Saturday, April 13, 2019

घने अंधकार में डूबता देश का भविष्य

पल्स : Ajay Shukla
घने अंधकार में डूबता देश का भविष्य
जीवन यात्रा अंधकार के खराब रास्तों से आगे बढ़ते हुए सही रास्तों से होते हुए प्रकाशमय गंतव्य की ओर जाती है। यही हमारा ध्येय भी है कि हम सकारात्मक दिशा में चलकर रचनात्मकता का परिचय दें, मगर भारत में बीते कुछ सालों में जो घटा और घट रहा है, वह हमें प्रकाशमय गंतव्य की ओर नहीं बल्कि अंधकारमय ठहराव की ओर ले जा रहा है। इसका दोष किसी सियासी दल या सरकार को नहीं दिया जा सकता है। यह दूषित होती सामाजिक व्यवस्था, सोच और नैतिकता-संस्कारों के प्रति संजीदा न होने का नतीजा है। हम उस दिशा में जा रहे हैं जो दुनिया का सबसे घिनौना कृत्य है। समाज में अगर बच्चों के साथ घिनौनी हरकतें होती हैं तो समझ लो कि पर्यावरण को खराब करने वाली हवा से भी बदतर प्रदूषण फैल चुका है। यह प्रदूषण समग्र राष्ट्र, राष्ट्रीयता और मानवता-नैतिकता को खत्म कर देगा। इसके बाद तो न भाई के लिए बहन रहेगी और न मां बच्चे का पवित्र संबंध। कमोबेश हम अनजाने में उसी दिशा में रहे हैं।
हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पश्चिमी सभ्यता के लोग हमारे वैदिक संस्कारों को ग्रहण कर रहे हैं जबकि हमारे देश में जंगली सभ्यता अपना घर बना रही है। आप सोचेंगे कि हम ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं तो बताना चाहूंगा कि पिछले 20-22 दिनों में देश में ऐसा कुछ घटा है, जिसके कारण हम खुद को न केवल शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं बल्कि घृणा का भाव उत्पन्न हो रहा है। महाराष्ट्र के पूणे में दो अबोध बच्चों का यौन उत्पीड़न किया गया। पूरे शहर में श्री गणेश उत्सव मनाया जा रहा है और वहां ऐसा कुकृत्य होता है। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर और कन्नौज में नन्हीं बच्चियां घृणित कृत्य का शिकार हुईं। हरियाणा और दिल्ली में भी ऐसा ही घटित हुआ। यह तो सिर्फ एक नजीर है, असल में ऐसे अपराध इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं कि हमारे लिए चिंता का विषय है, मगर जिम्मेदार सरकार और नीति नियंता इस पर खामोशी साधे हुए हैं। उन्हें शायद यह दिखता नहीं या फिर उनका जमीर और शर्म मर चुके हैं। बाल यौन शोषण के शिकार बच्चे मानसिक रूप से विकृत जीवन की दिशा में बढ़ रहे हैं।
सरकार और जिम्मेदार नागरिकों के लिए यह शर्म की बात है कि भारत में पिछले कुछ सालों के दौरान बच्चों के प्रति अपराधों में 300 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है। देश बेरोजगारी, महंगाई और मुद्रा अवमूलन से जूझ रहा है। विकास के नाम पर हम जाति-धर्म की लड़ाई लड़ने को आमादा हैं। सामाजिक बदलाव के नाम पर सत्ता में बैठे लोग एक एजेंडे पर काम कर रहे हैं मगर किसी के लिए यह चिंता का विषय नहीं है कि देश का भविष्य खराब हो रहा है। देश का भविष्य समझे जाने वाले बच्चे न केवल यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं बल्कि वह मानसिक और भावनात्मक रूप से टूट रहे हैं। जहां जाइए बच्चे यौन हिंसा से लेकर तमाम अपराधों का शिकार मिल जाते हैं। हर तरफ से खबर आ रही है जो हमें न सिर्फ झकझोर देती है बल्कि शर्मसार भी करती है। भारत में वर्ष 2001 से 2016 के बीच बच्चों के प्रति होने वाले अपराधों में 889 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इन सोलह सालों में बच्चों के प्रति अपराध 10,814 से बढ़कर 1,06,958 हो गए। यह स्थिति तब है जबकि हमारे देश की पुलिस एफआईआर दर्ज करने के नाम पर इतना तंग करती है कि 60 फीसदी लोग हार जाते हैं।
आपको यह भी जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि हमारे बच्चे यौन शोषण का ही नहीं बल्कि यौनिक हमलों का भी शिकार हो रहे हैं। हमें शर्मसार करने के लिए यही काफी है कि पिछले 16 सालों में बच्चों से यौन हिंसा के मामलों में 1705 फीसदी इजाफा हुआ है। इससे भी ज्यादा शर्मनाक हालात तो यह हैं कि इस तरह के अपराध समाज के विकास के साथ कम होने के बजाय बढ़ रहे हैं। पिछले तीन सालों में जहां देश दूसरी तमाम समस्याओं से जूझने में जुटा है, वहीं करीब 300 फीसदी वह बच्चे बढ़े हैं जो यौन शोषण का शिकार हुए। यहां भी वही बात सामने आती है कि अधिकतर मामले दर्ज होने के पहले ही खत्म दूषित व्यवस्था का शिकार हो जाते हैं। बच्चों को अपराधियों से बचाने के लिए सरकार ने हेल्पलाइन और पास्को एक्ट के साथ ही बाल संरक्षण आयोग बनाए हैं, मगर वह कोई रचनात्मक भूमिका अदा नहीं कर पा रहे, जैसे महिला आयोग सिर्फ कुछ लोगों के सत्ता सुख का साधन मात्र बने हुए हैं।
जमीनी हकीकत यह है कि हमारी सरकार और समाज दोनों ही बच्चों का संरक्षण सुनिश्चित कर पाने में पूर्णत: नाकाम साबित हुए हैं। जिस तरह की नीतियां और सरकार की असंवेदनशीलता सामने आ रही है उससे तो नहीं लगता कि वह भविष्य में भी कोई सुधार होगा। स्थिति यह है कि बच्चे न घर में सुरक्षित हैं और न बाहर। हमने आगरा में एक चार साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या करने के आरोपी युवक को देखा तो पता चला कि वह संस्कार सिखाने का दावा करने वाली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का पदाधिकारी था और कानून की पढ़ाई कर रहा था। इसी तरह के एक परिवार में एक शख्श ने अपनी 11 साल की भतीजी को ही हवस का शिकार बना डाला। वह भी धर्म की लड़ाई लड़ने वालों में अगुआ बना था। इन हालातों पर हमारे शीर्ष सत्ता सेवक मौन साध लेते हैं और मंत्री बेशर्मी दिखाते हुए कहते हैं कि बलात्कार कैसे रोके जा सकते हैं। यह वही लोग हैं जो ऐसे मामलों में हो-हल्ला मचाकर सत्ता तक पहुंचे हैं।
हमारे नीति नियंता सतत विकास और बच्चों के लिए स्वर्णिम भविष्य की बात करते हैं, मगर वो उनका भविष्य सुरक्षित बनाने की दिशा में कुछ सकारात्मक करने के बजाय अपने वोट बैंक को साधने की सियासत में ही व्यस्त रह जाते हैं। बच्चे भगवान का रूप होते हैं, वह देश का भविष्य हैं, आदि रटने वालों की दोगली नीति की परिणिति यह है कि हमारा भविष्य अंधकारमय और विकारों से युकत हो रहा है। अगर वक्त रहते सही दिशा में कदम नहीं उठाया तो हालात भयावह होना तय है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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