पिंजरे का तोता फड़फड़ाया तो काट दिये पंख
हमें पांच वर्ष पहले (मई 2013) देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आरएम लोढा, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ की तीन सदस्यीय खंडपीठ की वह टिप्पणी याद आती है, जब उन्होंने कोयला घोटाले में सरकारी हस्तक्षेप पर तल्खी व्यक्त करते कहा था कि सीबीआई पिंजरे का एक तोता है, इसे आजाद होना चाहिए। उस वक्त भाजपा ने इसे जोर शोर से प्रचारित किया और कहा था कि उनकी सरकार में सीबीआई पिंजरे का तोता नहीं रहेगी। जनता ने यकीन जताया, देश में बदलाव हुआ। भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ न केवल केंद्र में बल्कि देश के दो तिहाई राज्यों में सरकार बनाई। इस वक्त सीबीआई जैसी प्रतिष्ठित जांच एजेंसी में जो घट रहा है, वह किसी भी लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था वाले राष्ट्र के लिए कलंकित करने वाला है। एक उम्मीद की किरण सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग से थी मगर उनके रुख ने निराशा को खत्म करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उच्चाधिकार प्राप्त नियुक्ति समिति के फैसले ने निराशा को और भी बढ़ा दिया। कमेटी के बहुमत के फैसले से तो यही साबित हो रहा है कि अगर पिंजरे का तोता फड़फड़ाएगा तो उसके पंख काट दिये जाएंगे।
अंग्रजी हुकूमत ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आपूर्ति में घोटाले पकड़ने के लिए सैन्य विभाग के अधीन विशेष जांच का विभाग बनाया था, जो 1946 में गृह विभाग के अधीन पुलिस जांच व्यवस्था में सुधार के लिए दिल्ली पुलिस संस्थापन अधिनियम के तहत विधिक रूप से स्वतंत्र संस्था बन गया। हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में इसे केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो नाम देकर एक ऐसी जांच संस्था बनाई जो केंद्र और राज्यों के उन मामलों की जांच कर सके, जहां बड़े शामिल हों। सीबीआई को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इसे पीएमओ के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अधीन कर दिया गया। इस विभाग को भी सीबीआई की जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया गया। इसे केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में रख दिया गया। सीबीआई पर यह आरोप लगता था कि वह केंद्र सरकार की जांच एजेंसी है, जो राज्यों को डराने का काम करती है। कई बार सीबीआई का सियासी इस्तेमाल भी हुआ। यूपीए सरकार के दौरान भाजपा ने आरोप लगाया था कि यह सीबीआई असल में कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टीगेशन है।
निश्चित रूप से सीबीआई अभी भी देश की सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी है। देश की उच्च न्यायपालिका भी लोगों में यह विश्वास दिलाने का काम करती है कि वहां से इंसाफ मिलेगा मगर बीते कुछ सालों में सीबीआई का जिस तरह से सियासी फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वह दुखद है। वहीं संवैधानिक संस्थाओं का भी अब राजनीतिक दुरुपयोग होने लगा है। ऐसी संस्थाओं के नियंत्रकों का सत्ता के आगे रीढ़विहीन होकर झुक जाना, लोकतंत्र के लिए खतरा है। उच्च और उच्चतम न्यापालिका पर जिस तरह की टिप्पणियां सोशल मीडिया और चर्चाओं में सामने आ रही हैं, वो हमारे विश्वास को हिलाने वाली हैं। ऐसी संस्थाएं यकीन और दिली सम्मान से ही अपनी जगह बनाती हैं, न कि लोकलुभावन कार्यों से। न्यापालिका और संवैधानिक संस्थाओं में जब सियासी पहुंच और विचारधाराओं के आधार पर नियुक्तियां होने लगेंगी, तब ऐसे संकट खड़े होना लाजिमी है। यह वही देश है जहां तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था। उस वक्त अगर जज, इंदिरा गांधी से प्रभावित हो जाते तो निश्चित रूप से न्याय की हत्या होती। जब राजीव गांधी सहित तमाम कद्दावरों के खिलाफ बोफोर्स के कथित दलाली मामले में सीबीआई ने जांच शुरू की, तब अगर अफसर डर गए होते तो सीबीआई इतनी ताकतवर और यकीनी न होती।
हमें यह कहते हुए भी कोई गुरेज नहीं कि डॉ. मनमोहन सरकार के वक्त में कैग ने जब टूजी स्कैम की रिपोर्ट दी, तब डॉ. मनमोहन सिंह ने कोई हस्तक्षेप न करके बड़ा दिल दिखाया था। उन्होंने कथित कोयला घोटाले में भी जांच से भागने का काम नहीं किया। जब सीबीआई ने इसकी जांच में कोताही बरती तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर नाराजगी व्यक्त करने के बजाय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ही देखरेख में ही जांच कराने की बात कही थी। इस बार भी ऐसा ही होना चाहिए था। आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक बनाने का फैसला नरेंद्र मोदी सरकार का था। वर्मा को बेदाग और बेहतरीन अफसर बताकर सीबीआई को पिंजरे से मुक्त करने का दावा किया गया था। वर्मा ने जब दागदार क्षवि के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश आस्थाना को सीबीआई में रखने पर आपत्ति जताई तो उनपर ही संकट टूट पड़े। वर्मा ने जिस अफसर की शिकायत की, उसी अफसर की शिकायत पर न केवल उन्हें रातोंरात हटाया गया बल्कि अपमानित भी किया गया। अंत में सीवीसी की एक रिपोर्ट के चंद बिंदुओं के आधार पर तबादला भी कर दिया गया। इस साजिश में अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई जज शामिल होता है तो यह और भी दुखद है। हालांकि उन्होंने अपरोक्ष रूप से सफाई दी है कि प्रथम दृष्टया वर्मा आरोपित थे। उधर, वर्मा ने पद से इस्तीफा देते हुए कहा यह इंसाफ का कत्ल है।
सवाल यहीं खड़ा होता है, अगर वर्मा जांच में पाए गए तथ्यों में आरोपित हैं तो उनको सुने बिना तबादले का फैसला क्यों ले लिया गया? एफआईआर का अर्थ होता है प्रथम सूचना रिपोर्ट, तो आरोपित वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई? पुलिस सेवा नियमावली के मुताबिक तबादला कोई दंड नहीं है, ऐसे में वर्मा के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही के बजाय तबादला ही क्यों किया गया? सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस एके पटनायक ने कहा कि उन्होंने आलोक वर्मा पर लगे आरोपों की सीवीसी की जांच की बारीकी से निगरानी की थी, उन्हें वर्मा के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं मिला। जब कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं था, तो अचानक क्या आफत आ गई कि सरकार आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के रूप में 24 दिन भी बर्दास्त नहीं कर पाई? क्या आलोक वर्मा सीबीआई को बंद पिंजरे में फड़फड़ाने के दोषी हैं? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब वक्त के साथ सरकार और उसके नेताओं को देना ही पड़ेगा? सुप्रीम कोर्ट को भी अगर अपनी साख बचानी है तो उसे दूध का दूध और पानी का पानी करना होगा।
वक्त रहते अगर हमारी सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सियासी नेताओं ने मर्यादा के दायरे में रहते हुए निष्पक्षता के साथ प्रभावी कदम नहीं उठाए तो लोकतंत्र के मूल की निर्मम हत्या हो जाएगी। संवैधानिक संस्थाओं को लोग सम्मान की नजर से नहीं देखेंगे। रीढ़विहीन न्यापालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं एक स्वस्थ एवं सम्मानित राष्ट्र का निर्माण नहीं करतीं।
जय हिंद।
हमें पांच वर्ष पहले (मई 2013) देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आरएम लोढा, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ की तीन सदस्यीय खंडपीठ की वह टिप्पणी याद आती है, जब उन्होंने कोयला घोटाले में सरकारी हस्तक्षेप पर तल्खी व्यक्त करते कहा था कि सीबीआई पिंजरे का एक तोता है, इसे आजाद होना चाहिए। उस वक्त भाजपा ने इसे जोर शोर से प्रचारित किया और कहा था कि उनकी सरकार में सीबीआई पिंजरे का तोता नहीं रहेगी। जनता ने यकीन जताया, देश में बदलाव हुआ। भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ न केवल केंद्र में बल्कि देश के दो तिहाई राज्यों में सरकार बनाई। इस वक्त सीबीआई जैसी प्रतिष्ठित जांच एजेंसी में जो घट रहा है, वह किसी भी लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था वाले राष्ट्र के लिए कलंकित करने वाला है। एक उम्मीद की किरण सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग से थी मगर उनके रुख ने निराशा को खत्म करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उच्चाधिकार प्राप्त नियुक्ति समिति के फैसले ने निराशा को और भी बढ़ा दिया। कमेटी के बहुमत के फैसले से तो यही साबित हो रहा है कि अगर पिंजरे का तोता फड़फड़ाएगा तो उसके पंख काट दिये जाएंगे।
अंग्रजी हुकूमत ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आपूर्ति में घोटाले पकड़ने के लिए सैन्य विभाग के अधीन विशेष जांच का विभाग बनाया था, जो 1946 में गृह विभाग के अधीन पुलिस जांच व्यवस्था में सुधार के लिए दिल्ली पुलिस संस्थापन अधिनियम के तहत विधिक रूप से स्वतंत्र संस्था बन गया। हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में इसे केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो नाम देकर एक ऐसी जांच संस्था बनाई जो केंद्र और राज्यों के उन मामलों की जांच कर सके, जहां बड़े शामिल हों। सीबीआई को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इसे पीएमओ के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अधीन कर दिया गया। इस विभाग को भी सीबीआई की जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया गया। इसे केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में रख दिया गया। सीबीआई पर यह आरोप लगता था कि वह केंद्र सरकार की जांच एजेंसी है, जो राज्यों को डराने का काम करती है। कई बार सीबीआई का सियासी इस्तेमाल भी हुआ। यूपीए सरकार के दौरान भाजपा ने आरोप लगाया था कि यह सीबीआई असल में कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टीगेशन है।
निश्चित रूप से सीबीआई अभी भी देश की सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी है। देश की उच्च न्यायपालिका भी लोगों में यह विश्वास दिलाने का काम करती है कि वहां से इंसाफ मिलेगा मगर बीते कुछ सालों में सीबीआई का जिस तरह से सियासी फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वह दुखद है। वहीं संवैधानिक संस्थाओं का भी अब राजनीतिक दुरुपयोग होने लगा है। ऐसी संस्थाओं के नियंत्रकों का सत्ता के आगे रीढ़विहीन होकर झुक जाना, लोकतंत्र के लिए खतरा है। उच्च और उच्चतम न्यापालिका पर जिस तरह की टिप्पणियां सोशल मीडिया और चर्चाओं में सामने आ रही हैं, वो हमारे विश्वास को हिलाने वाली हैं। ऐसी संस्थाएं यकीन और दिली सम्मान से ही अपनी जगह बनाती हैं, न कि लोकलुभावन कार्यों से। न्यापालिका और संवैधानिक संस्थाओं में जब सियासी पहुंच और विचारधाराओं के आधार पर नियुक्तियां होने लगेंगी, तब ऐसे संकट खड़े होना लाजिमी है। यह वही देश है जहां तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था। उस वक्त अगर जज, इंदिरा गांधी से प्रभावित हो जाते तो निश्चित रूप से न्याय की हत्या होती। जब राजीव गांधी सहित तमाम कद्दावरों के खिलाफ बोफोर्स के कथित दलाली मामले में सीबीआई ने जांच शुरू की, तब अगर अफसर डर गए होते तो सीबीआई इतनी ताकतवर और यकीनी न होती।
हमें यह कहते हुए भी कोई गुरेज नहीं कि डॉ. मनमोहन सरकार के वक्त में कैग ने जब टूजी स्कैम की रिपोर्ट दी, तब डॉ. मनमोहन सिंह ने कोई हस्तक्षेप न करके बड़ा दिल दिखाया था। उन्होंने कथित कोयला घोटाले में भी जांच से भागने का काम नहीं किया। जब सीबीआई ने इसकी जांच में कोताही बरती तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर नाराजगी व्यक्त करने के बजाय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ही देखरेख में ही जांच कराने की बात कही थी। इस बार भी ऐसा ही होना चाहिए था। आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक बनाने का फैसला नरेंद्र मोदी सरकार का था। वर्मा को बेदाग और बेहतरीन अफसर बताकर सीबीआई को पिंजरे से मुक्त करने का दावा किया गया था। वर्मा ने जब दागदार क्षवि के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश आस्थाना को सीबीआई में रखने पर आपत्ति जताई तो उनपर ही संकट टूट पड़े। वर्मा ने जिस अफसर की शिकायत की, उसी अफसर की शिकायत पर न केवल उन्हें रातोंरात हटाया गया बल्कि अपमानित भी किया गया। अंत में सीवीसी की एक रिपोर्ट के चंद बिंदुओं के आधार पर तबादला भी कर दिया गया। इस साजिश में अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई जज शामिल होता है तो यह और भी दुखद है। हालांकि उन्होंने अपरोक्ष रूप से सफाई दी है कि प्रथम दृष्टया वर्मा आरोपित थे। उधर, वर्मा ने पद से इस्तीफा देते हुए कहा यह इंसाफ का कत्ल है।
सवाल यहीं खड़ा होता है, अगर वर्मा जांच में पाए गए तथ्यों में आरोपित हैं तो उनको सुने बिना तबादले का फैसला क्यों ले लिया गया? एफआईआर का अर्थ होता है प्रथम सूचना रिपोर्ट, तो आरोपित वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई? पुलिस सेवा नियमावली के मुताबिक तबादला कोई दंड नहीं है, ऐसे में वर्मा के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही के बजाय तबादला ही क्यों किया गया? सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस एके पटनायक ने कहा कि उन्होंने आलोक वर्मा पर लगे आरोपों की सीवीसी की जांच की बारीकी से निगरानी की थी, उन्हें वर्मा के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं मिला। जब कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं था, तो अचानक क्या आफत आ गई कि सरकार आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के रूप में 24 दिन भी बर्दास्त नहीं कर पाई? क्या आलोक वर्मा सीबीआई को बंद पिंजरे में फड़फड़ाने के दोषी हैं? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब वक्त के साथ सरकार और उसके नेताओं को देना ही पड़ेगा? सुप्रीम कोर्ट को भी अगर अपनी साख बचानी है तो उसे दूध का दूध और पानी का पानी करना होगा।
वक्त रहते अगर हमारी सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सियासी नेताओं ने मर्यादा के दायरे में रहते हुए निष्पक्षता के साथ प्रभावी कदम नहीं उठाए तो लोकतंत्र के मूल की निर्मम हत्या हो जाएगी। संवैधानिक संस्थाओं को लोग सम्मान की नजर से नहीं देखेंगे। रीढ़विहीन न्यापालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं एक स्वस्थ एवं सम्मानित राष्ट्र का निर्माण नहीं करतीं।
जय हिंद।

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