Saturday, April 13, 2019

..इस फिल्म में भी मोदी ही जीतेंगे!

पल्स- Ajay Shukla

..इस फिल्म में भी मोदी ही जीतेंगे!


देश की कानून व्यवस्था और धार्मिक भावनाओं के लिए ज्वलंत सवाल बने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 29 अक्तूबर को सिर्फ तीन मिनट सुना। उसने स्पष्ट किया कि अगले साल जनवरी से इस मुद्दे पर नियमित सुनवाई होगी। चुनावी साल होने से यह विवाद सियासी चश्मे से देखा जाना लाजिमी है। आम चुनाव के लिए छह महीने बचे हैं, ऐसे में निश्चित रूप से हिंदुत्ववादी संगठनों के उग्र बयान अचंभित नहीं करते। सभी अपनी सियासत चमकाने निकल पड़े हैं। कथित संतों के दिल में भी इसी वक्त मंदिर हिलोरें मार रहा है। सियासी और धमकाने वाले अंदाज की बयानबाजी फिजा में जहर घोलने का काम कर रही है। प्रदूषण पहले ही विध्वंसक रूप धारण कर चुका है और जहरीले शब्द संकट खड़ा करने के लिए काफी हैं। हालांकि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इनसे दूरी बनाये हैं।
राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद की भूमि पर मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ़ की पीठ ने सुनावाई के लिए जनवरी की तिथि घोषित की। जिसके निहितार्थ निकाले जाने लगे कि चुनावी प्रचार के दौरान यह सुनवाई, आखिर किसको फायदा देगी? यह विवाद मीडिया खासकर हिंदी मीडिया के लिए सदैव चर्चा का विषय रहता है। यह भी सच है कि मतदाताओं तक सबसे ज्यादा पहुंच हिंदी मीडिया की ही है। अंग्रेजी मीडिया की पहुंच एक सीमित वर्ग और संख्या तक ही है, जिस वर्ग का लोकतंत्र के महापर्व पर योगदान नाममात्र का ही होता है। सियासी रणनीतिकार यह मानकर चल रहे हैं कि अगर जनवरी में सुनवाई शुरू हुई तो हिंदी मीडिया इसके हर पहलू को रिपोर्ट करेगा, जिसको लेकर हर वर्ग में टिप्पणियां और उसका फायदा उठाया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि इस मुद्दे को लेकर विशेष पीठ सुनवाई करेगी या फिर सामान्य पीठ। लखनऊ में हाईकोर्ट ने विशेष पीठ का गठन किया था। बहराल, जनवरी की सुनवाई में तस्वीर साफ़ हो जाएगी। यह मसला सदन में भी उठना तय है, निजी या सरकारी विधेयक के जरिए विवादित जमीन रामलला को दे दी जाये। अदालत में मालिकाना हक की लंबी लड़ाई के बाद अगर ऐसा होता है तो क्या हालात बनेंगे? कानून व्यवस्था से लेकर धार्मिक सियासी लोगों की रणनीति भी अजब से हालात पैदा करेगी। प्रयाग के कुंभ मेले में धार्मिक सियासी लोग और संत जुटेंगे। इनकी गतिविधियां और चर्चायें भी तमाम तरह के हालात पैदा करने के लिए काफी हैं। इससे नुकसान किसको होगा, इससे बड़ा सवाल यह है कि फायदा किसको होगा? चुनावी साल, प्रयाग का महाकुंभ और राम मंदिर पर सुनवाई भावनाओं को भड़काने के लिए काफी हैं।
राम मंदिर निर्माण को लेकर भाजपा दबाव की स्थिति में है। सबसे बड़ा वोट बैंक हिंदू समुदाय इसको लेकर एकमत है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पदाधिकारी स्पष्ट कहने लगे हैं कि "सर्वोच्च न्यायालय शीघ्र निर्णय करे। अगर कुछ कठिनाई है तो सरकार क़ानून बनाकर मंदिर निर्माण की सभी बाधाओं को दूर कर भूमि श्रीराम जन्मभूमि न्यास को सौंपे।" विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार भी इस पक्ष में हैं कि सरकार संसद के आगामी सत्र में क़ानून बनाकर राम जन्म स्थल पर विशालकाय मंदिर बनाने का रास्ता साफ़ करे। विजयादशमी के मौके पर सरसंघ चालक मोहन भागवत ने अपना मत प्रस्तुत किया कि चाहे जैसे हो राम मंदिर बनना ही चाहिए। सरकार क़ानून लाकर मंदिर बनाए और इसमें किसी का कोई हस्तक्षेप ना हो। इन अहम बयानों, संसद के शीतकालीन सत्र, प्रयाग के महाकुंभ और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का वक्त, सभी मिलकर जो माहौल बना रहे हैं, उससे भाजपा को सत्ता की राह आसान दिख रही है।
भाजपा के लिए यह एक ऐसे अवसर की तरह है जो उसके मतदाताओं यानी हिंदू मतों को प्रभावित करने का और सरकार के खिलाफ नाराजगी को भुलाने का सबसे अच्छा साधन दिख रहा है। अभी केंद्र सरकार कई मोर्चों पर फंसी हुई है। जहां व्यापारियों से लेकर युवाओं तक, कामकाजी लोगों से लेकर घरेलू महिलाएं तक किसी न किसी मुद्दे पर नाराज हैं। कथित राफेल घोटाले से लेकर तमाम अन्य घोटालों के आरोप सामने आने लगे हैं। सीबीआई से लेकर आरबीआई तक में घमासान मचा है। “महंगाई डायन खाय जात है, अच्छे दिन या झूठे दिन, चौकीदार चोर है”। जैसे स्लोगन चल पड़े हैं। इन हालात में भाजपा को अगर सशक्त रूप से सत्ता में कोई ला सकता है, तो वह राम मंदिर ही है। चाहे, कुछ हो या न हो मगर उस पर कुछ करने की बहस भी उसे मजबूती से खड़ा कर सकती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट की चुनावी वक्त में गरमागरम बहस निश्चित रूप से सार्थक होगी। अगर सरकार ने अध्यादेश या विधेयक लाने का खेल भी किया तो भी उसे 282 के आंकड़े के आगे भाजपा खड़ी होगी।
एक सच यह भी है कि अध्यादेश लाने से भी आम चुनाव तक राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं हो सकता। ठीक वैसे ही जैसे एकसाथ तीन तलाक पर हुआ, मगर बड़ा मुद्दा बन सकता है, जो भाजपा की संजीवनी होगा। भाजपा सरकार अगर अध्यादेश लाती है तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी मगर चुनावी फायदा मिलना तय है। भाजपा सरकार के इस कदम से पार्टी अपने हिंदुत्ववादी कार्ड को एकबार फिर जीवंत कर देगी। वह अपने मतदाताओं को यह संदेश दे देंगे कि 'हम तो मंदिर निर्माण चाहते हैं, विपक्षी मुस्लिम परस्त हैं'। भाजपा का यह कार्ड उसे सभी हिंदू जातियों से जोड़ने में सर्वथा सार्थक होगा। भाजपा के किसी भी सहयोगी दल की यह हिम्मत नहीं है कि वह अब खुलकर इसका विरोध कर सके। वो मजबूरन मोदी के साथ ही खड़े होंगे और “मोदी राष्ट्रीय हीरो” होंगे। हर हिंदी फिल्म की तरह इस फिल्म में भी मोदी ही जीतेंगे। यही सोच भाजपा के रणनीतिकारों को सुखद और प्रसन्नता की अनुभूति करा रही है।
वर्ष 1989 के पहले कभी भी भाजपा ने राममंदिर निर्मार्ण का मुद्दा नहीं उठाया था। यह मुद्दा राजीव गांधी के खिलाफ काम आया क्योंकि राजीव गांधी को राममंदिर का दरवाजा खुलवाने और पूजा शुरू करवाने का श्रेय मिलने लगा था। भाजपा किसी भी स्थिति में श्रेय में किसी अन्य को हिस्सा नहीं लेने देगी। अभी ऐसा पहली बार है कि यूपी और केंद्र सरकार में भारी बहुमत के बाद भी भाजपा ने राम मंदिर बनाने पर कोई स्टैंड स्पष्ट नहीं किया है। 14 जनवरी से प्रयाग में शुरू होने वाले कुंभ मेले और धर्म संसद में भाजपा अपनी सियासी रणनीति खेलेगी, उधर अदालत दबाव में सुनवाई करेगी, जनता बहस से जूझेगी जो भाजपा के वोटबैंक को मजबूत करने के लिए पर्याप्त है।

जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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