पल्स... अजय शुक्ल
आलोचनाओं को आत्मसात करने वाला राजनेता
हमने पहले सोचा अटल से हटकर किसी और विषय पर लिखा जाए मगर लैपटॉप का की-बोर्ड पुन: अटल जी ही लिखवा रहा था। क्या लिखा जाए क्योंकि श्रद्धांजलि अपने अग्रलेख में दे चुका हूं, तब लगा उस अजातशत्रु के बारे में विषय तलाशना समुद्र में गोता लगाने की तरह होगा। कुछ नहीं सूझ रहा, एक अजीब सी टीस उठ रही है अटल जी को लेकर। हालांकि उनसे लंबे अरसे से नहीं मिल पाया। सोचा कि अटल जी की आलोचना की जाए, मगर कुछ ऐसा नहीं मिला जिसको लेकर उन्हें घेर सकें। उनकी पत्रकारिता और साहित्य के बारे में चिंतन किया तब उनका वीर रस से भरा वह गिलास मिला जो लखनऊ में देखा था और लिखने बैठ गया।
अटल जी ने संसद में कहा था कि मैं कबीर दास की उन पंक्तियों का कायल हूं जो हमें गलतियां करने से रोकती हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय’। उन्होंने स्वीकारा कि वह अपने जीवन में इन पंक्तियों को सदैव आत्मसात करते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी जो आलोचना करता है, वह अच्छा मित्र बन जाता है। वजह साफ है कि उसकी आलोचना हमें गलती करने से या दोहराव से बचाती है। हमें चाटुकारिता और वाहवाही वाले मित्र नहीं चाहिए। उन्होंने लखनऊ में भी कहा था कि उन्हें उन पत्रकारों से सदैव सच के करीब जाने का मौका मिला जो कमियां निकलाते थे, तभी उन्होंने लखनऊ को उसके नजरिए से जाना और समझा। इसी कारण वे लखनऊ के दुलारे बन सकें। यह सोच का बड़प्पन अबके पत्रकारों और राजनेताओं में दिखता भी नहीं है, क्योंकि अब आइना लोगों को अच्छा नहीं लगता।
यह डिजिटल एरा का वक्त है। अटल जी की संचार क्रांति हमें इस स्तर पर लेकर आई है। हम इस युग में पहुंचे हैं, मगर जो सबसे बड़ी चीज खोई है, वह है सच्चाई। उन्होंने बतौर पत्रकार कई समाचार पत्रों में काम किया। पत्रकार के रूप में उन्होंने साफगोई के साथ अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया, जिसने एक नहीं कई संगठन और संस्थाएं खड़ी कर दीं। वह ऐसे कर्मयोगी पत्रकार थे जोलखनऊ में अपने समाचार पत्र को निकालने की धुन में बहन की शादी में कानपुर जाने से कतरा रहे थे। इस बारे में नाना जी देशमुख ने दीनदयाल उपाध्याय जी को बताया। तब दीनदयाल जी ने अटल जी को बहन की शादी में लखनऊ से कानपुर भेजा था। उनके साथ के कुछ पत्रकार मित्रों से बात हुई तो उन्होंने बताया कि किस तरह अटल जी अपनी और अपने लेखन की आलोचना सुनना चाहते थे, जबकि उनके लेख का हर शब्द मोती की तरह होता था। यहीं से उनकी यह क्षमता बढ़ती गई।
राजनीतिक मंच हो या फिर सामाजिक और निजी जीवन, सभी स्थानों पर वह सच बोलते थे, क्योंकि उन्हें खौफ नहीं होता था। वह अपनी क्षमताओं से वाकिफ थे और विश्वास था कि कोई आलोचना उनसे सुधार तो करवा सकती है, मगर उनके मार्ग को रोक नहीं सकती। जब मैं पहली बार उनसे मिला था तब लखनऊ में अपराध संवाददाता होता था। अटल जी बोले कितना सच लिखते हो। हमने कहा सच ही तो लिखता हूं, तो बोले पुलिस का बताया। हम समझ नहीं सके तो बोले पुलिस जो बताती है उसका सच कभी देखा है। हम बहुत नहीं समझ सके, मगर सोचते रहे। लखनऊ पुलिस ने एक मामले में गलत तफ्तीश करके निर्दोष को पकड़ा था, इस सच से हम व्यक्तिगत रूप से वाकिफ थे, सो जुट गए सच तलाशने में और पुलिस तफ्तीश को तार-तार कर दिया। तत्कालीन एसएसपी डॉ. सूर्यकुमार ने पूरे मामले की दोबारा जांच करवाई और निर्दोष बच गया। वहां से ही हमारे दिल में इन्वेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग का जुनून पैदा हुआ।
हमने अटल जी की कुछ कमियां खोजी थीं और वर्ष 1998 में राजभवन में उन्हें उनकी बातें बतार्इं तो मुस्कुराकर बोले प्रयोग भी मुझ पर। कुछ ठहरकर बोले, लेकिन सही है, मगर कभी किसी के हथियार मत बनना। यह सुनकर हम प्रफुल्लित थे। अटल जी के वे शब्द आज भी प्रेरणा देते हैं। आज के वक्त में सोचता हूं तो पाता हूं कि अगर किसी अन्य सत्ता शीर्ष के व्यक्ति से इस तरह की बात मैं कर देता तो शायद दुनिया में ही न होता। आलोचनाओं को लेकर अटल जी कभी नहीं डरते थे। वर्ष 1991 के बाद जब वर्ष 1996 में लखनऊ संसदीय सीट से उनके मुकाबले में राज बब्बर मैदान में थे तब यही मुद्दा था कि पांच साल में अटल जी ने लखनऊ में किया क्या? अटल जी ने कहा कि बतौर सांसद लखनऊ की आवाज बुलंद की और जो भी मुद्दे संज्ञान में लाए गए उन पर काम किया। जब वह प्रधानमंत्री बने तब सबसे पहले अपने संसदीय क्षेत्र के विकास की योजना को फलीभूत किया। पुराना लखनऊ हो या नया दोनों को वह सब दिया जो वक्त की जरूरत थी।
अटल जी सच से समझौता करने को कभी तैयार नहीं थे। जब भी कोई आलोचना उठी तो आलोचक को बुलाया और समझा। जांच करवाई, मगर साथ ही खुद भी जांचा। उसके बाद सुधार कराया। इसके एक नहीं कई उदाहरण निजी तौर पर लखनऊ में देखे। दैनिक जागरण के तत्कालीन संपादक विनोद शुक्ल से अटल जी खुद बोले, हर वक्त अच्छा नहीं होता। कुछ गलतियां हो जाती हैं उनको स्थान जरूर देना, जिससे हम सावधान रहेंगे। निश्चिंत हो गए तो सब खत्म हो जाएगा। यह उम्मीद आज का कोई संपादक किसी राजनेता से करेगा, यह यक्ष प्रश्न है। सच का आइना दिखाना खुद के लिए आफत मोल लेने जैसा है, क्योंकि अब न अटल हैं और न ही अटल आलोचना।
अटल जी के अंतिम पल के साक्षी लोगों से लेकर श्रद्धांजलि देने वाले सियासी लोगों तक को सिर्फ एक सलाह है कि अपनी आलोचना का स्वागत करना शुरू कीजिए। इससे आप कुछ बनें न बनें, लेकिन शख्सियत जरूर बन जाएंगे। ऐसी शख्सियत जिसके शव के साथ लोग चलने में गर्वित महसूस करेंगे। अन्यथा बहुत से साम्राज्य बने और खत्म हो गए। नेता-अभिनेता आए और चले गए, मगर छाप वही छोड़ते हैं जो अपनी गलती और कमियों को ईमानदारी से स्वीकारते हैं।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी के प्रधान संपादक हैं )
आलोचनाओं को आत्मसात करने वाला राजनेता
हमने पहले सोचा अटल से हटकर किसी और विषय पर लिखा जाए मगर लैपटॉप का की-बोर्ड पुन: अटल जी ही लिखवा रहा था। क्या लिखा जाए क्योंकि श्रद्धांजलि अपने अग्रलेख में दे चुका हूं, तब लगा उस अजातशत्रु के बारे में विषय तलाशना समुद्र में गोता लगाने की तरह होगा। कुछ नहीं सूझ रहा, एक अजीब सी टीस उठ रही है अटल जी को लेकर। हालांकि उनसे लंबे अरसे से नहीं मिल पाया। सोचा कि अटल जी की आलोचना की जाए, मगर कुछ ऐसा नहीं मिला जिसको लेकर उन्हें घेर सकें। उनकी पत्रकारिता और साहित्य के बारे में चिंतन किया तब उनका वीर रस से भरा वह गिलास मिला जो लखनऊ में देखा था और लिखने बैठ गया।
अटल जी ने संसद में कहा था कि मैं कबीर दास की उन पंक्तियों का कायल हूं जो हमें गलतियां करने से रोकती हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय’। उन्होंने स्वीकारा कि वह अपने जीवन में इन पंक्तियों को सदैव आत्मसात करते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी जो आलोचना करता है, वह अच्छा मित्र बन जाता है। वजह साफ है कि उसकी आलोचना हमें गलती करने से या दोहराव से बचाती है। हमें चाटुकारिता और वाहवाही वाले मित्र नहीं चाहिए। उन्होंने लखनऊ में भी कहा था कि उन्हें उन पत्रकारों से सदैव सच के करीब जाने का मौका मिला जो कमियां निकलाते थे, तभी उन्होंने लखनऊ को उसके नजरिए से जाना और समझा। इसी कारण वे लखनऊ के दुलारे बन सकें। यह सोच का बड़प्पन अबके पत्रकारों और राजनेताओं में दिखता भी नहीं है, क्योंकि अब आइना लोगों को अच्छा नहीं लगता।
यह डिजिटल एरा का वक्त है। अटल जी की संचार क्रांति हमें इस स्तर पर लेकर आई है। हम इस युग में पहुंचे हैं, मगर जो सबसे बड़ी चीज खोई है, वह है सच्चाई। उन्होंने बतौर पत्रकार कई समाचार पत्रों में काम किया। पत्रकार के रूप में उन्होंने साफगोई के साथ अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया, जिसने एक नहीं कई संगठन और संस्थाएं खड़ी कर दीं। वह ऐसे कर्मयोगी पत्रकार थे जोलखनऊ में अपने समाचार पत्र को निकालने की धुन में बहन की शादी में कानपुर जाने से कतरा रहे थे। इस बारे में नाना जी देशमुख ने दीनदयाल उपाध्याय जी को बताया। तब दीनदयाल जी ने अटल जी को बहन की शादी में लखनऊ से कानपुर भेजा था। उनके साथ के कुछ पत्रकार मित्रों से बात हुई तो उन्होंने बताया कि किस तरह अटल जी अपनी और अपने लेखन की आलोचना सुनना चाहते थे, जबकि उनके लेख का हर शब्द मोती की तरह होता था। यहीं से उनकी यह क्षमता बढ़ती गई।
राजनीतिक मंच हो या फिर सामाजिक और निजी जीवन, सभी स्थानों पर वह सच बोलते थे, क्योंकि उन्हें खौफ नहीं होता था। वह अपनी क्षमताओं से वाकिफ थे और विश्वास था कि कोई आलोचना उनसे सुधार तो करवा सकती है, मगर उनके मार्ग को रोक नहीं सकती। जब मैं पहली बार उनसे मिला था तब लखनऊ में अपराध संवाददाता होता था। अटल जी बोले कितना सच लिखते हो। हमने कहा सच ही तो लिखता हूं, तो बोले पुलिस का बताया। हम समझ नहीं सके तो बोले पुलिस जो बताती है उसका सच कभी देखा है। हम बहुत नहीं समझ सके, मगर सोचते रहे। लखनऊ पुलिस ने एक मामले में गलत तफ्तीश करके निर्दोष को पकड़ा था, इस सच से हम व्यक्तिगत रूप से वाकिफ थे, सो जुट गए सच तलाशने में और पुलिस तफ्तीश को तार-तार कर दिया। तत्कालीन एसएसपी डॉ. सूर्यकुमार ने पूरे मामले की दोबारा जांच करवाई और निर्दोष बच गया। वहां से ही हमारे दिल में इन्वेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग का जुनून पैदा हुआ।
हमने अटल जी की कुछ कमियां खोजी थीं और वर्ष 1998 में राजभवन में उन्हें उनकी बातें बतार्इं तो मुस्कुराकर बोले प्रयोग भी मुझ पर। कुछ ठहरकर बोले, लेकिन सही है, मगर कभी किसी के हथियार मत बनना। यह सुनकर हम प्रफुल्लित थे। अटल जी के वे शब्द आज भी प्रेरणा देते हैं। आज के वक्त में सोचता हूं तो पाता हूं कि अगर किसी अन्य सत्ता शीर्ष के व्यक्ति से इस तरह की बात मैं कर देता तो शायद दुनिया में ही न होता। आलोचनाओं को लेकर अटल जी कभी नहीं डरते थे। वर्ष 1991 के बाद जब वर्ष 1996 में लखनऊ संसदीय सीट से उनके मुकाबले में राज बब्बर मैदान में थे तब यही मुद्दा था कि पांच साल में अटल जी ने लखनऊ में किया क्या? अटल जी ने कहा कि बतौर सांसद लखनऊ की आवाज बुलंद की और जो भी मुद्दे संज्ञान में लाए गए उन पर काम किया। जब वह प्रधानमंत्री बने तब सबसे पहले अपने संसदीय क्षेत्र के विकास की योजना को फलीभूत किया। पुराना लखनऊ हो या नया दोनों को वह सब दिया जो वक्त की जरूरत थी।
अटल जी सच से समझौता करने को कभी तैयार नहीं थे। जब भी कोई आलोचना उठी तो आलोचक को बुलाया और समझा। जांच करवाई, मगर साथ ही खुद भी जांचा। उसके बाद सुधार कराया। इसके एक नहीं कई उदाहरण निजी तौर पर लखनऊ में देखे। दैनिक जागरण के तत्कालीन संपादक विनोद शुक्ल से अटल जी खुद बोले, हर वक्त अच्छा नहीं होता। कुछ गलतियां हो जाती हैं उनको स्थान जरूर देना, जिससे हम सावधान रहेंगे। निश्चिंत हो गए तो सब खत्म हो जाएगा। यह उम्मीद आज का कोई संपादक किसी राजनेता से करेगा, यह यक्ष प्रश्न है। सच का आइना दिखाना खुद के लिए आफत मोल लेने जैसा है, क्योंकि अब न अटल हैं और न ही अटल आलोचना।
अटल जी के अंतिम पल के साक्षी लोगों से लेकर श्रद्धांजलि देने वाले सियासी लोगों तक को सिर्फ एक सलाह है कि अपनी आलोचना का स्वागत करना शुरू कीजिए। इससे आप कुछ बनें न बनें, लेकिन शख्सियत जरूर बन जाएंगे। ऐसी शख्सियत जिसके शव के साथ लोग चलने में गर्वित महसूस करेंगे। अन्यथा बहुत से साम्राज्य बने और खत्म हो गए। नेता-अभिनेता आए और चले गए, मगर छाप वही छोड़ते हैं जो अपनी गलती और कमियों को ईमानदारी से स्वीकारते हैं।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी के प्रधान संपादक हैं )

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