Saturday, April 13, 2019

कृतज्ञता प्रकट कर आगे बढ़िये.. शांति में ही समृद्धि है

पल्स अजय शुक्ल
कृतज्ञता प्रकट कर आगे बढ़िये.. शांति में ही समृद्धि है
भारतीय संस्कृति में कृतज्ञता का भाव सबसे अहम माना गया है। ऋग्वेद से लेकर गीता और फिर रामचरित मानस तक में इसको महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सनातन धर्म में स्पष्ट है कि शत्रु के प्रति भी कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। इस वक्त देश संकटों के दौर से गुजर रहा है। कुछ लोग इन संकटों का लाभ उठाना चाहते हैं, तो कुछ गमगीन और गुस्से में हैं। भावनाओं और प्रतिक्रियाओं के बीच लोग लोकाचार-शिष्टाचार भी भूल गए हैं। राष्ट्रभक्ति के बजाय राष्ट्रवाद पर जोर है। राष्ट्रहित के बजाय एजेंडे को साधने का चिंतन चल रहा है। शहीदों की चिताओं में जिम्मेदार लोग अपने हाथ सेंकने का काम कर रहे हैं। यह उन सभी के लिए चिंता का विषय है जो देश को प्रेम करते हैं। उसको समृद्ध देखना चाहते हैं। उन बुद्धिजीवियों के लिए भी चिंतन का विषय है, जो राष्ट्र को अमन चैन के साथ आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। हमारे देश की सीमाओं पर जो भी तनाव है, उससे कहीं ज्यादा तनाव देश के भीतर है। जिन लोगों को देश के भूगोल का नहीं पता, जो नक्शे में कुछ चिन्हित करने का भी ज्ञान नहीं रखते, वे भी विशेषज्ञों की तरह आक्रामक टिप्पणी कर रहे हैं।हम आपसे यह चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पिछले कुछ वक्त से देश के भीतर और सीमाओं पर जो घट रहा है, वह दुखद है। कभी युद्ध का माहौल बनने लगता है तो कभी बेवजह का शोर सुनाई देता है। सोशल मीडिया हो या परंपरागत दोनों ही संयम के साथ तथ्यों को प्रस्तुत करने के बजाय तनाव परोस रहे हैं। मनबढ़ लोग और मीडियाकर्मी आगे दिखने की होड़ में कुछ भी कहते और करते नजर आ रहे हैं। सैन्य बलों के वे रिटायर्ड अफसर जो अपने कार्यकाल में कोई बड़ा काम नहीं कर पाए, मीडिया के माध्यम से बम-गोली बरसाने लगते हैं। वे भूल जाते हैं, जब युद्ध के हालात बनने पर वे अपने परिवार और मित्रों को बार-बार संपर्क करने की कोशिश करते थे। वे यह भी भूल जाते हैं कि युद्ध में कोई भी देश हारे या जीते मगर विधवा जवान की बीवी होती है। भाई-बहन अपने भाई खोते हैं और मां-बाप अपना बेटा। कोई मित्र खोता है तो देश अपना लाड़ला सपूत। देशवासी अमन-चैन खो देते हैं और व्यवस्था अपनी गति। देश सालों पीछे चला जाता है। आर्थिक हानि का बोझ आमजन के कंधे पर आ पड़ता है। इन हालात में भी जो ऐश करते हैं, वे सत्ता और राजनीति पर काबिज लोग होते हैं। बड़े व्यापारिक घरानों के लोग होते हैं। वे अपने बच्चों को फौज में नहीं भेजते और न ही उन्हें जरूरत है। मरते आमजन और उनके बच्चे हैं। 14 फरवरी को कश्मीर के पुलवामा में जो दुखद आतंकी घटना हुई, उसमें हमारी बड़ी चूक थी। हमारे देश के सुरक्षा बजट का बड़ा हिस्सा खुफिया सूचनाओं पर खर्च होता है। हम कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का दावा करते हैं मगर एक 19 साल के युवक ने यह दुखद घटना अंजाम दे दी। हमने अपने 40 जांबाज खो दिए। हमारे हुक्मरां अपने सियासी दांव पेंच में लग गए। चंद मिनटों में ही अपनी नाकामी पाकिस्तान की साजिश बताकर बात खत्म कर दी गई। निश्चित रूप से पाकिस्तान का यह कसूर है कि वह लंबे समय से अपने अधीन कश्मीरी हिस्से में आतंकी तैयार करने में मदद करता रहा है। उसने जब 2016 के नए साल के जश्न के माहौल में पठानकोट के सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया और तीन दिनों तक कब्जा किए रहा, तब हम माकूल जवाब नहीं दे सके। उसने जब उड़ी में हमला किया, तब भी हम सुस्त रहे। अब जब 40 सीआरपीएफ जवानों को कश्मीरी युवक के जरिए मार डाला गया तो हमने अपनी खामियों पर बात भी नहीं की। जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि हमें सुबूत दीजिए, हम कार्रवाई करेंगे, तब हमारे नेताओं ने अहम दिखाया। हमारी वायु सेना ने बालकोट में बम गिराया तो पाकिस्तान ने भी हमारा एक विमान मार गिराया। इसी समय एक अन्य हेलिकॉप्टर कै्रश में छह जवान शहीद हो गए। हमारे विंग कमांडर अभिनंदन को पाक सेना ने गिरफ्तार कर लिया। वैश्विक मंच पर हीरो बनने के लिए इमरान खान ने पाकिस्तानी संसद में कहा कि वह शांति चाहते हैं। उन्होंने पहल नहीं की, बल्कि मजबूरन प्रतिरोध में कार्रवाई की। वह पायलटअभिनंदन को छोड़ रहे हैं। वह हर विषय पर बातचीत को तैयार हैं। इमरान ने कहा प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले 26 जुलाई और बाद में भी भारत से सभी मुद्दों पर बात की पहल की, मगर भारत के सियासतदां नहीं माने। भारत के पास इसका कोई माकूल जवाब नहीं है।हमें सोचना होगा कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ? भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के साथ ही दोनों के हितों का टकराव रहा है। दोनों के बीच 1971 में हुए आखिरी युद्ध में हमारी सेनाओं ने पाकिस्तान को दो टुकड़े कर उसकी रीढ़ तोड़ दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गिरफ्तार किए गए करीब 92 हजार पाक सैनिकों को रिहा करते हुए, वैश्विक मंच पर यही कहा था कि पाक हमें उकसाता है, न कि हम उस पर हमला करते हैं। उसके बाद से अब तक पाकिस्तान हमसे युद्ध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया मगर छद्म युद्ध करता रहता है। हम उसके इस छद्म युद्ध का जवाब भी देते हैं। समस्या यह थी कि पाकिस्तान हमसे सभी मुद्दों पर बात नहीं करना चाहता था। जब से इमरान खान प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने हर बार बात करने का प्रस्ताव किया मगर हमारे हुक्मरां राजी नहीं हुए। विश्व का इतिहास गवाह है कि अब तक किसी भी युद्ध के नतीजे अच्छे नहीं रहे हैं। जंग में जनहानि के साथ ही इतने नुकसान होते हैं कि उनकी भरपाई करना संभव नहीं होता। हमें गांधीवादी तरीका अपनाना होगा। हम बातचीत का माहौल बनाएं। समस्याओं को हल करने के लिए मुद्दों पर बात करें। विंग कमांडर अभिनंदन को दबाव में ही सही मगर वक्त पर बगैर नुकसान छोड़कर अगर इमरान खान ने बड़ा दिल दिखाया है तो हमें भी उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए। उन्होंने अगर करतारपुर कारीडोर बनाने की पहल की तो हमें भी कम से कम कृतज्ञता दिखानी चाहिए थी मगर हमारी तरफ से ऐसा नहीं हुआ। युद्धोन्मादी बातें करने वाले यह नहीं जानते कि अगर पाकिस्तान का 50 फीसदी नुकसान होगा तो हमारा भी कम से कम 25 फीसदी नुकसान होगा। हम भी अपने जवान खोएंगे। हम विकास की राह पर आगे दौड़ने की बजाय पीछे भागेंगे। भारत-पाक के बीच अगर युद्ध होगा, तो वह सामान्य युद्ध नहीं रहेगा क्योंकि हमारी भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि हम किसी भी पड़ोसी पर यकीन नहीं कर सकते। चीन, अमेरिका, रूस जैसे देश तटस्थ नहीं रह सकते। हथियार बेचने वाले देश युद्ध को बढ़ावा देंगे। नुकसान हमारे देश को सबसे ज्यादा होगा। ऐसे में जरूरत है कि हम कृतज्ञता प्रकट करते हुए वैश्विक मंच पर खुले दिल से बात करें। उपजी समस्याओं का स्थाई समाधान कर आगे बढ़ें। अमन-चैन होता है तभी समृद्धि आती है। यह भारत के विपक्ष की सकारात्मक राष्ट्रीय पहल का लाभ उठाने का वक्त है। जय हिंद।

जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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