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मर्यादाविहीन सत्ता से राष्ट्र को कुछ हासिल नहीं होगा
रामचरितमानस में तुलसीदास ने हर स्थान पर मर्यादा को सबसे अधिक महत्व दिया है। यहां तक कि रामायण के मुख्य पात्र राम हैं, जिन्हें उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया है। रामचरितमानस भारतीय समाज में मर्यादाओं के पालन पर जोर देता है। राम के चरित्र में यही विशेषता है जो उन्हें भगवान की तरह खड़ा करती है। राम परिवार, समाज, राजपाठ से लेकर पशु-पक्षियों तक में मर्यादानुकूल कार्य करते दिखते हैं। वह किसी भी हद पर पहुंचने के बाद भी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। हम उस रामराज की स्थापना की बात करते हैं। मगर जब व्यवहार उससे इतर करते हैं तब हमारा दोहरा चरित्र सामने आता है। देश के हालात अनुकूल नहीं हैं। पड़ोसी देशों से लेकर अन्य तमाम मोर्चों पर देश और देशवासी जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें मजबूत आधार और वैश्विक मंच पर विशेष स्थान शोर मचाने से नहीं मिलेगा, बल्कि उसके लिए अपनी संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करना होगा। दुख की बात यह है कि इस तथ्य को कोई समझने को तैयार नहीं है। कौन किससे अधिक संस्कारी दिखाने की होड़ नहीं है, बल्कि कौन किससे अधिक असभ्य है, यह दर्शाया जा रहा है।
हमारे देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति यह हो गई है कि वो संवैधानिक हैं? हमें इस पर यकीन करने के लिए कानून की किताबें और संविधान के अनुच्छेद तलाशने पड़ रहे हैं। हम टीएन शेषन के चुनाव आयोग को याद करते हैं तो लगता है कि इस वक्त का चुनाव आयोग जंगल के कानून से प्रभावित है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। न्यायपालिका हो या फिर किसी अन्य संवैधानिक संस्था सभी की हालत देखकर तरस आता है कि उनका डंडा सिर्फ कमजोर पर चलता है। आज के वक्त में न जस्टिस जगमोहन जैसे लोग रह गए हैं जो देश की तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाने से नहीं हिचकते थे या फिर कृष्णमूर्ति जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे लोग।
आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सत्ता या विपक्ष या कोई और? हम अगर आक्षेप लगाने की बात करेंगे तो तत्काल सत्तारूढ़ दल को दोषी ठहरा देंगे मगर यह सच नहीं होगा। वास्तव में इसके लिए वह व्यवस्था दोषी है जिसने इसे भ्रष्ट या यूं कहें कि कुंठित बना दिया है। वह जनता भी इसके लिए दोषी है जो इसका हिस्सा है और गलत को ताली बजाकर बढ़ावा देती है।
यह लगातार देखने में आता है कि फलां जज या अफसर सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सरकार के किसी पद पर लगा दिया गया। उसे बड़ी सारी सुविधाएं मिल गर्इं। किसी को किसी आयोग में सेट कर दिया गया तो किसी को सेवाविस्तार दे दिया गया। योग्यतम व्यक्ति या पदाधिकारी की सेवाएं लेना अच्छी बात है मगर नए लोगों को योग्य बनाकर उनका स्थान ग्रहण करने की अहर्ता प्रदान करना उससे भी अच्छी बात है। अगर ऐसा हो जाए तो वे बहुत से लालची अफसर और जज गलत करने से बचेंगे, जिन्हें सत्ता के पक्ष में गलत करते वक्त यह भरोसा होता है कि उन्हें सेवानिवृत्त होने के बाद राजकीय सुख मिल जाएंगे। जिस व्यक्ति या अधिकारी ने अपनी 60 साल की सेवा में कोई बड़ी उपलब्धि देश समाज को नहीं दी, वो सेवानिवृत्ति के बाद क्या देगा? उसकी बजाय हमें उन युवाओं को मजबूती के साथ तैयार करना चाहिए जो 55 साल की उम्र में पहुंचकर उन पदों पर तीन से पांच साल तक कार्य करने को तैयार हों जो देश की संवैधानिक ताकत हैं। ऐसे लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए और उसकी पारदर्शिता भी सामने रहनी चाहिए।
गोस्वामी तुलसीदास जब मर्यादा को महत्व देते हैं तो उसके पीछे स्पष्ट है कि मर्यादाएं जीवन के हर पहलू में समाहित होती हैं। माता-पिता के साथ संबंधों की मर्यादा हो या पति-पत्नी और भाई-बहन के बीच। समाज और राजा के बीच भी मर्यादा होती है तो शत्रु और मित्र के साथ भी। जब प्रकृति अपनी मर्यादाओं के सहारे सृष्टि का निर्माण करती है तो हम क्यों न करें?
हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के भीतर एक बार कहा था कि गठबंधन धर्म की भी मर्यादा होती है। हम मर्यादा में रहेंगे और हर कोई उसका पालन करेगा तो कहीं संकट पैदा नहीं होगा। मर्यादाएं टूटने पर ही गठबंधन भी टूटते हैं और समाज भी। आज यह बातें समीचीन हैं क्योंकि शब्दों की मर्यादाएं हों या संस्कारों की, सभी टूट रही हैं। सियासत और सत्ता के लिए कोई भी किसी भी तरह का व्यवहार कर रहा है। न किसी को किसी दूसरे की उम्र का ख्याल है और न ही पद-प्रतिष्ठा का। मंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर बैठे लोग भी शब्दों की गरिमा नहीं समझ रहे, जिन पर समाज और देश को दिशा देने की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश में नागरिकों का आखिरी भरोसा न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं होती हैं। उम्मीद की जाती है कि वो अपनी मर्यादा का कड़ाई से पालन करेंगे। वो आमजन का भरोसा नहीं तोड़ेंगे। जब यही संस्थाएं भरोसा तोड़ती हैं, तब दुख होता है। नागरिक इस संकट के वक्त में यही सोचता है कि अब उसके पास कोई विकल्प नहीं। ये हालात किसी भी लोकतांत्रिक सभ्य राष्ट्र के लिए भावी संकट का कारण बनते हैं। हम सब जानते हैं कि दुनिया में खाली हाथ आए थे और वैसे ही जाना है फिर भी वे हरकतें करने से नहीं चूकते जो समाज के सम्मुख निंदक हैं। आखिर क्यों? भारतीय धर्मग्रंथों ने हमें राह दिखाने के लिए इतना कुछ प्रस्तुत किया है कि हम कभी हार न सकें, न किसी संकट के आगे और न ही सत्ता की निरंकुशता के आगे। यह तभी संभव है जब हम सब अपनी मर्यादाओं का पालन करें।
हमारा देश गंगा-जमुनी और सूफी-संतों की तहजीब वाला देश रहा है। यही तहजीब हमारी ताकत भी थी और उसके बूते ही हम विश्व में एक अलग स्थान भी बना सके। देश को जरूरत है कि हम इस संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करते हुए, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करें। हम यह भी सोचें कि हम अगली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे? क्या हम सिर्फ भोग करने के लिए आए हैं और प्रकृति, देश और समाज ने हमें जो दिया वह सिर्फ अपने लिए दिया है? हम तो सामुहिकता की सोच वाली संस्कृति के लोग हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की संस्कृति हमारे देश की रही है, तभी हम विश्व गुरु की उपाधि पा सके थे। अगर हम उस मर्यादा को बहाल कर सकेंगे तो एक आयाम स्थापित करेंगे, अन्यथा बेड़ा गर्क होना तय है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )
मर्यादाविहीन सत्ता से राष्ट्र को कुछ हासिल नहीं होगा
रामचरितमानस में तुलसीदास ने हर स्थान पर मर्यादा को सबसे अधिक महत्व दिया है। यहां तक कि रामायण के मुख्य पात्र राम हैं, जिन्हें उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया है। रामचरितमानस भारतीय समाज में मर्यादाओं के पालन पर जोर देता है। राम के चरित्र में यही विशेषता है जो उन्हें भगवान की तरह खड़ा करती है। राम परिवार, समाज, राजपाठ से लेकर पशु-पक्षियों तक में मर्यादानुकूल कार्य करते दिखते हैं। वह किसी भी हद पर पहुंचने के बाद भी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। हम उस रामराज की स्थापना की बात करते हैं। मगर जब व्यवहार उससे इतर करते हैं तब हमारा दोहरा चरित्र सामने आता है। देश के हालात अनुकूल नहीं हैं। पड़ोसी देशों से लेकर अन्य तमाम मोर्चों पर देश और देशवासी जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें मजबूत आधार और वैश्विक मंच पर विशेष स्थान शोर मचाने से नहीं मिलेगा, बल्कि उसके लिए अपनी संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करना होगा। दुख की बात यह है कि इस तथ्य को कोई समझने को तैयार नहीं है। कौन किससे अधिक संस्कारी दिखाने की होड़ नहीं है, बल्कि कौन किससे अधिक असभ्य है, यह दर्शाया जा रहा है।
हमारे देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति यह हो गई है कि वो संवैधानिक हैं? हमें इस पर यकीन करने के लिए कानून की किताबें और संविधान के अनुच्छेद तलाशने पड़ रहे हैं। हम टीएन शेषन के चुनाव आयोग को याद करते हैं तो लगता है कि इस वक्त का चुनाव आयोग जंगल के कानून से प्रभावित है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। न्यायपालिका हो या फिर किसी अन्य संवैधानिक संस्था सभी की हालत देखकर तरस आता है कि उनका डंडा सिर्फ कमजोर पर चलता है। आज के वक्त में न जस्टिस जगमोहन जैसे लोग रह गए हैं जो देश की तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाने से नहीं हिचकते थे या फिर कृष्णमूर्ति जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे लोग।
आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सत्ता या विपक्ष या कोई और? हम अगर आक्षेप लगाने की बात करेंगे तो तत्काल सत्तारूढ़ दल को दोषी ठहरा देंगे मगर यह सच नहीं होगा। वास्तव में इसके लिए वह व्यवस्था दोषी है जिसने इसे भ्रष्ट या यूं कहें कि कुंठित बना दिया है। वह जनता भी इसके लिए दोषी है जो इसका हिस्सा है और गलत को ताली बजाकर बढ़ावा देती है।
यह लगातार देखने में आता है कि फलां जज या अफसर सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सरकार के किसी पद पर लगा दिया गया। उसे बड़ी सारी सुविधाएं मिल गर्इं। किसी को किसी आयोग में सेट कर दिया गया तो किसी को सेवाविस्तार दे दिया गया। योग्यतम व्यक्ति या पदाधिकारी की सेवाएं लेना अच्छी बात है मगर नए लोगों को योग्य बनाकर उनका स्थान ग्रहण करने की अहर्ता प्रदान करना उससे भी अच्छी बात है। अगर ऐसा हो जाए तो वे बहुत से लालची अफसर और जज गलत करने से बचेंगे, जिन्हें सत्ता के पक्ष में गलत करते वक्त यह भरोसा होता है कि उन्हें सेवानिवृत्त होने के बाद राजकीय सुख मिल जाएंगे। जिस व्यक्ति या अधिकारी ने अपनी 60 साल की सेवा में कोई बड़ी उपलब्धि देश समाज को नहीं दी, वो सेवानिवृत्ति के बाद क्या देगा? उसकी बजाय हमें उन युवाओं को मजबूती के साथ तैयार करना चाहिए जो 55 साल की उम्र में पहुंचकर उन पदों पर तीन से पांच साल तक कार्य करने को तैयार हों जो देश की संवैधानिक ताकत हैं। ऐसे लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए और उसकी पारदर्शिता भी सामने रहनी चाहिए।
गोस्वामी तुलसीदास जब मर्यादा को महत्व देते हैं तो उसके पीछे स्पष्ट है कि मर्यादाएं जीवन के हर पहलू में समाहित होती हैं। माता-पिता के साथ संबंधों की मर्यादा हो या पति-पत्नी और भाई-बहन के बीच। समाज और राजा के बीच भी मर्यादा होती है तो शत्रु और मित्र के साथ भी। जब प्रकृति अपनी मर्यादाओं के सहारे सृष्टि का निर्माण करती है तो हम क्यों न करें?
हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के भीतर एक बार कहा था कि गठबंधन धर्म की भी मर्यादा होती है। हम मर्यादा में रहेंगे और हर कोई उसका पालन करेगा तो कहीं संकट पैदा नहीं होगा। मर्यादाएं टूटने पर ही गठबंधन भी टूटते हैं और समाज भी। आज यह बातें समीचीन हैं क्योंकि शब्दों की मर्यादाएं हों या संस्कारों की, सभी टूट रही हैं। सियासत और सत्ता के लिए कोई भी किसी भी तरह का व्यवहार कर रहा है। न किसी को किसी दूसरे की उम्र का ख्याल है और न ही पद-प्रतिष्ठा का। मंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर बैठे लोग भी शब्दों की गरिमा नहीं समझ रहे, जिन पर समाज और देश को दिशा देने की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश में नागरिकों का आखिरी भरोसा न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं होती हैं। उम्मीद की जाती है कि वो अपनी मर्यादा का कड़ाई से पालन करेंगे। वो आमजन का भरोसा नहीं तोड़ेंगे। जब यही संस्थाएं भरोसा तोड़ती हैं, तब दुख होता है। नागरिक इस संकट के वक्त में यही सोचता है कि अब उसके पास कोई विकल्प नहीं। ये हालात किसी भी लोकतांत्रिक सभ्य राष्ट्र के लिए भावी संकट का कारण बनते हैं। हम सब जानते हैं कि दुनिया में खाली हाथ आए थे और वैसे ही जाना है फिर भी वे हरकतें करने से नहीं चूकते जो समाज के सम्मुख निंदक हैं। आखिर क्यों? भारतीय धर्मग्रंथों ने हमें राह दिखाने के लिए इतना कुछ प्रस्तुत किया है कि हम कभी हार न सकें, न किसी संकट के आगे और न ही सत्ता की निरंकुशता के आगे। यह तभी संभव है जब हम सब अपनी मर्यादाओं का पालन करें।
हमारा देश गंगा-जमुनी और सूफी-संतों की तहजीब वाला देश रहा है। यही तहजीब हमारी ताकत भी थी और उसके बूते ही हम विश्व में एक अलग स्थान भी बना सके। देश को जरूरत है कि हम इस संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करते हुए, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करें। हम यह भी सोचें कि हम अगली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे? क्या हम सिर्फ भोग करने के लिए आए हैं और प्रकृति, देश और समाज ने हमें जो दिया वह सिर्फ अपने लिए दिया है? हम तो सामुहिकता की सोच वाली संस्कृति के लोग हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की संस्कृति हमारे देश की रही है, तभी हम विश्व गुरु की उपाधि पा सके थे। अगर हम उस मर्यादा को बहाल कर सकेंगे तो एक आयाम स्थापित करेंगे, अन्यथा बेड़ा गर्क होना तय है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )
