Saturday, April 13, 2019

विकास नहीं, जाति-धर्म की सियासत है वोटबैंक

पल्स- अजय शुक्ल

विकास नहीं, जाति-धर्म की सियासत है वोटबैंक

बुद्धिजीवियों ने जब लोकतंत्र को भीड़तंत्र कहा तब बहुत से लोगों को यह संबोधन सही नहीं लगा। भारत में लोकतंत्र स्थापित हुए 71 साल हो चुके हैं। शुरुआती दो दशकों तक देश की सियासत विकास और राष्ट्र निर्माण पर केंद्रित थी मगर इसके बाद सत्ता सुख की चाहत प्रबल होने लगी। जातीय और धार्मिक राजनीति ने धीरे-धीरे जड़ें जमा ली हैं। नतीजतन अब चुनाव और सत्ता के मंथन पर चर्चा होती है तो यह नहीं कि हमने क्या कराया है बल्कि यह कि कहां किस जाति धर्म के कितने वोटर हैं। वोट बैंक की यह सियासत खत्म करने की बात कानपुर के कल्याणपुर में उत्तर प्रदेश में अपनी पहली चुनावी रैली में हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री ने कही थी मगर उस पर अमल करने की हिम्मत नहीं जुटा सके। वह स्वयं चुनावी रैलियों में “मैं नीच जाति का हूं और दूसरे हमें नीच मानते हैं” कहकर वोटबैंक साधने की कोशिश करते नजर आये। साफ है कि हमारे मतदाताओं को शायद विकास पुरुष नहीं बल्कि जाति-धर्म का नेता चाहिए।
हमें याद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से धार्मिक विवादों को दरकिनार कर विकास के पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान किया था, मगर आज विकास की राजनीति मंदिर और मूर्ति के पीछे छिपती दिख रही है। हम इतिहास पर गौर फरमायें तो देखते हैं कि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्र निर्माण और विकास की राजनीति को तरजीह दी थी। उन्होंने देश के ब्रितानी गुलामी से मुक्ति मिलने के छह महीने के भीतर ही वक्त और बजट का इंतजार किये बिना आत्मविश्वास के बूते दो दर्जन मेगा परियोजनाओं की नीव रख दी थी। वो परियोजनायें न सिर्फ सिरे चढ़ीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में नीव का पत्थर साबित हुईं। गेल, भेल, सेल, आर्डीनेंस फैक्ट्रीज, एनएफएल, भाखड़ा डैम से लेकर एम्स, पीजीआई, आईआईटी, आईआईएम, जैसे संस्थानों ने देश में हरित, दुग्ध, औद्योगिक और सैन्य शक्ति क्रांति का आगाज किया। युवाओं को बेहतरीन सस्ती उच्च शिक्षा के साथ ही रोजगार मिला। उस वक्त के मतदाताओं ने भी नेहरू को महानायक के रूप में सम्मान दिया। उसके बाद जो दौर शुरू हुआ वह स्वार्थ की सियासत का था। जहां कभी जाति के नाम पर नेता बनने लगे तो कभी धर्म के नाम पर। विकास की बात बेमानी हो गई।
नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बनने के लिए मोरारजी देसाई ने मोर्चा खोला मगर नेहरू के प्रिय होने के कारण लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। वह झंझावतों से जूझते डेढ़ वर्ष ही रह सके। शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद प्रधानमंत्री के चयन पर इंदिरा गांधी का भारी विरोध हुआ। मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री बनने के लिए पार्टी के संसदीय दल में चुनाव करवाया मगर वह हार गये। इंदिरा गांधी के 355 वोटों के मुकाबले देसाई को सिर्फ 169 मत मिले। अगले बरस ही कांग्रेस विकास के तमाम कार्यों को गिनाने के बाद भी कई राज्यों में चुनाव हार गई। राम मनोहर लोहिया ने इंदिरा को “गूंगी गुड़िया” संबोधित कर गैर कांग्रेसी सरकार बनवाने का संघर्ष शुरू किया। विश्व का भूगोल भारत के पक्ष में बदलने वाली इंदिरा गांधी जाति-धर्म के प्रचार में चुनाव हारीं। सभी विरोधी दलों की मिलीजुली सरकार बनी। यह अधिक दिनों तक नहीं चल सकी। इंदिरा गांधी के विकास और सशक्त प्रशासन पर जनता ने फिर यकीन किया। मगर तब तक देश में जाति-धर्म की सियासत जड़ें जमा चुकी थीं। उन पर गहन चर्चा होने लगी।
20वीं सदी के अंतिम दशक में जाति-धर्म की सियासत अधिक सशक्त हुई। तमाम धार्मिक और जातीय सियासी दल खड़े हो गये। कहीं जातिवाद के नाम पर तो कहीं क्षेत्रवाद के नाम पर वोट पड़ने लगे। विकास की बात करने वाले ऐसे लोग सत्ता में पहुंचे असल में जातीय और धार्मिक नेता थे। 21वीं सदी की शुरुआत जाति-धर्म की राजनीति से हुई। हालांकि अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने विकास को मुद्दा बनाया। उन्होंने देश को कई मेगा परियोजनाएं देकर “साइनिंग इंडिया” के नाम पर चुनाव लड़ा मगर हार हाथ लगी। इसके बाद जाति और धर्म का वोटबैंक मजबूत हो चुका था। दो आम चुनाव हारने के बाद तीसरे के वक्त में भाजपा ने धार्मिक वोटबैंक को एकजुट करने का दांव खेला। उग्र हिंदू चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी को प्रस्तुत किया, साथ ही गुजरात का डेवलपमेंट माडल भी दिखाया गया। मतदाताओं ने इस पर यकीन किया और मोदी सशक्त प्रधानमंत्री बने। अब आम चुनाव सामने है मगर मतदाताओं की अपेक्षायें उस हद तक पूरी नहीं हुईं जिनकी उन्हें उम्मीद थी।
राजनीतिक चिंतक परेशान हैं कि क्या मुद्दा बनायें? उनका मानना है कि विकास के नाम पर अधिकतम 10 फीसदी वोट पड़ते हैं जबकि जाति और धर्म के नाम पर 90 फीसदी। जिताऊ मुद्दा विकास नहीं बल्कि मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-सिख, हिंदू-ईसाई ही है। धर्म के बाद जाति वोट का बड़ा आधार है। यही कारण है कि चिंतक जातिगत आधार पर मतों के विभाजन को अपने पक्ष में करने के तरीके तलाशने में जुट गये हैं। कहां से किस जाति या धर्म का उम्मीदवार बनाया जाये, जो जीत सुनिश्चित करे। इसके लिए कहां किसको कितना उग्र करना है और उसका कहां फायदा लेना है? इसके प्रचार प्रसार में किस तरह के साधन इस्तेमाल किये जायें, इसकी तैयारी की जा रही है। राजनीतिक चिंतक मानते हैं कि जिसके पक्ष में जितना अधिक यह प्रचार होगा कि वह बहुसंख्यक जातियों का हिमायती है, उसे ही फायदा होगा। धार्मिक भावनाओं के भड़कने या सांप्रदायिक दंगे होने से निश्चित रूप से उस दल को ही फायदा होगा जो खुद को इनका हिमायती साबित करता है। सत्ता की चाबी विकास की बात करने वाले को नहीं बल्कि जाति-धर्म के वोट लेने की क्षमता वाले के हाथ लगेगी।
इस सोच के सर्वे जब राजनीतिक चिंतन का विषय होंगे, तब विकास पर सिर्फ उतना ही काम करने की बात होगी जो बेहद जरूरी और आर्थिक फायदा देने वाली हो। अब धार्मिक और जातीय विद्वेष को बढ़ावा देने से मिलने वाले सियासी फायदे को हर दल भुनाना चाहता है। यह राजनीति निश्चित रूप से भीड़तंत्र की सियासत है न कि लोकतंत्र की। लोकतंत्र में तो समग्र विकास और सर्वे भवंतु सुखिना, सर्वे भवंतु निरामया की सोच होती है। अगर वोटबैंक इसी तरह बने जो वह दिन दूर नहीं जब राष्ट्र गर्त में समाएगा और हम कुछ नहीं कर सकेंगे।

जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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