Saturday, April 13, 2019

छोटे किसानों और लघु उद्योगों को मदद की दरकार

PULSE.. 
छोटे किसानों और लघु उद्योगों को मदद की दरकार 
भारत आदिकाल से कृषि प्रधान देश रहा है। प्रकृति ने इस देश को अकूत संसाधन दिये हैं, जिसका लाभ अपने श्रम के जरिए किसानों ने उठाया। कुटीर उद्योगों ने भी देश को उन्नत मार्ग दिखाया। किसान और लघु उद्योग के कर्मयोगियों के नियोजित विकास की परिणिति भारत को मिली “सोने की चिड़िया” की उपाधि के रूप में। इन मूल उद्यमों ने भारत की अर्थव्यवस्था को इतनी बेहतर बना दिया कि अरब और यूरोप के तमाम देशों ने हमें पाने के लिए सबकुछ किया। आक्रांताओं और साम्राज्यवादी देशों की सोच रही कि भारत की संपत्ति लूटेंगे और यहां की प्राकृतिक संपदाओं का मजा लेंगे। उनके इस लालच में किये गये हमलों ने हमारी संस्कृति से लेकर सभ्यता तक को बिगाड़ा। हमारा किसान और लघु उद्यमी इसमें सदैव पिसता रहा। यह दुख का विषय रहा कि हमारे शासकों ने उनके लिए कुछ ऐसा सार्थक नहीं किया कि वे मजबूत हो सकें। राजाओं के लिए किसान और कुटीर उद्योग चलाने वाले उनके ऐश ओ आराम के लिए “कर देने वाले” ही बने रह गये। राजाओं की इस नीति के बाद भी किसान और उद्यमी अपने श्रम के बूते देश को देते रहे। दुर्भाग्य की बात है कि देश की आजादी तक उन्हें हमने कुछ नहीं दिया और वे इस हालत में नहीं आ पाये कि अपनी जरूरतें भी पूरी कर सकें। आज जब उनके हित को सोचा जा रहा है तो तमाम लोग बेजा छाती पीट रहे हैं।
आजादी के बाद एक नये युग का शुभारंभ हुआ। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस समस्या को गंभीरता से लिया। उन्होंने किसान और उद्योगों की समृद्धि को ध्यान में रखते हुए सत्ता संभालने के छह माह के भीतर ही विश्व के दूसरे सबसे बड़े भाखड़ा नंगल बांध और नेशनल फर्टिलाइजर लि. (एनएफएल) की नीव रखी। उस वक्त हमारे देश में अपना पेट भरने तक का अनाज भी नहीं हो पाता था। हमारे यहां उद्योगों के नाम पर भी कुछ नहीं था। पंडित नेहरू के प्रयासों ने न सिर्फ किसानों को आत्मनिर्भर बनाया बल्कि उद्योगों को नई दिशा दी। नतीजतन देश ने हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति, औद्योगिक क्रांति, शैक्षिक क्रांति और सैन्य क्रांति करके एक सशक्त भारत का निर्माण किया। नेहरू के बाद की सरकारों की जिम्मेदारी थी कि वे पंडित नेहरू के कार्यों को आगे बढ़ायें। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसानों और लघु उद्यमियों को समृद्ध बनायें, जिससे वे भी देश को अपना संपूर्ण दे सकें। लाल बहादुर शास्त्री ने अपने डेढ़ वर्ष के शासन में पंडित नेहरू के सपने को आगे बढ़ाने की कोशिश की मगर उनकी असमयिक मृत्यु से देश को झटका लगा। वह हारा हुआ भारत छोड़कर गये थे, जो उनके बाद की सरकार के लिए चुनौती था। इंदिरा गांधी ने उस चुनौती का सामना किया और सैन्य बल को मजबूत करने में लग गईं। उन्होंने पाकिस्तान को दो टुकड़े किया और सिक्किम को मिला लिया। उन्होंने अय्याशी करने वाले राजाओं को सीमित कर उनके धन को देश के निर्माण में लगाया। इन चुनौतियों से जुझते हुए उन्हें छोटे किसानों और लघु उद्योगों के लिए कुछ करने का वक्त नहीं मिला। हालात बिगड़े और वह 1977 में चुनाव हार गईं। गैर कांग्रेसी सरकार में देश की हालत और भी खराब हुई, तो जनता ने इंदिरा गांधी पर फिर से भारी विश्वास जताया। इस बार इंदिरा ने सुधार किया और उन्होंने किसानों तथा लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की दिशा में काम शुरू किया।
देश के समक्ष चुनौती सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में खड़ी हुई। उन्होंने युवाओं को सक्षम बनाने की दिशा में तो क्रांति की मगर किसान और लघु उद्यमी फिर पिछड़ गया। राजीव के बाद किसानों और लघु उद्योगों की दशा सुधारने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ। डा. मनमोहन सिंह ने अपनी पहली सरकार में पिछली सरकारों की गलतियां सुधारने पर काम किया मगर दूसरी सरकार में वह उसे अमलीजामा नहीं पहना पाये। उन्होंने न तो स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू की और न ही खुद के बनाये एमएसएमई मंत्रालय को सक्रिय कर पाये। दोनों क्षेत्रों में पिटने से सरकार के अच्छे काम भी खराब दिखने लगे। तमाम आरोपों प्रत्यारोपों के बीच डा. मनमोहन सरकार चली गई और नरेंद्र मोदी सरकार आई। उम्मीद की गई कि यह सरकार किसान और लघु उद्योग हितैषी होगी मगर साढ़े चार साल में ऐसा कुछ नहीं हुआ कि इनकी हालत सुधरे। हालांकि वादे किये गये कि किसान की आमदनी दोगुनी हो जाएगी। वह तो नहीं हुई मगर महंगाई जरूर दोगुनी हो गई। ऐसे में किसान खुद को ठगा महसूस कर रहा है और लघु उद्यमी जीएसटी की मार से बेहाल है। भले ही एमएसएमई सेक्टर का जीडीपी में आठ फीसदी योगदान हो मगर देश के पांच करोड़ लोग लघु उद्योगों में रोजगार पाते हैं। कृषि क्षेत्र में देश की 43 फीसदी आबादी लगी हुई है। इस आबादी के औसत से न तो कृषि योग्य भूमि है और न ही आय। हमारी सरकारों की गलत नीतियों के चलते कृषि योग्य भूमि में कंक्रीट के जंगल खड़े हो चुके हैं। वहीं कारपोरेट को सरकार का भारी संरक्षण भी समस्या बन गया है। जो भविष्य की आफत का संकेत हैं। ऐसी हालत में देश के छोटे किसानों और लघु उद्यमियों के आत्महत्या करने की घटनायें आम हो रही हैं। उसे संरक्षण और सहनुभूतिपूर्वक मदद की दरकार है।
हाल वक्त की सरकारों की दशा यह हो गई है कि उन्हें कारपोरेट और बड़े औद्योगिक घराने अपने मुताबिक चला रहे हैं। वे अपने हितों के लिए छोटे किसानों से लेकर लघु उद्यमियों तक को खत्म कर देना चाहते हैं। कारपोरेट फार्मिंग की दिशा में उतरने लगे हैं। ऐसे में अगर हमने अपने किसानों और लघु उद्यमियों को सहनुभूतिपूर्वक मदद नहीं की तो वह दिन दूर नहीं जब देश का एक बड़ा वर्ग बेरोजगार होगा। बेरोजगारों की जमात असमानता का शिकार होकर अराजक हो जाएगी। अगर हमें अपने देश और उसके भविष्य को बचाना है, तो किसानों तथा लघु उद्यमियों की समस्याओं को दूर करना होगा। किसानों को सहयोग देकर विविध बाजार एवं सहयोगी रोजगार के कुटीर उद्योगों को चलाने में मदद करनी होगी। उन्हें खेत से लेकर बाजार तक संरक्षण देना होगा। छोटे और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, जिससे वे रोजगार के साथ ही अपनी जरूरतें पूरी करने में सक्षम बन सकें। जब तक ऐसा नहीं होता, हमारा युवा इस चमक-धमक की दुनिया में भ्रमित होता रहेगा। किसान, लघु उद्यमी और बेरोजगार या तो आत्महत्या करेंगे या फिर हत्या। हमें देश को बचाना है तो इस दिशा में गंभीरता से चिंतन भी करना होगा और सार्थक काम भी।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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