प्रशंसनीय नहीं था। कुछ वर्गों के तुष्टीकरण के लिए दीपोत्सव का शाही आयोजन करना हमारे देश के लिए सुखद नहीं हो सकता।
सियासी गणित में सबसे ताकतवर प्रदेश में दीपोत्सव पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए मगर उसी प्रदेश में लाखों लोग आधा पेट खाकर ही सोये जबकि हजारों लोग भूखे रहे। लाखों ऐसे भी घर रहे जहां अंधेरा पसरा रहा। हमारी संस्कृति में अमावस्या की रात को अंधेरे का प्रतीक माना गया है। इसे दूर करने के लिए दीप जलाने और दीपदान करने का चलन रहा है। धरा से अंधेरे को खत्म करने का सबसे अच्छा साधन प्रकाश करना यानी प्रकाशोत्सव मनाना है। सिख धर्म में सिखाया जाता है कि सबसे बड़ी पूजा या उत्सव तब है जब आप बगैर भेदभाव के भूखों को खाना खिलाते हैं। मुस्लिम धर्म में ईद तब मनाई जाती है जब पड़ोसी के यहां लजीज खाने की खुशबू आने लगे। ईसाई धर्म मानवता की सेवा को उत्सव मानता है। सनातन धर्म में मित्रों, सहयोगियों में जरूरत की वस्तुओं से लेकर दीप दान करने की व्यवस्था है। यह किसी यश या सम्मान, स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि इस कारण कि दूसरे के घर में भी खुशियां लाई जा सकें। इस काम को पूरा करने में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सत्ता-सरकार की है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने आमजन की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए उस इवेंट कंपनी पर खर्च किये, जिसने अयोध्या के घाट पर दीप जलाने का आयोजन किया। विदेशी मेहमान बुलाकर उसे न्यायसंगत घोषित करने की कोशिश की गई। उसी अयोध्या में हजारों लोग ऐसे भी थे जिनके घरों में गुरबत का अंधेरा पसरा रहा। सरकार ने जितना धन इवेंट कंपनी पर खर्च किया, उसका आधा भी धन अयोध्या और आसपास के गरीबी रेखा के नीचे के लोगों पर खर्च करके उनको दीपोत्सव मनाने का जिम्मा देती तो शायद वो घर रोशन होते जो घोर अंधेरे में डूबे थे। महात्मा गांधी कहते थे कि रोशनी हमारे भीतर होती है और अंधेरा भी। हमें उनमें चुनना पड़ता है। विडंबना यह हैं कि इन दिनों हम अंधेरे से अधिक रोशनी से घिरे हैं, जो हमारी आंखों को चौंधिया रही है। हम सिर्फ रोशनी देख रहे और दूसरा पहलू देखने को तैयार नहीं। विज्ञान प्रमाणित करता है कि बहुत अधिक प्रकाश लोगों को अंधा कर देता है। सत्ता की रोशनी में डूबे सियासी लोगों और नौकरशाहों की हालत कमोबेश यही है।
हम आज वाराणसी की यात्रा से लौटे। पिछले कुछ सालों में बहुत से बदलाव आये हैं। कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक। तकलीफ तब होती है जब सत्ता शीर्ष पर बैठे ऐसे व्यक्ति के हाथ में इस शहर की नुमाइंदगी हो जो देश का भाग्य विधाता बना बैठा हो मगर शहर को कुछ उल्लेखनीय न दे पाया हो। विश्व के प्राचीनतम शहरों में शुमार वाराणसी का अंधेरा जब देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति भी न दूर कर पाये तो उम्मीद किससे की जा सकती है। एक पुल महीने भर से इस व्यक्ति की ब्रांडिंग के इंतजार में बंद हो और नागरिक परेशान हों। सिर्फ फोटो छपवाने/दिखाने के खेल में जनहित-जनपीड़ा को नजरांदाज किया जा रहा है। प्रकाश के नाम पर अंधेरा बढ़ाया जा रहा है। दीपोत्सव अपना मर्म खो दे। हमें उसे दोबारा उसी मर्म तक पहुंचना होगा और नई परिस्थितियों के मुताबिक मूल्यांकन करना होगा।
देश के जो हालात हैं, उनमें हमें दूसरों के दर्द पर द्रवित होने वाले नेता की आवश्यकता है। वह राजा चाहिए जो राजा होने के साथ ही वास्तविक अर्थों में हमारा सेवक हो और जिसमें हमारे जीवन के अंधेरे को खत्म करने की ललक भी हो। हमारा दुर्भाग्य है कि ऐसा ही नहीं हो रहा है। फोटो लगवाकर अपनी ब्रांडिंग करने वाले नेता देश हित में नहीं हो सकते हैं। 70 सालों की यात्रा में देश ने एक अहम ऊंचाई पाई है। यह किसी एक दल की नहीं बल्कि सभी सियासी दलों और नेताओं की ईमानदार मेहनत का फल है। किसी की आलोचना मात्र करके दूसरा बड़ा नहीं बनता और न ही वह दूसरों के घरों में प्रकाश करता है बल्कि वह रोशनी करने के हर संभव प्रयास के द्वारा बड़ा बनता है। पिछले दिनों जब इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया गया, तभी यह तय माना जाने लगा कि नामों और नाम बदलने की सियासत रुकने वाली नहीं है। अब फैजाबाद का नाम भी अयोध्या कर दिया गया है। सरकार ने कई शहरों-कस्बों के नाम बदलने के अभियान शुरू कर दिये हैं। फिर से वही सवाल खड़ा होता है कि नाम बदलने से क्या होगा? लोग और सियासी जन अपने इतिहास को अपने धार्मिक इतिहास से जोड़कर देखने लगते हैं। ऐसा निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए होता है, न कि देश-समाज और जन के हित में। जरूरत यह है कि हमारे राजनेता और लोकसत्ताधारी वास्तविक रूप से अंधेरा दूर करने का प्रयास करें, जो दीपोत्सव में बदल जाए। विकास के नाम पर सिर्फ अपने चेहरे चमकाने और हर जगह अपनी फोटो लगवाने की राजनीति न करें बल्कि समग्र विकास पर ध्यान केंद्रित करें। अपने पूर्ववर्तियों की आलोचना करने के बजाय उनकी अच्छाइयों की तारीफ करें और कमियों में सुधार करें। जब ऐसा करेंगे तभी अंधेरा दूर होगा और हर घर-दिल रोशन भी।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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