पल्स : Ajay Shukla
बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ओढ़नी होगी
देश की अर्थव्यवस्था सबसे बेहतरीन होने का दावा लंबे वक्त से मोदी सरकार करती आ रही है। तीन दिन पहले सेंटर फार मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने जैसे ही वित्त वर्ष 2018-19 की दिसंबर तिमाही के आंकड़े जारी किए, सरकारी दावे हवा हो गए। यह तिमाही बेहद निराशाजनक तस्वीर सामने लेकर आई है। निवेश से लेकर नई परियोजनाओं तक में भारी गिरावट देखने को मिली। यह पिछले 14 वर्षों में सबसे खराब अर्थव्यवस्था का सबूत है। गिरावट सिर्फ निजी क्षेत्र में ही नहीं हुई बल्कि सरकारी क्षेत्र में भी आई है। अगर हम 2014 से मुकाबला करें तो हालात बद से बदतर हुए हैं। इसके पीछे गलत नीतियां और नगण्य सुधारात्मक कदम सामने आये हैं। देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था हम सभी के लिए चिंता का विषय है। 2014 मई में जब नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब यह उम्मीद की जा रही थी कि हालात सुधरेंगे। त्वरित एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण होगा मगर ऐसा नहीं हो सका। नोटबंदी और जीएसटी के गलत क्रियान्वयन ने अर्थतंत्र को हिलाकर रख दिया। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार पर नीतिगत निर्णय लेने में अक्षमता का आरोप लगता था मगर जब निर्णय लेने वाली सरकार आई तो उसके फैसले दिशा हीन हो गए।
मोदी सरकार को जल्द ही जनादेश के लिए जनता के बीच जाना है। जनता को अपने किए कामों को बताने के साथ ही उसके नतीजों का भी आंकलन करवाना है। ऐसे हालात में यह भी बताना पड़ेगा कि सरकार के कड़े फैसलों और कड़वे घूंट वाली दवाओं का आखिर क्या असर रहा? यह समझाने के लिए जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में सुधार किया जाए। इस तिमाही में सितंबर तिमाही की अपेक्षा सरकारी क्षेत्र में भी 37 प्रतिशत कम निवेश हुआ जबकि निजी क्षेत्र में इसी वक्त के दौरान 62 फीसदी कमी आई है। फुटकर समेत सभी क्षेत्रों में निराशाजनक हालत सामने आ रहे हैं। इसका असर रोजगार पर पड़ना लाजिमी है। उद्योग-धंधों में रोजगार के न केवल अवसर कम हुए हैं बल्कि नए साल में नौकरियां जाने का भय युवाओं-कामगारों में सता रहा है। नए रोजगार सृजन के वक्त कटौती की तलवार किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक संकेत देती है। बैंकों की सख्ती और सरकार की नीतियों का मैत्रीपूर्ण न होना संकट का विषय बना हुआ है। चुनावी खर्चों और लोकलुभावन निर्णयों के बाद तय है कि आगे की अर्थनीतियां अर्थव्यवस्था को सुधारने के माकूल नहीं होंगी।
मौजूदा वक्त में देश की अर्थव्यवस्था के लिए एनपीए बैंक खाते और डेड मनी बड़े संकट के तौर पर सामने हैं। आरबीआई के आंकड़ों में यह स्पष्ट है कि पिछले साढ़े चार साल में पूंजीपतियों को कर्ज में दी गई एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम डेड मनी हो चुकी है। ऐसे में अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए समझपूर्ण नीतियां बनाने और उनके बेहतर क्रियान्वयन की जरूरत है। यह निर्विवादित रूप से साबित हो चुका है कि नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था का काला अध्याय था। देश इस संकट से निपट पाता उसके पहले ही बगैर व्यापक क्रियान्वयन नीति बनाए ही जीएसटी लागू कर दिया जाना, संकट को और भी गहराने वाला साबित हुआ। यही कारण है कि आशातीत नतीजे नहीं आए। सरकारों ने भी देश के आर्थिक, सामाजिक और ढांचागत विकास से ज्यादा जाति-धर्म के वोटबैंक साधने पर जोर दिया, जिनसे भय का माहौल खड़ा हुआ। सियासी घमासान के बीच जो सड़क नेटवर्क तैयार हुआ, उस पर टोल का बोझ इतना बढ़ा है कि ट्रांसपोर्ट सहित तमाम व्यवसाय संकट में घिर गए हैं। लघु उद्योगों की हालत पतली है और मध्ययम उद्योग संघर्ष से जूझ रहे हैं। इनको समर्थन और संरक्षण देने पर एमएसएमई मंत्रालय अब तक कुछ नहीं कर सका है।
कृषि आय दोगुनी करने के सरकारी दावे भी हवा हो गए हैं क्योंकि खर्च के सापेक्ष आमदनी नहीं बढ़ी है। कृषि लागत बढ़ने का बड़ा कारण डीजल उर्वरक से लेकर अन्य जरूरी उपकरणों का बहुत महंगा हो जाना है। जीएसटी की मार से कृषि क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। इससे कृषि और किसान दोनों की हालत दयनीय हुई है। इस क्षेत्र में रोजगार का औसत इतना खराब है कि जरूरत से एक हजार गुना ज्यादा लोग काम कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी नगण्य है। दूसरी तरफ, बैंकिंग धोखाधड़ी ने हालात बिगाड़े हैं। सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के बजाय पूंजीपतियों को साधने का काम किया और उनके हित में जो फैसले लिए वो अर्थव्यवस्था के लिए फांसी साबित हो रहे हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि पिछले एक साल में (2017-18) धोखाधड़ी करने वालों ने बैंकिंग व्यवस्था से 41,167.7 करोड़ रुपए हजम कर लिए। जो पिछले वित्तीय वर्ष (2016-17) के 23,933 करोड़ रुपए की बैंक धोखाधड़ी की तुलना में 72 फीसदी अधिक है। यह रकम न केवल एनपीए हुई है बल्कि डेड मनी घोषित कर दी गई है। आरबीआई भी मानता है कि इनमें से कई मामले एनपीए के इसलिए हुए क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी से वो संभल नहीं सके। बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले पिछले चार साल से तेजी से बढ़े हैं और सरकार तथा बैंके इसे नियंत्रित नहीं कर सकीं। जो अर्थव्यवस्था को घातक मोड़ पर ले आया है। आॅफ-बैलेंस शीट आॅपरेशन, विदेशी मुद्रा लेनदेन, जमा खातों और साइबर गतिविधि से संबंधित धोखाधड़ी पिछले वित्तीय वर्ष में प्रमुख रहे हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि सार्वजनिक (पीएसयू) बैंकों में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की धोखाधड़ी के 93 प्रतिशत मामले हुए जबकि इसमें निजी बैंकों की हिस्सेदारी छह प्रतिशत ही रही है। रिजर्व बैंक ने माना है कि धोखाधड़ी ने एनपीए को बढ़ा दिया है। मार्च 2018 में एनपीए 10,39,700 करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर पौने 11 करोड़ के करीब पहुंच गया है।
सरकार और हमें यह गंभीरता से सोचना होगा कि किसी भी देश के समृद्ध होने में उसकी बैंकिग व्यवस्था आधार होती है। अर्थव्यवस्था अगर मजबूत नहीं होती तो आधार कमजोर हो जाता है। ऐसे में न निवेश मिलता है और न ही विकास का पहिया आगे बढ़ पाता है। जरूरी है कि हमारे नीति नियंता न केवल बेहतरीन और मैत्रीपूर्ण नीति बनाएं बल्कि उनके सही क्रियान्वयन पर भी जोर दें। जब तक अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी, न रोजगार के अवसर सृजित होंगे और न ही पुराने बचे रह पाएंगे। सरकारों के मुखिया और सियासी दल जब श्रेय लेने में पीछे नहीं रहते तो उन्हें बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ईमानदारी से ओढ़नी चाहिए। उनको जनता जनार्दन को भी इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए क्योंकि वास्तव में डूब रही लाखों करोड़ रुपए की धनराशि जनता की ही है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ओढ़नी होगी
देश की अर्थव्यवस्था सबसे बेहतरीन होने का दावा लंबे वक्त से मोदी सरकार करती आ रही है। तीन दिन पहले सेंटर फार मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने जैसे ही वित्त वर्ष 2018-19 की दिसंबर तिमाही के आंकड़े जारी किए, सरकारी दावे हवा हो गए। यह तिमाही बेहद निराशाजनक तस्वीर सामने लेकर आई है। निवेश से लेकर नई परियोजनाओं तक में भारी गिरावट देखने को मिली। यह पिछले 14 वर्षों में सबसे खराब अर्थव्यवस्था का सबूत है। गिरावट सिर्फ निजी क्षेत्र में ही नहीं हुई बल्कि सरकारी क्षेत्र में भी आई है। अगर हम 2014 से मुकाबला करें तो हालात बद से बदतर हुए हैं। इसके पीछे गलत नीतियां और नगण्य सुधारात्मक कदम सामने आये हैं। देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था हम सभी के लिए चिंता का विषय है। 2014 मई में जब नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब यह उम्मीद की जा रही थी कि हालात सुधरेंगे। त्वरित एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण होगा मगर ऐसा नहीं हो सका। नोटबंदी और जीएसटी के गलत क्रियान्वयन ने अर्थतंत्र को हिलाकर रख दिया। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार पर नीतिगत निर्णय लेने में अक्षमता का आरोप लगता था मगर जब निर्णय लेने वाली सरकार आई तो उसके फैसले दिशा हीन हो गए।
मोदी सरकार को जल्द ही जनादेश के लिए जनता के बीच जाना है। जनता को अपने किए कामों को बताने के साथ ही उसके नतीजों का भी आंकलन करवाना है। ऐसे हालात में यह भी बताना पड़ेगा कि सरकार के कड़े फैसलों और कड़वे घूंट वाली दवाओं का आखिर क्या असर रहा? यह समझाने के लिए जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में सुधार किया जाए। इस तिमाही में सितंबर तिमाही की अपेक्षा सरकारी क्षेत्र में भी 37 प्रतिशत कम निवेश हुआ जबकि निजी क्षेत्र में इसी वक्त के दौरान 62 फीसदी कमी आई है। फुटकर समेत सभी क्षेत्रों में निराशाजनक हालत सामने आ रहे हैं। इसका असर रोजगार पर पड़ना लाजिमी है। उद्योग-धंधों में रोजगार के न केवल अवसर कम हुए हैं बल्कि नए साल में नौकरियां जाने का भय युवाओं-कामगारों में सता रहा है। नए रोजगार सृजन के वक्त कटौती की तलवार किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक संकेत देती है। बैंकों की सख्ती और सरकार की नीतियों का मैत्रीपूर्ण न होना संकट का विषय बना हुआ है। चुनावी खर्चों और लोकलुभावन निर्णयों के बाद तय है कि आगे की अर्थनीतियां अर्थव्यवस्था को सुधारने के माकूल नहीं होंगी।
मौजूदा वक्त में देश की अर्थव्यवस्था के लिए एनपीए बैंक खाते और डेड मनी बड़े संकट के तौर पर सामने हैं। आरबीआई के आंकड़ों में यह स्पष्ट है कि पिछले साढ़े चार साल में पूंजीपतियों को कर्ज में दी गई एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम डेड मनी हो चुकी है। ऐसे में अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए समझपूर्ण नीतियां बनाने और उनके बेहतर क्रियान्वयन की जरूरत है। यह निर्विवादित रूप से साबित हो चुका है कि नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था का काला अध्याय था। देश इस संकट से निपट पाता उसके पहले ही बगैर व्यापक क्रियान्वयन नीति बनाए ही जीएसटी लागू कर दिया जाना, संकट को और भी गहराने वाला साबित हुआ। यही कारण है कि आशातीत नतीजे नहीं आए। सरकारों ने भी देश के आर्थिक, सामाजिक और ढांचागत विकास से ज्यादा जाति-धर्म के वोटबैंक साधने पर जोर दिया, जिनसे भय का माहौल खड़ा हुआ। सियासी घमासान के बीच जो सड़क नेटवर्क तैयार हुआ, उस पर टोल का बोझ इतना बढ़ा है कि ट्रांसपोर्ट सहित तमाम व्यवसाय संकट में घिर गए हैं। लघु उद्योगों की हालत पतली है और मध्ययम उद्योग संघर्ष से जूझ रहे हैं। इनको समर्थन और संरक्षण देने पर एमएसएमई मंत्रालय अब तक कुछ नहीं कर सका है।
कृषि आय दोगुनी करने के सरकारी दावे भी हवा हो गए हैं क्योंकि खर्च के सापेक्ष आमदनी नहीं बढ़ी है। कृषि लागत बढ़ने का बड़ा कारण डीजल उर्वरक से लेकर अन्य जरूरी उपकरणों का बहुत महंगा हो जाना है। जीएसटी की मार से कृषि क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। इससे कृषि और किसान दोनों की हालत दयनीय हुई है। इस क्षेत्र में रोजगार का औसत इतना खराब है कि जरूरत से एक हजार गुना ज्यादा लोग काम कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी नगण्य है। दूसरी तरफ, बैंकिंग धोखाधड़ी ने हालात बिगाड़े हैं। सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के बजाय पूंजीपतियों को साधने का काम किया और उनके हित में जो फैसले लिए वो अर्थव्यवस्था के लिए फांसी साबित हो रहे हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि पिछले एक साल में (2017-18) धोखाधड़ी करने वालों ने बैंकिंग व्यवस्था से 41,167.7 करोड़ रुपए हजम कर लिए। जो पिछले वित्तीय वर्ष (2016-17) के 23,933 करोड़ रुपए की बैंक धोखाधड़ी की तुलना में 72 फीसदी अधिक है। यह रकम न केवल एनपीए हुई है बल्कि डेड मनी घोषित कर दी गई है। आरबीआई भी मानता है कि इनमें से कई मामले एनपीए के इसलिए हुए क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी से वो संभल नहीं सके। बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले पिछले चार साल से तेजी से बढ़े हैं और सरकार तथा बैंके इसे नियंत्रित नहीं कर सकीं। जो अर्थव्यवस्था को घातक मोड़ पर ले आया है। आॅफ-बैलेंस शीट आॅपरेशन, विदेशी मुद्रा लेनदेन, जमा खातों और साइबर गतिविधि से संबंधित धोखाधड़ी पिछले वित्तीय वर्ष में प्रमुख रहे हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि सार्वजनिक (पीएसयू) बैंकों में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की धोखाधड़ी के 93 प्रतिशत मामले हुए जबकि इसमें निजी बैंकों की हिस्सेदारी छह प्रतिशत ही रही है। रिजर्व बैंक ने माना है कि धोखाधड़ी ने एनपीए को बढ़ा दिया है। मार्च 2018 में एनपीए 10,39,700 करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर पौने 11 करोड़ के करीब पहुंच गया है।
सरकार और हमें यह गंभीरता से सोचना होगा कि किसी भी देश के समृद्ध होने में उसकी बैंकिग व्यवस्था आधार होती है। अर्थव्यवस्था अगर मजबूत नहीं होती तो आधार कमजोर हो जाता है। ऐसे में न निवेश मिलता है और न ही विकास का पहिया आगे बढ़ पाता है। जरूरी है कि हमारे नीति नियंता न केवल बेहतरीन और मैत्रीपूर्ण नीति बनाएं बल्कि उनके सही क्रियान्वयन पर भी जोर दें। जब तक अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी, न रोजगार के अवसर सृजित होंगे और न ही पुराने बचे रह पाएंगे। सरकारों के मुखिया और सियासी दल जब श्रेय लेने में पीछे नहीं रहते तो उन्हें बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ईमानदारी से ओढ़नी चाहिए। उनको जनता जनार्दन को भी इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए क्योंकि वास्तव में डूब रही लाखों करोड़ रुपए की धनराशि जनता की ही है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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