Saturday, April 13, 2019

यह हमारा धर्म तो नहीं हो सकता..

PULSE..
यह हमारा धर्म तो नहीं हो सकता..
गंगाजमुनी संस्कृति वाले सनातन धर्मियों को आखिर क्या हो गया है? क्या वो अपने धर्म में सिखाये जाने वाले पाठ भूल गये हैं या फिर आक्रांताओं के धर्मावलंबी बन गयें हैं? राम-कष्ण और शिव को उत्पन्न करने वाले उत्तर प्रदेश में गत दिनों जो घटा उसने ये सवाल खड़े किये हैं। अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे एक एसएचओ को मदांध धर्म के ठेकेदारों ने मार डाला। गाय को हमने इसलिए माता कहा था क्योंकि वह मानव जीवन का पोषण करने में योगदान देती है। यहां तो गाय के नाम पर मानव और मानवता दोनों की हत्या कर दी गई। आरोप चाहे जो भी हों मगर धर्म के नाम पर जो अराजकता पनपी और पनपाई जा रही है, वह किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। दुख होता है जब हम धर्म के नाम पर वह करते हैं जो हमारे धर्म में वर्जित है। जीवन देने और बचाने की शिक्षा देने वाले धर्म के ठेकेदार मानव जीवन भी छीन रहे और भाईचारा भी। हमारा धर्म तो ऐसी कदापि न था।
हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि पिछले चार सालों के दौरान अजब सी अराजकता देश में पनपी है। कहीं गाय के नाम पर तो कहीं धार्मिक स्थल के नाम पर मानवता की हत्या की जा रही है। अगस्त 2014 में दिल्ली में दो मुस्लिम मांस विक्रेताओं को बीफ बेचने का आरोप लगाकर मरणासन्न कर दिया गया। इसी तरह के आरोप में मंगलोर में कुछ लोगों को अधमरा कर दिया गया। एक माह बाद ही नोयडा के निठारी में एक बुजुर्ग मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला गया। यह अराजकता शुरू हुई तो रुकने का नाम नहीं ले रही। धर्मांधता के नाम पर सिर्फ चार सालों में चार दर्जन से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। अब तो इसका शिकार हिंदू धर्मांवलंबी भी होने लगे हैं। कभी गोवंश के कथित हत्यारों को मारा जाता है तो कभी उसको पालने वालों की हत्या कर दी जाती है। विस्मय तब होता है जब वो लोग धर्म के ठेकेदार बनते हैं जो उसका छोर भी नहीं जानते। सनातन धर्म के विपरीत आचरण करने वालें ऐसे लोगों को सत्य और तार्किक बातें करने वाले धर्महीन अथवा राक्षसी प्रवृत्ति के नजर आते हैं।
सनातन धर्म के मूल वेद हैं, जो हमें ज्ञान के साथ ही उच्च नैतिक आदर्श बनाये रखने को कहते हैं। वे आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक क्षेत्र के लिए भी दिशानिर्देश देते हैं। इनका दर्शन सत्य, अहिंसा, प्रायश्चित, संयम और आध्यात्मिक विकास का है। वेद कभी किसी भी स्थिति में बदला लेना नहीं सिखाते और न हीं हिंसक होना। यही कारण है कि 7 नवंबर 2003 को युनाइटेड नेशंस एजुकेशन साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (यूनेस्को) ने वेदों को मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया था। अथर्ववेद के 138वें सूक्त में स्पष्ट लिखा है “प्रियं मा कृणु देवेष प्रियम राजषु मा कृणु, प्रियम सर्वस्व पश्यत उत शुद्र उत्तार्ये”। अर्थात हम ऐसा व्यवहार करें कि सभी जातियों के प्रिय बनें। वेद यहीं नहीं रुकता बल्कि 140वें सूक्त में स्पष्ट करता है “सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्त समेकाभिदभ्यंहुशे गात, आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीले पथां विसर्गे धरूणेषु तस्यौ”। यानी हिंसा, चोरी, व्यभिचार, मद्यपान, जुआ, असत्यभाषण एवं पाप में सहयोगी होना ही सप्त मर्यादा है, जो मानव जीवन के लिए घातक है। हमें इससे सदैव मुक्त रहना चाहिए।
वैदिक सिद्धांतों के विपरीत आचरण करने वाले खुद को सनातनधर्मी बताते हैं। वह सनातन धर्म की पताका लिये ऐसा व्यवहार करते हैं जो किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। धर्म क्या है, इसे समझना जरूरी है। यह हमारे कर्तव्यों और उनकी मर्यादाओं का विन्यास है। यह राजसत्ता संभालने वालों से लेकर एक कर्मकार तक को दिशा निर्देश देता है। तमाम सनातन धर्मी यह भूल जाते हैं कि हिंदू” नाम मुस्लिम आक्रांताओं ने दिया था। उन्होंने सिंधु घाटी के इस पार के लोगों को हिंदु कहकर संबंधित किया क्योंकि हिंदुकुशा की पहाड़ियों के इस पार हमारे पूर्वज निवास करते थे। उनके दिये संकुचित सोच वाले नाम के कारण हम हिंदू बन गये जबकि हम तो सनातन से उतपन्न विशुद्ध ज्ञान पर आधारित लोग थे। हम किसी का अहित करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। ज्ञान विज्ञान के धनी हम लोग शांति और सौहार्द के साथ आगे बढ़ने वाले थे। यही कारण है कि हजारों हमलों के बाद भी सनातन धर्म को कोई नुकसान नहीं हुआ मगर अब हो रहा है। हमारे ही कथित धर्म रक्षक अपने धर्म को हानि पहुंचा रहे हैं। जिन सिद्धांतों के कारण हम विजित हैं, धर्म-गौ रक्षा के नाम पर वही नष्ट किये जा रहे हैं।
पुलिस व्यवस्था हमारे समाज में सदैव विभिन्न रूपों में रही है। राज धर्म के सिद्धांतों पर आधारित पुलिस व्यवस्थाओं को संयमित और संचालित करने का न्याय पर आधारित एक सख्त हिस्सा थी। देश की आजादी के पूर्व और बाद में संगठित तरीके से कानूनों को विधिसम्मत तरीके से लागू करने का माध्यम बनी मगर आज यह एक अराजक भीड़ बन कर रह गई है। अगर ऐसा ही रहा तो यह देश के लिए घातक और विनाशक होगा। दुख तब होता है जब धर्म के नाम पर सत्ता हासिल करने वाले यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बुलंदशहर में हुई मॉब लिंचिंग के सच को स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं। वेद असत्य भाषण को धर्म का ह्रास मानते हैं और योगी-मोदी वही सबसे ज्यादा करते हैं। योगी ने कहा है कि, राज्य में कोई मॉब लिंचिंग नहीं है, बुलंदशहर की घटना केवल एक दुर्घटना है जबकि सभी चैनलों ने घटना को दिखाया है। वह न विधि सम्मत व्यवस्था संचालित करने पर यकीन रखते हैं और न ही पुलिस व्यवस्था को स्वच्छ एवं समर्थ बनाने पर। यह लोग कथित धर्म के नाम पर अराजकता के पोषक बन गये हैं क्योंकि उन्हें इसमें सत्ता की चाबी नजर आती है।
हम सभी को धर्म और उसके सिद्धांतों-नियमों तथा संदेश को समझना होगा। उनका मनन करना होगा। हमारा धर्म किसी भी दशा में अराजकता का पोषण नहीं करता बल्कि मानवता से युक्त समानता पर आधारित न्याय व्यवस्था पर विश्वास करता है। हमारा धर्म किसी भी जाति या मानव में भेद करना नहीं सिखाता बल्कि व्यवस्थित तरीके से जीवन जीना सिखाता है। धर्म को न जानने समझने वाले अराजक लोग हमें धर्म की परिभाषा बताते हैं और हम यकीन कर लेते हैं जो हमारी मूर्खता का परिचायक है न कि बुद्धिमत्ता का। हम ओछी राजनीति के लिए धर्म का प्रयोग न होने दें नहीं तो हम वास्तव में धर्महीन हो जाएंगे।

जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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