Saturday, April 13, 2019

मर्यादाविहीन सत्ता से राष्ट्र को कुछ हासिल नहीं होगा

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मर्यादाविहीन सत्ता से राष्ट्र को कुछ हासिल नहीं होगा
रामचरितमानस में तुलसीदास ने हर स्थान पर मर्यादा को सबसे अधिक महत्व दिया है। यहां तक कि रामायण के मुख्य पात्र राम हैं, जिन्हें उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित किया है। रामचरितमानस भारतीय समाज में मर्यादाओं के पालन पर जोर देता है। राम के चरित्र में यही विशेषता है जो उन्हें भगवान की तरह खड़ा करती है। राम परिवार, समाज, राजपाठ से लेकर पशु-पक्षियों तक में मर्यादानुकूल कार्य करते दिखते हैं। वह किसी भी हद पर पहुंचने के बाद भी मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। हम उस रामराज की स्थापना की बात करते हैं। मगर जब व्यवहार उससे इतर करते हैं तब हमारा दोहरा चरित्र सामने आता है। देश के हालात अनुकूल नहीं हैं। पड़ोसी देशों से लेकर अन्य तमाम मोर्चों पर देश और देशवासी जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में हमें मजबूत आधार और वैश्विक मंच पर विशेष स्थान शोर मचाने से नहीं मिलेगा, बल्कि उसके लिए अपनी संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करना होगा। दुख की बात यह है कि इस तथ्य को कोई समझने को तैयार नहीं है। कौन किससे अधिक संस्कारी दिखाने की होड़ नहीं है, बल्कि कौन किससे अधिक असभ्य है, यह दर्शाया जा रहा है।
हमारे देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति यह हो गई है कि वो संवैधानिक हैं? हमें इस पर यकीन करने के लिए कानून की किताबें और संविधान के अनुच्छेद तलाशने पड़ रहे हैं। हम टीएन शेषन के चुनाव आयोग को याद करते हैं तो लगता है कि इस वक्त का चुनाव आयोग जंगल के कानून से प्रभावित है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। न्यायपालिका हो या फिर किसी अन्य संवैधानिक संस्था सभी की हालत देखकर तरस आता है कि उनका डंडा सिर्फ कमजोर पर चलता है। आज के वक्त में न जस्टिस जगमोहन जैसे लोग रह गए हैं जो देश की तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाने से नहीं हिचकते थे या फिर कृष्णमूर्ति जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे लोग।
आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सत्ता या विपक्ष या कोई और? हम अगर आक्षेप लगाने की बात करेंगे तो तत्काल सत्तारूढ़ दल को दोषी ठहरा देंगे मगर यह सच नहीं होगा। वास्तव में इसके लिए वह व्यवस्था दोषी है जिसने इसे भ्रष्ट या यूं कहें कि कुंठित बना दिया है। वह जनता भी इसके लिए दोषी है जो इसका हिस्सा है और गलत को ताली बजाकर बढ़ावा देती है।
यह लगातार देखने में आता है कि फलां जज या अफसर सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सरकार के किसी पद पर लगा दिया गया। उसे बड़ी सारी सुविधाएं मिल गर्इं। किसी को किसी आयोग में सेट कर दिया गया तो किसी को सेवाविस्तार दे दिया गया। योग्यतम व्यक्ति या पदाधिकारी की सेवाएं लेना अच्छी बात है मगर नए लोगों को योग्य बनाकर उनका स्थान ग्रहण करने की अहर्ता प्रदान करना उससे भी अच्छी बात है। अगर ऐसा हो जाए तो वे बहुत से लालची अफसर और जज गलत करने से बचेंगे, जिन्हें सत्ता के पक्ष में गलत करते वक्त यह भरोसा होता है कि उन्हें सेवानिवृत्त होने के बाद राजकीय सुख मिल जाएंगे। जिस व्यक्ति या अधिकारी ने अपनी 60 साल की सेवा में कोई बड़ी उपलब्धि देश समाज को नहीं दी, वो सेवानिवृत्ति के बाद क्या देगा? उसकी बजाय हमें उन युवाओं को मजबूती के साथ तैयार करना चाहिए जो 55 साल की उम्र में पहुंचकर उन पदों पर तीन से पांच साल तक कार्य करने को तैयार हों जो देश की संवैधानिक ताकत हैं। ऐसे लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए और उसकी पारदर्शिता भी सामने रहनी चाहिए।
गोस्वामी तुलसीदास जब मर्यादा को महत्व देते हैं तो उसके पीछे स्पष्ट है कि मर्यादाएं जीवन के हर पहलू में समाहित होती हैं। माता-पिता के साथ संबंधों की मर्यादा हो या पति-पत्नी और भाई-बहन के बीच। समाज और राजा के बीच भी मर्यादा होती है तो शत्रु और मित्र के साथ भी। जब प्रकृति अपनी मर्यादाओं के सहारे सृष्टि का निर्माण करती है तो हम क्यों न करें?
हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद के भीतर एक बार कहा था कि गठबंधन धर्म की भी मर्यादा होती है। हम मर्यादा में रहेंगे और हर कोई उसका पालन करेगा तो कहीं संकट पैदा नहीं होगा। मर्यादाएं टूटने पर ही गठबंधन भी टूटते हैं और समाज भी। आज यह बातें समीचीन हैं क्योंकि शब्दों की मर्यादाएं हों या संस्कारों की, सभी टूट रही हैं। सियासत और सत्ता के लिए कोई भी किसी भी तरह का व्यवहार कर रहा है। न किसी को किसी दूसरे की उम्र का ख्याल है और न ही पद-प्रतिष्ठा का। मंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर बैठे लोग भी शब्दों की गरिमा नहीं समझ रहे, जिन पर समाज और देश को दिशा देने की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश में नागरिकों का आखिरी भरोसा न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं होती हैं। उम्मीद की जाती है कि वो अपनी मर्यादा का कड़ाई से पालन करेंगे। वो आमजन का भरोसा नहीं तोड़ेंगे। जब यही संस्थाएं भरोसा तोड़ती हैं, तब दुख होता है। नागरिक इस संकट के वक्त में यही सोचता है कि अब उसके पास कोई विकल्प नहीं। ये हालात किसी भी लोकतांत्रिक सभ्य राष्ट्र के लिए भावी संकट का कारण बनते हैं। हम सब जानते हैं कि दुनिया में खाली हाथ आए थे और वैसे ही जाना है फिर भी वे हरकतें करने से नहीं चूकते जो समाज के सम्मुख निंदक हैं। आखिर क्यों? भारतीय धर्मग्रंथों ने हमें राह दिखाने के लिए इतना कुछ प्रस्तुत किया है कि हम कभी हार न सकें, न किसी संकट के आगे और न ही सत्ता की निरंकुशता के आगे। यह तभी संभव है जब हम सब अपनी मर्यादाओं का पालन करें।
हमारा देश गंगा-जमुनी और सूफी-संतों की तहजीब वाला देश रहा है। यही तहजीब हमारी ताकत भी थी और उसके बूते ही हम विश्व में एक अलग स्थान भी बना सके। देश को जरूरत है कि हम इस संस्कृति के अनुकूल व्यवहार करते हुए, अपने आगे आने वाली पीढ़ी के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करें। हम यह भी सोचें कि हम अगली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे? क्या हम सिर्फ भोग करने के लिए आए हैं और प्रकृति, देश और समाज ने हमें जो दिया वह सिर्फ अपने लिए दिया है? हम तो सामुहिकता की सोच वाली संस्कृति के लोग हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की संस्कृति हमारे देश की रही है, तभी हम विश्व गुरु की उपाधि पा सके थे। अगर हम उस मर्यादा को बहाल कर सकेंगे तो एक आयाम स्थापित करेंगे, अन्यथा बेड़ा गर्क होना तय है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं )

शब्दों की गरिमा बनाये रखना भी जिम्मेदारी

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शब्दों की गरिमा बनाये रखना भी जिम्मेदारी 

हम एक घटना का जिक्र करेंगे, अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पंडित कमलापति त्रिपाठी वाराणसी से चुनाव का नामांकन करने पहुंचे। वहीं, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में हराने वाले समाजवादी नेता राजनारायण भी पहुंच गए। राजनारायण ने कमलापति के पांव छुये और उनके खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए आशिर्वाद मांगा। कमलापति ने उनकी जमानत राशि जमा करने के साथ ही चुनाव लड़ने के लिए 10 हजार रुपए दिए। कमलापति चुनाव जीत गए तो सबसे पहले राजनारायण ने पांव छूकर उन्हें माला पहनाई। कमलापति ने उनको कार्यकर्ताओं का मुंह मीठा कराने के लिए एक हजार रुपए और दिए। यह व्यवहार हमारी संस्कृति और संस्कार का प्रतीक है। हमने इसी तरह का व्यवहार 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी का भी देखा, जब वह कई उन बड़ों के पास गए जो कांग्रेसी विचारधारा के थे मगर वाजपेयी ने झुककर प्रणाम करने में कोई देरी नहीं की। एक अन्य उदाहरण, हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का है। उन्होंने वैचारिक विरोधी समझे जाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया था। डॉ. अंबेडकर कांग्रेस प्रत्याशी काजरोल्कर जो दूध बेचते थे, से चुनाव हार गए। यह दोनों लोग अंग्रेजी हुकूमत में भी लाभ के पद पर रहे थे मगर पंडित नेहरू ने उन्हें सम्मान दिया। पंडित नेहरू और कमलापति ने अपने व्यवहार से अपने व्यक्तित्व की एक बड़ी लकीर बगैर किसी की काट किए खींच दी, जिसे इतिहास मिटा नहीं सकता।
भाजपा का मायने संस्कारित भाषा और व्यवहार वाली पार्टी होता था। हमने अटल बिहारी वाजपेयी को निजी तौर पर देखा है। उनके व्यवहार में कभी अमर्यादित भाषा नहीं दिखी। वह प्रधानमंत्री न होते हुए भी कई बार उस पद से अधिक बड़े दिखते थे। कई बार व्यक्ति छोटा होता है और पद बड़ा, तो कई बार पद बड़ा होता है और कद छोटा। आज के परिवेश में चिंतन मौजूं है। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में दो बातें कहीं, एक पाकिस्तान चाहता है कि मैं हार जाऊं और दूसरी, कांग्रेस ने हमें काम नहीं करने दिया। हमें आश्चर्य हुआ कि हमने जिसे न केवल केंद्र में बल्कि राज्यों में भी भरपूर समर्थन दिया, वह प्रधानमंत्री जो खुद को मजबूत नेतृत्व साबित करने के लिए अभियान चलाता है, क्या इतना कमजोर है कि नेता प्रतिपक्ष का पद भी न ले पाने वाली कांग्रेस से डर गया। 44 सदस्यों वाली कांग्रेस ने उसे काम नहीं करने दिया। हालांकि पाकिस्तानी राग पुराना है। गुजरात चुनाव के दौरान इसी तरह का तमाशा देखने को मिला था। मणिशंकर अय्यर सबको याद हैं, अगर अय्यर ने साजिश रची थी तो एफआईआर क्यों नहीं हुई? चुनाव के बाद चर्चा भी नहीं हुई। पांच साल की सत्ता संभालने के बाद अपनी उपलब्धियों पर चुनाव लड़ा जाता है न कि विपक्षी दलों को कोस कर। निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग प्रधानमंत्री जैसे पद की गरिमा को गिराता है। हमें याद है कि पिछले चुनावों में मोदी ने कभी खुद को नीच जाति का तो कभी चायवाला और अब चौकीदार जैसी संज्ञाओं से विभूषित किया है। यही नहीं कई बार ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया जिनको लिखना हमारे संस्कारों के विपरीत है।
संस्कारों का सृजन करने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हमें ऐसे शब्द और व्यवहार तो नहीं सिखाये थे। भाषा की मर्यादा बेहद जरूरी है क्योंकि पद और सत्ता वक्ती होती है मगर शब्द इतिहास रचते हैं। इतिहास में दर्ज विचारक जिन्होंने कोई पद नहीं पाया मगर उनके शब्दों का वक्त बे वक्त संदर्भ लिया जाता है। हमारे मनीषियों ने स्पष्ट किया है कि सत्ता शक्ति के साथ कुछ बुराइयां भी आती हैं। अगर हम उनके शिकार नहीं होते तभी श्रेष्ठ कहलाते हैं। हम लोकतंत्र में रहते हैं और लोकतंत्र जनता जनार्दन में निहित है। अगर वह मोदी को दोबारा चुनती है, तो उनका फैसला सिर माथे पर। लेकिन, क्या सत्ता में आने के बाद वे शब्द वापस आ पाएंगे, जो सार्वजनिक मंच से बोले जा चुके हैं? बिल्कुल नहीं, ये शब्द तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए।
हमारे नीति नियताओं की यह महती जिम्मेदारी है कि वे शब्दों का संयम और संस्कार बनायें रखें। बड़े पदों पर बैठे लोगों से सत्य और तथ्य पर शालीन बातों की उम्मीद की जाती है। उनसे मनगढ़ंत बातें और मिथ्या इतिहास को जनता नहीं सुनना चाहती बल्कि उनकी उपलब्धियों पर स्वस्थ चर्चा की अपेक्षा करती है। अधिक बोलने के चक्कर में ऐतिहासिक तथ्यों का घालमेल मत कीजिए। विपक्षी दलों का मजाक बनाने के बजाय उनके आरोपों के जवाब दीजिए।
भारत वह देश है जहां अभी भी 30 करोड़ से अधिक लोग एक वक्त की रोटी के लिए अपना जीवन संकट में डालते हैं। ऐसे देश में राजनीतिक दल जब आलीशान दफ्तरों में बैठकर उनकी बात करते हैं, तो लगता है कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। निश्चित रूप से अपने दफ्तरों को अच्छा बनाना चाहिए मगर उससे पहले जिन नागरिकों के लिए सियासी दल हैं, उनके जीवन को बेहतर बनाने का काम करना चाहिए। किसी का भी चरित्रहनन करना हमारी संस्कृति नहीं है बल्कि अपनी संस्कृति का बड़प्पन प्रस्तुत करना हमारा दायित्व है। हम किसी की लकीर को छोटा करके बड़े बनने वाले लोग नहीं हैं बल्कि प्रतिस्पर्धी की लकीर से अपनी लकीर को बड़ा करने वाली संस्कृति के लोग हैं। यही विचार और ज्ञान हमें विश्व गुरु बनाता था, न कि छिछले शब्द। दुख तब होता है जब हम गलत तथ्यों को प्रस्तुत करके किसी की बुराई करते हैं और खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश करते हैं। हाल के दिनों में सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की तस्वीरों को फोटोशोप के जरिए भद्दे और अश्लील तरीके से प्रस्तुत करके सोशल मीडिया पर परोसा गया। भाजपा के आईटी सेल पर इसके विस्तार का आरोप लगा। सवाल यह उठता है कि जब ऐसी घिनौनी हरकतें होती हैं तो भाजपा और सरकार के जिम्मेदार लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते और इन हरकतों के लिए क्षमा क्यों नहीं मांगते?
हमारी संस्कृति किसी का चारित्रहनन करने की इजाजत नहीं देती। किसी मृत व्यक्ति को लांछित करना घिनौना कृत्य माना जाता है। कुछ सालों से यह देखने में आ रहा है कि खुद को बड़ा दिखाने के लिए कुछ सियासी लोग तत्कालीन बड़ों का चरित्रहनन कर रहे हैं। इस काम के लिए लाखों रुपए वेतन पर विशेषज्ञों को रखा गया है। दुनिया के इतिहास पर गौर करेंगे तो विश्व के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका से लेकर तमाम छोटे मुल्कों तक दर्जनों ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब गरीब और भुखमरी के शिकार परिवारों की पृष्ठभूमि के लोग राष्ट्रपति/ प्रधानमंत्री सहित तमाम बड़े पदों पर पहुंचे। उन्होंने कभी इस बात का बखान नहीं किया कि वे दयनीय हैं। अब्राहम लिंकन हों या बराक ओबामा दो पीढ़ियों के राष्ट्रपति उदाहरण हैं। उन्होंने कभी शब्दों की मर्यादा को नहीं खोया। आलोचनाएं और सम्मान करने वालों को समान तरीके से लिया। यह बड़प्पन होता है। उच्च पदों पर पहुंचने वालों से इसी तरह के व्यक्तित्व की उम्मीद की जाती है, न कि निम्न स्तरीय शब्दों की। ऐसे शब्दों का स्थान न चुनाव प्रचार में और न ही शासन सत्ता संचालित करने में हो सकता है। उम्मीद है कि भविष्य में हमारे नेता हमारे मार्गदर्शक बनेंगे न कि पथ भ्रमित करने वाले। वे अपने व्यवहार और भाषा के संयम से इतिहास में सम्मानजनक स्थान दर्ज कराएंगे।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

छोटे किसानों और लघु उद्योगों को मदद की दरकार

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छोटे किसानों और लघु उद्योगों को मदद की दरकार 
भारत आदिकाल से कृषि प्रधान देश रहा है। प्रकृति ने इस देश को अकूत संसाधन दिये हैं, जिसका लाभ अपने श्रम के जरिए किसानों ने उठाया। कुटीर उद्योगों ने भी देश को उन्नत मार्ग दिखाया। किसान और लघु उद्योग के कर्मयोगियों के नियोजित विकास की परिणिति भारत को मिली “सोने की चिड़िया” की उपाधि के रूप में। इन मूल उद्यमों ने भारत की अर्थव्यवस्था को इतनी बेहतर बना दिया कि अरब और यूरोप के तमाम देशों ने हमें पाने के लिए सबकुछ किया। आक्रांताओं और साम्राज्यवादी देशों की सोच रही कि भारत की संपत्ति लूटेंगे और यहां की प्राकृतिक संपदाओं का मजा लेंगे। उनके इस लालच में किये गये हमलों ने हमारी संस्कृति से लेकर सभ्यता तक को बिगाड़ा। हमारा किसान और लघु उद्यमी इसमें सदैव पिसता रहा। यह दुख का विषय रहा कि हमारे शासकों ने उनके लिए कुछ ऐसा सार्थक नहीं किया कि वे मजबूत हो सकें। राजाओं के लिए किसान और कुटीर उद्योग चलाने वाले उनके ऐश ओ आराम के लिए “कर देने वाले” ही बने रह गये। राजाओं की इस नीति के बाद भी किसान और उद्यमी अपने श्रम के बूते देश को देते रहे। दुर्भाग्य की बात है कि देश की आजादी तक उन्हें हमने कुछ नहीं दिया और वे इस हालत में नहीं आ पाये कि अपनी जरूरतें भी पूरी कर सकें। आज जब उनके हित को सोचा जा रहा है तो तमाम लोग बेजा छाती पीट रहे हैं।
आजादी के बाद एक नये युग का शुभारंभ हुआ। हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस समस्या को गंभीरता से लिया। उन्होंने किसान और उद्योगों की समृद्धि को ध्यान में रखते हुए सत्ता संभालने के छह माह के भीतर ही विश्व के दूसरे सबसे बड़े भाखड़ा नंगल बांध और नेशनल फर्टिलाइजर लि. (एनएफएल) की नीव रखी। उस वक्त हमारे देश में अपना पेट भरने तक का अनाज भी नहीं हो पाता था। हमारे यहां उद्योगों के नाम पर भी कुछ नहीं था। पंडित नेहरू के प्रयासों ने न सिर्फ किसानों को आत्मनिर्भर बनाया बल्कि उद्योगों को नई दिशा दी। नतीजतन देश ने हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति, औद्योगिक क्रांति, शैक्षिक क्रांति और सैन्य क्रांति करके एक सशक्त भारत का निर्माण किया। नेहरू के बाद की सरकारों की जिम्मेदारी थी कि वे पंडित नेहरू के कार्यों को आगे बढ़ायें। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसानों और लघु उद्यमियों को समृद्ध बनायें, जिससे वे भी देश को अपना संपूर्ण दे सकें। लाल बहादुर शास्त्री ने अपने डेढ़ वर्ष के शासन में पंडित नेहरू के सपने को आगे बढ़ाने की कोशिश की मगर उनकी असमयिक मृत्यु से देश को झटका लगा। वह हारा हुआ भारत छोड़कर गये थे, जो उनके बाद की सरकार के लिए चुनौती था। इंदिरा गांधी ने उस चुनौती का सामना किया और सैन्य बल को मजबूत करने में लग गईं। उन्होंने पाकिस्तान को दो टुकड़े किया और सिक्किम को मिला लिया। उन्होंने अय्याशी करने वाले राजाओं को सीमित कर उनके धन को देश के निर्माण में लगाया। इन चुनौतियों से जुझते हुए उन्हें छोटे किसानों और लघु उद्योगों के लिए कुछ करने का वक्त नहीं मिला। हालात बिगड़े और वह 1977 में चुनाव हार गईं। गैर कांग्रेसी सरकार में देश की हालत और भी खराब हुई, तो जनता ने इंदिरा गांधी पर फिर से भारी विश्वास जताया। इस बार इंदिरा ने सुधार किया और उन्होंने किसानों तथा लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की दिशा में काम शुरू किया।
देश के समक्ष चुनौती सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में खड़ी हुई। उन्होंने युवाओं को सक्षम बनाने की दिशा में तो क्रांति की मगर किसान और लघु उद्यमी फिर पिछड़ गया। राजीव के बाद किसानों और लघु उद्योगों की दशा सुधारने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ। डा. मनमोहन सिंह ने अपनी पहली सरकार में पिछली सरकारों की गलतियां सुधारने पर काम किया मगर दूसरी सरकार में वह उसे अमलीजामा नहीं पहना पाये। उन्होंने न तो स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू की और न ही खुद के बनाये एमएसएमई मंत्रालय को सक्रिय कर पाये। दोनों क्षेत्रों में पिटने से सरकार के अच्छे काम भी खराब दिखने लगे। तमाम आरोपों प्रत्यारोपों के बीच डा. मनमोहन सरकार चली गई और नरेंद्र मोदी सरकार आई। उम्मीद की गई कि यह सरकार किसान और लघु उद्योग हितैषी होगी मगर साढ़े चार साल में ऐसा कुछ नहीं हुआ कि इनकी हालत सुधरे। हालांकि वादे किये गये कि किसान की आमदनी दोगुनी हो जाएगी। वह तो नहीं हुई मगर महंगाई जरूर दोगुनी हो गई। ऐसे में किसान खुद को ठगा महसूस कर रहा है और लघु उद्यमी जीएसटी की मार से बेहाल है। भले ही एमएसएमई सेक्टर का जीडीपी में आठ फीसदी योगदान हो मगर देश के पांच करोड़ लोग लघु उद्योगों में रोजगार पाते हैं। कृषि क्षेत्र में देश की 43 फीसदी आबादी लगी हुई है। इस आबादी के औसत से न तो कृषि योग्य भूमि है और न ही आय। हमारी सरकारों की गलत नीतियों के चलते कृषि योग्य भूमि में कंक्रीट के जंगल खड़े हो चुके हैं। वहीं कारपोरेट को सरकार का भारी संरक्षण भी समस्या बन गया है। जो भविष्य की आफत का संकेत हैं। ऐसी हालत में देश के छोटे किसानों और लघु उद्यमियों के आत्महत्या करने की घटनायें आम हो रही हैं। उसे संरक्षण और सहनुभूतिपूर्वक मदद की दरकार है।
हाल वक्त की सरकारों की दशा यह हो गई है कि उन्हें कारपोरेट और बड़े औद्योगिक घराने अपने मुताबिक चला रहे हैं। वे अपने हितों के लिए छोटे किसानों से लेकर लघु उद्यमियों तक को खत्म कर देना चाहते हैं। कारपोरेट फार्मिंग की दिशा में उतरने लगे हैं। ऐसे में अगर हमने अपने किसानों और लघु उद्यमियों को सहनुभूतिपूर्वक मदद नहीं की तो वह दिन दूर नहीं जब देश का एक बड़ा वर्ग बेरोजगार होगा। बेरोजगारों की जमात असमानता का शिकार होकर अराजक हो जाएगी। अगर हमें अपने देश और उसके भविष्य को बचाना है, तो किसानों तथा लघु उद्यमियों की समस्याओं को दूर करना होगा। किसानों को सहयोग देकर विविध बाजार एवं सहयोगी रोजगार के कुटीर उद्योगों को चलाने में मदद करनी होगी। उन्हें खेत से लेकर बाजार तक संरक्षण देना होगा। छोटे और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, जिससे वे रोजगार के साथ ही अपनी जरूरतें पूरी करने में सक्षम बन सकें। जब तक ऐसा नहीं होता, हमारा युवा इस चमक-धमक की दुनिया में भ्रमित होता रहेगा। किसान, लघु उद्यमी और बेरोजगार या तो आत्महत्या करेंगे या फिर हत्या। हमें देश को बचाना है तो इस दिशा में गंभीरता से चिंतन भी करना होगा और सार्थक काम भी।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

यह हमारा धर्म तो नहीं हो सकता..

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यह हमारा धर्म तो नहीं हो सकता..
गंगाजमुनी संस्कृति वाले सनातन धर्मियों को आखिर क्या हो गया है? क्या वो अपने धर्म में सिखाये जाने वाले पाठ भूल गये हैं या फिर आक्रांताओं के धर्मावलंबी बन गयें हैं? राम-कष्ण और शिव को उत्पन्न करने वाले उत्तर प्रदेश में गत दिनों जो घटा उसने ये सवाल खड़े किये हैं। अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रहे एक एसएचओ को मदांध धर्म के ठेकेदारों ने मार डाला। गाय को हमने इसलिए माता कहा था क्योंकि वह मानव जीवन का पोषण करने में योगदान देती है। यहां तो गाय के नाम पर मानव और मानवता दोनों की हत्या कर दी गई। आरोप चाहे जो भी हों मगर धर्म के नाम पर जो अराजकता पनपी और पनपाई जा रही है, वह किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। दुख होता है जब हम धर्म के नाम पर वह करते हैं जो हमारे धर्म में वर्जित है। जीवन देने और बचाने की शिक्षा देने वाले धर्म के ठेकेदार मानव जीवन भी छीन रहे और भाईचारा भी। हमारा धर्म तो ऐसी कदापि न था।
हमें यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि पिछले चार सालों के दौरान अजब सी अराजकता देश में पनपी है। कहीं गाय के नाम पर तो कहीं धार्मिक स्थल के नाम पर मानवता की हत्या की जा रही है। अगस्त 2014 में दिल्ली में दो मुस्लिम मांस विक्रेताओं को बीफ बेचने का आरोप लगाकर मरणासन्न कर दिया गया। इसी तरह के आरोप में मंगलोर में कुछ लोगों को अधमरा कर दिया गया। एक माह बाद ही नोयडा के निठारी में एक बुजुर्ग मुस्लिम को पीट-पीटकर मार डाला गया। यह अराजकता शुरू हुई तो रुकने का नाम नहीं ले रही। धर्मांधता के नाम पर सिर्फ चार सालों में चार दर्जन से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। अब तो इसका शिकार हिंदू धर्मांवलंबी भी होने लगे हैं। कभी गोवंश के कथित हत्यारों को मारा जाता है तो कभी उसको पालने वालों की हत्या कर दी जाती है। विस्मय तब होता है जब वो लोग धर्म के ठेकेदार बनते हैं जो उसका छोर भी नहीं जानते। सनातन धर्म के विपरीत आचरण करने वालें ऐसे लोगों को सत्य और तार्किक बातें करने वाले धर्महीन अथवा राक्षसी प्रवृत्ति के नजर आते हैं।
सनातन धर्म के मूल वेद हैं, जो हमें ज्ञान के साथ ही उच्च नैतिक आदर्श बनाये रखने को कहते हैं। वे आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक क्षेत्र के लिए भी दिशानिर्देश देते हैं। इनका दर्शन सत्य, अहिंसा, प्रायश्चित, संयम और आध्यात्मिक विकास का है। वेद कभी किसी भी स्थिति में बदला लेना नहीं सिखाते और न हीं हिंसक होना। यही कारण है कि 7 नवंबर 2003 को युनाइटेड नेशंस एजुकेशन साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (यूनेस्को) ने वेदों को मानवता की मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया था। अथर्ववेद के 138वें सूक्त में स्पष्ट लिखा है “प्रियं मा कृणु देवेष प्रियम राजषु मा कृणु, प्रियम सर्वस्व पश्यत उत शुद्र उत्तार्ये”। अर्थात हम ऐसा व्यवहार करें कि सभी जातियों के प्रिय बनें। वेद यहीं नहीं रुकता बल्कि 140वें सूक्त में स्पष्ट करता है “सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्त समेकाभिदभ्यंहुशे गात, आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीले पथां विसर्गे धरूणेषु तस्यौ”। यानी हिंसा, चोरी, व्यभिचार, मद्यपान, जुआ, असत्यभाषण एवं पाप में सहयोगी होना ही सप्त मर्यादा है, जो मानव जीवन के लिए घातक है। हमें इससे सदैव मुक्त रहना चाहिए।
वैदिक सिद्धांतों के विपरीत आचरण करने वाले खुद को सनातनधर्मी बताते हैं। वह सनातन धर्म की पताका लिये ऐसा व्यवहार करते हैं जो किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। धर्म क्या है, इसे समझना जरूरी है। यह हमारे कर्तव्यों और उनकी मर्यादाओं का विन्यास है। यह राजसत्ता संभालने वालों से लेकर एक कर्मकार तक को दिशा निर्देश देता है। तमाम सनातन धर्मी यह भूल जाते हैं कि हिंदू” नाम मुस्लिम आक्रांताओं ने दिया था। उन्होंने सिंधु घाटी के इस पार के लोगों को हिंदु कहकर संबंधित किया क्योंकि हिंदुकुशा की पहाड़ियों के इस पार हमारे पूर्वज निवास करते थे। उनके दिये संकुचित सोच वाले नाम के कारण हम हिंदू बन गये जबकि हम तो सनातन से उतपन्न विशुद्ध ज्ञान पर आधारित लोग थे। हम किसी का अहित करने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। ज्ञान विज्ञान के धनी हम लोग शांति और सौहार्द के साथ आगे बढ़ने वाले थे। यही कारण है कि हजारों हमलों के बाद भी सनातन धर्म को कोई नुकसान नहीं हुआ मगर अब हो रहा है। हमारे ही कथित धर्म रक्षक अपने धर्म को हानि पहुंचा रहे हैं। जिन सिद्धांतों के कारण हम विजित हैं, धर्म-गौ रक्षा के नाम पर वही नष्ट किये जा रहे हैं।
पुलिस व्यवस्था हमारे समाज में सदैव विभिन्न रूपों में रही है। राज धर्म के सिद्धांतों पर आधारित पुलिस व्यवस्थाओं को संयमित और संचालित करने का न्याय पर आधारित एक सख्त हिस्सा थी। देश की आजादी के पूर्व और बाद में संगठित तरीके से कानूनों को विधिसम्मत तरीके से लागू करने का माध्यम बनी मगर आज यह एक अराजक भीड़ बन कर रह गई है। अगर ऐसा ही रहा तो यह देश के लिए घातक और विनाशक होगा। दुख तब होता है जब धर्म के नाम पर सत्ता हासिल करने वाले यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ बुलंदशहर में हुई मॉब लिंचिंग के सच को स्वीकार करने से इंकार कर देते हैं। वेद असत्य भाषण को धर्म का ह्रास मानते हैं और योगी-मोदी वही सबसे ज्यादा करते हैं। योगी ने कहा है कि, राज्य में कोई मॉब लिंचिंग नहीं है, बुलंदशहर की घटना केवल एक दुर्घटना है जबकि सभी चैनलों ने घटना को दिखाया है। वह न विधि सम्मत व्यवस्था संचालित करने पर यकीन रखते हैं और न ही पुलिस व्यवस्था को स्वच्छ एवं समर्थ बनाने पर। यह लोग कथित धर्म के नाम पर अराजकता के पोषक बन गये हैं क्योंकि उन्हें इसमें सत्ता की चाबी नजर आती है।
हम सभी को धर्म और उसके सिद्धांतों-नियमों तथा संदेश को समझना होगा। उनका मनन करना होगा। हमारा धर्म किसी भी दशा में अराजकता का पोषण नहीं करता बल्कि मानवता से युक्त समानता पर आधारित न्याय व्यवस्था पर विश्वास करता है। हमारा धर्म किसी भी जाति या मानव में भेद करना नहीं सिखाता बल्कि व्यवस्थित तरीके से जीवन जीना सिखाता है। धर्म को न जानने समझने वाले अराजक लोग हमें धर्म की परिभाषा बताते हैं और हम यकीन कर लेते हैं जो हमारी मूर्खता का परिचायक है न कि बुद्धिमत्ता का। हम ओछी राजनीति के लिए धर्म का प्रयोग न होने दें नहीं तो हम वास्तव में धर्महीन हो जाएंगे।

जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

दागदार होती यूपी की पुलिसिंग!

PULSE..
दागदार होती यूपी की पुलिसिंग! 
यूपी पुलिस देश की ही नहीं विश्व की सबसे बड़ी एकमात्र पुलिस है। यह बात हम जितने गर्व के साथ कहते हैं उतने ही शर्म के साथ यह भी कहना पड़ता है कि अमानवीयता, भ्रष्टाचार और असुरक्षा का आभास कराने वाला सबसे बड़ा पुलिस बल भी देश में यही है। यह किसी एक घटना मात्र के कारण नहीं बल्कि सतत यूपी पुलिस की हरकतों के कारण ही कहना पड़ रहा है। यूपी में रहने वाले लोग पुलिस को मित्र या सहयोगी नहीं मानते बल्कि उससे खौफ खाते हैं या ताकतवर लोगों की सेवा करने वाले घरेलू नौकर की तरह देखते है। यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी है बल्कि लगातार हुए नैतिक और मूल्यों के क्षरण के कारण हुआ है। कभी सुरक्षा का आभास कराने वाली पुलिस आखिर कैसे निचले पायदान पर आकर खड़ी हो गई है। हमने यूपी पुलिस के स्वर्णिम काल को भी देखा है और अब बदतर होते हालातों को भी देख रहे हैं। कई बार यह लगता है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं। यूपी पुलिस में ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत बढ़ी है जो किसी भी नैतिकता को ताक पर रखकर अधिक से अधिक कमाने के फेर में लगे रहते हैं। हालात तो यह हैं कि जो युवा इस नौकरी में आ रहे हैं वह पहले ही अपना टारगेट फिक्स करते हैं। उन्हें अब जनसेवा और सुरक्षा का जुनून नहीं है बल्कि खुद के लिए ठाट बाट जुटाना ही मकसद बन गया है।
देश की आजादी के बाद यूपी पुलिस के पहले भारतीय आईजीपी बीके लहरी बने। उन्होंने पुलिसिंग के लिए जो मानक तय किये, उन्होंने इसका इतना मान बढ़ाया कि देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वयं इसे “कलर्स” प्रदान किया था। पुलिसिंग इस स्तर की थी कि लोगों को न केवल जीवन में सुरक्षा का आभास होता था बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए पुलिस अपराध नियंत्रण से लेकर सुरक्षित नगरीय एवं ग्रामीण व्यवस्था में योगदान देती थी। पुलिस एक्ट 1861 के तहत 1863 में बनी यूपी पुलिस ने अपना ध्येय वाक्य बनाया था “सुरक्षा आपकी संकल्प हमारा”। 1982 तक यूपी पुलिस का प्रमुख आईजीपी होता था और नरेश कुमार इसके आखिरी आईजीपी और पहले डीजीपी बने थे। इसके बाद दिल्ली के पहले पुलिस आयुक्त रहे जेएन चुतुर्वेदी, प्रकाश सिंह, वीएस माथुर, श्रीराम अरुण, विक्रम सिंह और ब्रिज लाल जैसे तेज तर्रार और मूल्यों पर काम करने वाले पुलिस महानिदेश बने। इन अफसरों ने ध्येय वाक्य का पालन कराने के लिए हर संभव कोशिश की और महकमें में अनुशासन बनाये रखने पर जोर दिया। जो अब देखने को नहीं मिल रहा है।
यूपी पुलिस का मतलब अब वहां के लोग जो निकालते हैं उससे तो चेहरा ही बदल जाता है। कोई कहता है कि सबसे ज्यादा अनुशासनहीन पुलिस तो कोई कहता है घूसखोर पुलिस, कोई इसे शोषण करने वाली पुलिस बताता है तो कोई पूरे महकमें पर ही सवालिया निशान लगा देता है। यहां कि पुलिस कब किसको किसके कहने पर मुलजिम बना देगी और कब मुलजिमों को ही सलाम बजाने लगेगी नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो सदैव से पुलिस सियासी रंग में रंगी रही है मगर अब पुलिस सियासी टूल के रूप में ही पहचानी जाने लगी है। इसमें सुधार के लिए सबसे पहला प्रयास जेएन चतुर्वेदी ने किया था। उन्होंने सियासी दबाव डालकर तबादला कराने की कोशिश करने वाले एक वाराणसी में तैनात डीएसपी को जब निलंबित किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरना पड़ा था। इस विवाद के बाद जेएन चुतुर्वेदी ने पुलिस जनों का इतना मनोबल बढ़ाया था कि सियासी हुक्म पर नहीं पुलिसिंग जनता और न्याय के हितों के लिए ही होनी चाहिए। यूपी के पहले अनुसूचित जाति के डीजीपी बने श्रीराम अरुण ने दबे कुचले वर्ग को संबल देने की दिशा में सार्थक प्रयास किये। डीजीपी के रूप में प्रकाश सिंह ने एक सख्त प्रशासक का रुख अपनाया और अपराधियों पर शिकंजा कसा। उन्होंने पुलिस सुधार के लिए याचिका दाखिल की जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के लिए निर्देश जारी किये मगर उनको उचित स्थान यूपी में ही नहीं मिल सका जबकि दूसरे कई राज्यों ने पुलिस सुधार पर काम किया।
यूपी की राजधानी लखनऊ में दो सिपाहियों के गैंग ने हाल ही में मल्टीनेशनल कंपनी के मैनेजर विवेक तिवारी की हत्या कर दी। साफ है कि इस हत्या में विवेक ने सिपाहियों पर न कोई हमला किया और न ही जानलेवा प्रयास। उसने पुलिस वालों को बदमाश समझा और गाड़ी नहीं रोकी। सभी को पता है कि लखनऊ में कई बार पुलिसकर्मी लूटपाट करते पकड़े जा चुके हैं। जिस जगह घटना हुई वहां न कोई पुलिस नाका था और न ही कोई ऐसा रूट की पुलिस जांच की जरूरत पड़े। यह एक घटना नहीं है, इसी तरह नोयडा में एक थानेदार ने एनकाउंटर का ड्रामा रचा और एक निर्दोष युवक को गोली मार दी। भाग्य से वह युवक बच निकला तो सच सामने आ गया। थानेदार को निलंबित कर दिया गया मगर इससे उस युवक की सामान्य जिंदगी नहीं लौट सकती। हमें याद है कि तमाम बार यूपी पुलिस झूठे मुकदमे बनाकर लोगों को फंसाती और जिंदगी बरबाद करती रही है। जिसके तमाम उदाहरण मौजूद हैं मगर अफसरों ने न सच जानने की कोशिश की और न ही इस तरह की घटनाओं को रोकने की। इसी का नतीजा है कि गलत करने वालों के हौसले बुलंद होते गये।
प्रदेश को एक योगी मुख्यमंत्री के रूप में मिला है, तो उम्मीद की जा सकती है कि कुछ अधीन है। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण के साथ ही ईमानदार और निष्पक्ष काम करने वाले पुलिसजनों का मनोबल बढ़ाने की जरूरत है। यह भी जरूरत है कि बेईमानी के अवार्ड न दिये जायें। मानवता, नैतिकता, मूल्यों और आमजन को मित्र की तरह देखने समझने का प्रशिक्षण दिया जाये। पीड़ित को अपना दर्द लेकर धक्के न खाने पड़ें बल्कि पुलिसजन उसके समीप जायें। सियासी दबाव को रोकने के लिए थानों में नेतागिरी बंद हो। एसपी की तैनाती का मानक तय हो। सियासी पैरोकारी के आधार पर नहीं बल्कि मेरिट पर नियुक्ति की जाये और उनकी जवाबदेही तय हो। जब तक जवाबदेय पुलिसिंग तैयार नहीं होगी, पुलिस पर दाग लगते ही रहेंगे। पुलिस कर्मी को भी सम्मान और विश्वास से लबरेज करना होगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

सिर्फ श्रेय नहीं जिम्मेदारी भी लीजिए साहेब


 PULSE.. 
सिर्फ श्रेय नहीं जिम्मेदारी भी लीजिए साहेब

हम दिल्ली में जंतर-मंतर से गुजर रहे थे, देखा भारत संचार निगम के हजारों मुलाजिम धरने पर बैठे हैं। वहां कानपुर से आए विजय भाई से मुलाकात हुई, हालचाल पूछा तो उनकी आंखें भर आर्इं। बोले, भाई बरबाद कर दिया है सरकार ने। बेटी की पढ़ाई छुड़वा दी है क्योंकि फीस नहीं भर पा रहा। सरकारी कॉलेज में भी फीस इतनी ज्यादा है कि पूछिये मत। वेतन पिछले आठ महीने से नहीं मिला है। कई लोगों को तो डेढ़ साल से नहीं मिला। आपका मीडिया भी हमारा दर्द नहीं दिखाता। समझ नहीं आ रहा कि क्या करें? बीएसएनएल की हालत यह हो गई है कि स्थाई कर्मचारियों को भी वक्त पर वेतन नहीं मिलता। न सरकार सुन रही है, न प्रबंधन। मीडिया भी हमारे प्रति चुप्पी साधे है। भविष्य अंधकार में है। विजय मिश्र की बात सुनी तो पिछले महीने बैंकिंग सेक्टर के कुछ मित्रों की बात याद आ गई। उनकी दशा भी अच्छी नहीं थी। उनका कहना था कि बैंकों को वे लोग कंगाल बना रहे हैं जिन पर उसे समृद्ध बनाने की जिम्मेदारी है। सरकार कई बैंकों को खत्म कर उनके विलय की तैयारी में है। केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह पंजाब में स्थित एक शोध संस्थान को बंद करने का फैसला कर लिया है। भाभा एटामिक संस्थान के वैज्ञानिकों को शोध कार्य के लिए फंड तो छोड़िये वेतन भी वक्त पर नहीं मिल रहा। हमारे विज्ञानी संकट के दौर में हैं। ऐसा नहीं है कि सभी जगह हालात खराब हैं। देश का कारपोरेट दिन दोगनी रात चौगुना बढ़ रहा है। कुछ सियासी दल और उसके नेताओं के लिए देश सोने की चिड़िया बन गया है।
हम भारत के नागरिक हैं और देश का कोई भी सरकारी उपक्रम हमारी खून पसीने की कमाई पर खड़ा है। उसमें देशवासियों और देश की संपत्ति लगी है। यह किसी व्यक्ति, सियासी दल या समूह की संपत्ति नहीं है। हमारे देश के नवरत्न समझे जाने वाले सरकारी उपक्रम मरणासन्न हो रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं ने अपनी साख खो दी है। केंद्र और राज्य सरकारों के करीब 23 लाख पदों को पिछले पांच सालों में भरा नहीं गया, जिन्हें खत्म करने का फैसला सरकार कर चुकी है। रोजगार मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक एक तरफ देश में शिक्षित दक्षता प्राप्त करीब 50 लाख युवा हर साल बेरोजगार हो रहे हैं तो दूसरी तरफ नए पदों के सृजन के बजाय उन्हें खत्म किया जा रहा है। ठेके और आउटर्सोसिंग के जरिए युवाओं से काम कराया जा रहा है। नतीजतन अपने भविष्य को लेकर युवा न केवल चिंतित है बल्कि पलायन की दिशा में बढ़ रहा है। नीति आयोग ने भी फरवरी, 2018 में स्वीकार किया कि रोजगार की स्थिति ठीक नहीं है। महंगाई का आंकड़ा आप यूं समझ सकते हैं कि जो बिस्कुट का पैकेट मार्च 2014 में पांच रुपए का मिलता था, वह अब 10 रुपए का मिलता है। इसबगोल की भूसी का 200 ग्राम का जो पैकेट 90 का था, वह अब 180 रुपए का मिलता है। यही नहीं सड़क किनारे जो चाय पांच रुपए की मिलती थी वह अब 10 रुपए की मिलती है। जो समोसा 5 रुपए का था, वह 15 रुपए का मिलता है।
किसान को अपनी उपज की लागत का दोगुना देने की बात की जाती थी मगर उसकी लागत भी नहीं निकल रही है। इसका हालिया उदाहरण आगरा के एक आलू किसान प्रदीप शर्मा का है। प्रदीप ने साल भर मेहनत और जमा पूंजी लगाकर आलू उपजाए। उन्होंने अपने 19 टन आलू को जब बेचा, तो लागत चुकाने के बाद उनके हाथ 490 रुपए आए। वह भी उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को मनीआॅर्डर कर दिए। किसान को भले ही अपनी उपज की लागत न मिल रही हो मगर बिचौलियों को कोई कमी नहीं है। मंडी में बैठा बनिया लग्जरी गाड़ियों से चलता है। किसान की उपज से होटल-रेस्टोरेंट चलाने वाले करोड़ों रुपए में खेलते हैं। जिस दवा को बनाने और अन्य खर्च के बाद लागत 10 रुपए आती है, वह मरीज को 50 से 100 रुपए तक में मिलती है। सवाल यहीं है कि जहां सरकार का राजस्व घाटा लगातार बढ़ रहा है। कारपोरेट जगत की पूंजी बढ़ रही है। मुनाफे वाली सरकारी कंपनियां और निगम, बीमारू उद्योगों में बदल रहे हैं। उनको खरीदकर या ठेके पर लेकर कारपोरेट कंपनियां मालामाल हो रही हैं। मोदी सरकार ने वादा किया था कि कड़े और योजनागत वित्तीय प्रबंधन के जरिए न केवल बीमार उद्योगों को सेहतमंद बनाएंगे बल्कि जो अच्छी हालत में हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाकर युवाओं के लिए रोजगार सृजित करेंगे। किसानों से लेकर उद्योगपतियों तक के लिए अच्छे दिनों के सपने दिखाए गए थे। लघु और मध्यम उद्योगों में देश के रोजगार का 45 फीसदी हिस्सा है। उसको संबल देने के लिए एमएसएमई मंत्रालय बनाया गया था। मोदी सरकार से इस उद्योग को भी काफी उम्मीदें थीं मगर पांच साल में नतीजे कुछ नहीं निकले। वजह साफ है कि देश में अच्छे दिनों पर हक सिर्फ कारपोरेट सेक्टर का ही बना है।
देश में आम चुनाव का एलान हो चुका है। वर्ष 1951 में जब संविधान के दायरे में पहला चुनाव हुआ था तब सरकार सहित सभी खर्च 10 करोड़ रुपए के थे। इस वक्त विश्व में सबसे महंगा चुनाव हमारे देश में होने लगा है। वर्ष 2013-14 में सियासी दलों की कारपोरेट फंडिंग 85.38 करोड़ रुपए थी जो 2014-15 में 1.78 अरब रुपए हो गई। 2017-18 में यह रकम बढ़कर करीब 13 अरब रुपए हो गई। पिछले चार सालों में हुए राज्यों के चुनावों में कारपोरेट फंडिंग 10 खरब रुपए हुई है। इसमें सबसे ज्यादा 6 खरब रुपए भाजपा को मिले जबकि चार खरब में बाकी सभी दल शामिल हैं। इसमें अहम बात यह है कि हमारी सरकारों ने इस दरम्यान कारपोरेट सेक्टर को 60 खरब से अधिक की रियायत देकर उनकी फंडिंग का कर्ज चुकाया है। इन आंकड़ों से एक बात साफ है कि देश की सत्ता बदलने के बाद अच्छे दिनों का इंतजार कर रहे बेरोजगार और किसान संकट में हैं। गृहणियों से लेकर कामगार तक अपने जीवन की अनिश्चितता में डूबे हैं। मिनिमम गवर्नमेंट, मैग्जिमम गवर्नेंस का वादा करने वाली सरकार में नौकरशाही के अच्छे दिन आये हैं। उनकी कमाई हर तरह से बढ़ी है, जबकि जिसे गवर्नेंस की जरूरत थी वे सरकार के बोझ में दबते चले गए हैं।
निश्चित रूप से चुनाव के दौर में हम यह विपक्ष से तो नहीं पूछेंगे कि आपने जो वादे किए थे, उनका क्या हुआ? यह सवाल तो सत्तारूढ़ दल से ही पूछा जाएगा। जब आप सैन्य सुरक्षा के नाम पर भी श्रेय लेने से नहीं चूकते तो फिर आपको नाकामियों पर जवाब तो देना ही होगा। देश के युवाओं, किसानों, गृहणियों और बच्चों की जरूरतें आपके राष्ट्रवाद के भाषणों से पूरी नहीं होंगी। उनके लिए जमीनी तौर पर करना होगा। सियासी दलों और कारपोरेट के अच्छे दिनों के लिए हमने सरकार नहीं बदली थी, बल्कि अपने देश और देशवासियों के अच्छे दिनों के लिए सत्ता सौंपी थी। अब आप वह नहीं दे सके तो इस नाकामी की जिम्मेदारी लीजिए और उसके लिए राष्ट्र से माफी भी मांगिये। हमारी भक्ति देश के प्रति है, न कि किसी सियासी दल या व्यक्ति के प्रति।

जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

सच को सामने लाना राष्ट्रहित में आवश्यक

पल्स : अजय शुक्ल

सच को सामने लाना राष्ट्रहित में आवश्यक 

ऋग्वेद दिशानिर्देश देता है कि राष्ट्र का संचालन करने वाला व्यक्ति विद्वान हो और संपूर्ण राष्ट्र की उसके प्रति निष्ठा एवं विश्वास हो। राष्ट्र संचालक को पिता की तरह सभी के हित के लिए प्रतिबद्ध होने के साथ ही संरक्षण देने वाला होना चाहिए। किसी को बड़ा या छोटा समझने की गलती नहीं करनी चाहिए बल्कि सभी के प्रति समभाव होना चाहिए। उसे सत्य और निष्ठाके साथ राष्ट्रहित में काम करना चाहिए, न कि कुछ समुदाय और जनों के हित में। लंबे वक्त से भारत को उसके स्वर्णिम काल का सम्मान वापस लाने की चर्चाएं होती रही हैं मगर दुख तब होता है जब ये चर्चाएं सिर्फ बातों में ही सिमट जाती हैं। हमारे कुछ लोग व्यक्ति भक्ति में लीन हो जाते हैं कि उसे ही राष्ट्रभक्ति समझने लगते हैं। सत्य का संवाद खत्म होने लगता है। बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि राष्ट्रहित में सत्य को सामने लाने के लिए अगर गलत राह पर भी चलना पड़े तो यह अपराध नहीं होता। राष्ट्र सर्वोपरि है। उसके हितों को साधना सभी देशवासियों की जिम्मेदारी है। ऋग्वेद का कहना है..ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदो ऽमध्यमासो महसा वि वार्व्धु:, सुजातासो जनुषा पर्श्निमातरो दिवो मर्या आ नो अछा जिगातन!! अर्थात राष्ट्रभक्तों में बड़ा या छोटा होने की भावना के बजाय राष्ट्रहित में सद्भाव के साथ प्रगति के लिए काम करना चाहिए।
राफेल डील को लेकर द हिंदू अखबार ने कई खोजी खबरें छापीं। उन खबरों को आधार बनाकर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर डील की जांच कराने की मांग रखी। अदालत में केंद्र सरकार के महान्यावादी ने कहा कि जिन दस्तावेजों के आधार पर यह खबरें छपी हैं, वो रक्षा मंत्रालय से चोरी किए गए थे। यह दस्तावेज अति गोपनीय हैं। आॅफीसियल सीक्रेट एक्ट के तहत यह अपराध की श्रेणी में आता है। इन खबरों के स्रोत पर जांच कराए जाने के साथ ही अखबार के संपादकीय निदेशक एन राम के खिलाफ कार्रवाई की जाए। संभव है दस्तावेज चोरी किए गए हों और यह कृत्य गोपनीयता के तहत आता हो। सच तो यह है कि इन दस्तावेजों का इस्तेमाल राष्ट्रहित में सच को सामने लाने के लिए किया गया। एक बड़ी रक्षा डील पर घोटाले के जो आरोप लगे, इस अखबार ने उस पर पड़े तमाम पर्दों को उठाकर ईमानदार पत्रकारिता का परिचय दिया जो राष्ट्र को धोखे से बचाने की एक कोशिश थी। इस मामले में अगर किसी भी आधार पर अखबार या उसकी संपादकीय टोली पर कार्यवाही की जाती है तो वह लोकतंत्र के उस आधार को नष्ट करने वाली होगी, जो सच को सामने लाने का काम करती है। एन राम ने जिस ईमानदारी का परिचय दिया और तथ्यों को सामने लाए, उसके लिए उनके खिलाफ मुकदमा नहीं सम्मान मिलना चाहिए।
कई बार हमारे हित चिंतक हमसे कहते हैं कि इतना सच मत बोलो, संकट में फंस जाओगे। हम उनकी मनोभावना और सद्भावना की कद्र करते हैं मगर यह भी कहना चाहते हैं कि अगर हम ही सच से भागेंगे तो सिर्फ झूठ बिकेगा। हमारा धर्म है कि हम सच बोलें और लिखें भी। किसी की सहमति और असहमति हमारे लिए मायने नहीं रखनी चाहिए। हमारे जीवन या किसी अन्य हित को अगर इससे खतरा होता है तो भी नहीं डरना चाहिए। तुलसीदास ने रामचरित मानस में स्पष्ट किया है.. हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ! हम अगर भारतीय मनीषियों के विचारों पर विश्वास करते हैं तब तो हमें डरने की कोई आवश्यकता ही नहीं। बीते दिनों हमने सोशल मीडिया पर यह बात कही भी कि पत्रकार को आलोचनाओं, धमकियों और हमलों से नहीं डरना चाहिए। वैसे जरूरी नहीं कि हर कोई हमारे मंतव्य से सहमत हो। कितना भी झूठ बोलो सच को बदलना संभव नहीं।
झूठ एक स्थान और कुछ शक्तियुक्त लोगों का हथियार हो सकता है मगर सर्वत्र नहीं। हम वैश्विक दुनिया में जी रहे हैं, जहां हमें अपनों के अलावा दूसरे भी देखते और परखते हैं। इन हालात में जब हम सच पर केंद्रित होंगे और उसे सामने लाने का संघर्ष करेंगे तो देर सबेर जीतेंगे, शर्त सिर्फ इतनी है कि हम दुर्भावना से ग्रसित न हों। यह वक्त न केवल सच बोलने का है बल्कि सच को सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करने का भी है क्योंकि सच को छिपाया भी जा रहा है और तोड़ा मरोड़ा भी। भारतीय मीडिया विश्वसनीयता खोने के हर मौके को अजमा रहा है, जो उसके भविष्य के लिए घातक है। फौरी या फिर कुछ लाभ के लिए मीडिया बगैर जांचे परखे तमाम ऐसे तथ्य प्रस्तुत कर रहा है जो एक एजेंडे की तरह गढ़े गए हैं।
कुछ लोग ऐसे मीडिया को भक्त या गोदी मीडिया कहते हैं। जो मीडिया सच दिखाने की कोशिश करता है, उसको भक्ति रस में रचे लोग गद्दार की संज्ञा देते हैं। ऐसे लोग गालियों का भी प्रयोग करने से नहीं हिचकते। वे भारतीयता की बात करते हैं मगर संस्कारविहीन हो जाते हैं। इसका उत्तर तुलसीदास ने रामचरित मानस में दिया है.. जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। सच बोलने-लिखने वाले को डरने की जरूरत नहीं है। कई बार अग्निपरीक्षा देनी पड़ सकती है मगर वह भी तो योग्य ही देते हैं, अयोग्य नहीं। वैश्विक जगत में हमारे पास इतने साधन उपलब्ध हैं कि हम चंद मिनटों में ही सही गलत की समीक्षा कर सकते हैं। मीडिया को दोष देने के बजाय हम उस साधन का इस्तेमाल करें और सच जानें, जो आपका हक है।
डिजिटल युग में बदलाव के दौर में जरूरत है अपनी साख बचाये रखना। राष्ट्रहित में सच को प्रस्तुत करना। इसके लिए कोई बड़ा सुपर कंप्युटर नहीं चाहिए बल्कि ईमानदारी की जरूरत है। हम सच को खोजें और उसे जैसा है जहां है प्रस्तुत कर दें। उसको पढ़ने वाला हो या देखने वाला, समझदार है। सच की मीमांशा उसे करने दीजिए, आप जज मत बनिये।
राष्ट्रीयता की भावना होना अच्छा है। मगर राष्ट्रवादी होने से बहुत अच्छा है राष्ट्रभक्त होना। व्यक्तिवाद आपको एकांकी कर देगा। आप और हमारा राष्ट्र इस एकांकीपन में अपनी सभ्यता-संस्कृति खो देगा, जिसे स्थापित करने में हजारों साल लगे थे।

कृतज्ञता प्रकट कर आगे बढ़िये.. शांति में ही समृद्धि है

पल्स अजय शुक्ल
कृतज्ञता प्रकट कर आगे बढ़िये.. शांति में ही समृद्धि है
भारतीय संस्कृति में कृतज्ञता का भाव सबसे अहम माना गया है। ऋग्वेद से लेकर गीता और फिर रामचरित मानस तक में इसको महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सनातन धर्म में स्पष्ट है कि शत्रु के प्रति भी कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। इस वक्त देश संकटों के दौर से गुजर रहा है। कुछ लोग इन संकटों का लाभ उठाना चाहते हैं, तो कुछ गमगीन और गुस्से में हैं। भावनाओं और प्रतिक्रियाओं के बीच लोग लोकाचार-शिष्टाचार भी भूल गए हैं। राष्ट्रभक्ति के बजाय राष्ट्रवाद पर जोर है। राष्ट्रहित के बजाय एजेंडे को साधने का चिंतन चल रहा है। शहीदों की चिताओं में जिम्मेदार लोग अपने हाथ सेंकने का काम कर रहे हैं। यह उन सभी के लिए चिंता का विषय है जो देश को प्रेम करते हैं। उसको समृद्ध देखना चाहते हैं। उन बुद्धिजीवियों के लिए भी चिंतन का विषय है, जो राष्ट्र को अमन चैन के साथ आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। हमारे देश की सीमाओं पर जो भी तनाव है, उससे कहीं ज्यादा तनाव देश के भीतर है। जिन लोगों को देश के भूगोल का नहीं पता, जो नक्शे में कुछ चिन्हित करने का भी ज्ञान नहीं रखते, वे भी विशेषज्ञों की तरह आक्रामक टिप्पणी कर रहे हैं।हम आपसे यह चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पिछले कुछ वक्त से देश के भीतर और सीमाओं पर जो घट रहा है, वह दुखद है। कभी युद्ध का माहौल बनने लगता है तो कभी बेवजह का शोर सुनाई देता है। सोशल मीडिया हो या परंपरागत दोनों ही संयम के साथ तथ्यों को प्रस्तुत करने के बजाय तनाव परोस रहे हैं। मनबढ़ लोग और मीडियाकर्मी आगे दिखने की होड़ में कुछ भी कहते और करते नजर आ रहे हैं। सैन्य बलों के वे रिटायर्ड अफसर जो अपने कार्यकाल में कोई बड़ा काम नहीं कर पाए, मीडिया के माध्यम से बम-गोली बरसाने लगते हैं। वे भूल जाते हैं, जब युद्ध के हालात बनने पर वे अपने परिवार और मित्रों को बार-बार संपर्क करने की कोशिश करते थे। वे यह भी भूल जाते हैं कि युद्ध में कोई भी देश हारे या जीते मगर विधवा जवान की बीवी होती है। भाई-बहन अपने भाई खोते हैं और मां-बाप अपना बेटा। कोई मित्र खोता है तो देश अपना लाड़ला सपूत। देशवासी अमन-चैन खो देते हैं और व्यवस्था अपनी गति। देश सालों पीछे चला जाता है। आर्थिक हानि का बोझ आमजन के कंधे पर आ पड़ता है। इन हालात में भी जो ऐश करते हैं, वे सत्ता और राजनीति पर काबिज लोग होते हैं। बड़े व्यापारिक घरानों के लोग होते हैं। वे अपने बच्चों को फौज में नहीं भेजते और न ही उन्हें जरूरत है। मरते आमजन और उनके बच्चे हैं। 14 फरवरी को कश्मीर के पुलवामा में जो दुखद आतंकी घटना हुई, उसमें हमारी बड़ी चूक थी। हमारे देश के सुरक्षा बजट का बड़ा हिस्सा खुफिया सूचनाओं पर खर्च होता है। हम कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का दावा करते हैं मगर एक 19 साल के युवक ने यह दुखद घटना अंजाम दे दी। हमने अपने 40 जांबाज खो दिए। हमारे हुक्मरां अपने सियासी दांव पेंच में लग गए। चंद मिनटों में ही अपनी नाकामी पाकिस्तान की साजिश बताकर बात खत्म कर दी गई। निश्चित रूप से पाकिस्तान का यह कसूर है कि वह लंबे समय से अपने अधीन कश्मीरी हिस्से में आतंकी तैयार करने में मदद करता रहा है। उसने जब 2016 के नए साल के जश्न के माहौल में पठानकोट के सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया और तीन दिनों तक कब्जा किए रहा, तब हम माकूल जवाब नहीं दे सके। उसने जब उड़ी में हमला किया, तब भी हम सुस्त रहे। अब जब 40 सीआरपीएफ जवानों को कश्मीरी युवक के जरिए मार डाला गया तो हमने अपनी खामियों पर बात भी नहीं की। जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि हमें सुबूत दीजिए, हम कार्रवाई करेंगे, तब हमारे नेताओं ने अहम दिखाया। हमारी वायु सेना ने बालकोट में बम गिराया तो पाकिस्तान ने भी हमारा एक विमान मार गिराया। इसी समय एक अन्य हेलिकॉप्टर कै्रश में छह जवान शहीद हो गए। हमारे विंग कमांडर अभिनंदन को पाक सेना ने गिरफ्तार कर लिया। वैश्विक मंच पर हीरो बनने के लिए इमरान खान ने पाकिस्तानी संसद में कहा कि वह शांति चाहते हैं। उन्होंने पहल नहीं की, बल्कि मजबूरन प्रतिरोध में कार्रवाई की। वह पायलटअभिनंदन को छोड़ रहे हैं। वह हर विषय पर बातचीत को तैयार हैं। इमरान ने कहा प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के पहले 26 जुलाई और बाद में भी भारत से सभी मुद्दों पर बात की पहल की, मगर भारत के सियासतदां नहीं माने। भारत के पास इसका कोई माकूल जवाब नहीं है।हमें सोचना होगा कि ऐसा क्यों और कैसे हुआ? भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के साथ ही दोनों के हितों का टकराव रहा है। दोनों के बीच 1971 में हुए आखिरी युद्ध में हमारी सेनाओं ने पाकिस्तान को दो टुकड़े कर उसकी रीढ़ तोड़ दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गिरफ्तार किए गए करीब 92 हजार पाक सैनिकों को रिहा करते हुए, वैश्विक मंच पर यही कहा था कि पाक हमें उकसाता है, न कि हम उस पर हमला करते हैं। उसके बाद से अब तक पाकिस्तान हमसे युद्ध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया मगर छद्म युद्ध करता रहता है। हम उसके इस छद्म युद्ध का जवाब भी देते हैं। समस्या यह थी कि पाकिस्तान हमसे सभी मुद्दों पर बात नहीं करना चाहता था। जब से इमरान खान प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने हर बार बात करने का प्रस्ताव किया मगर हमारे हुक्मरां राजी नहीं हुए। विश्व का इतिहास गवाह है कि अब तक किसी भी युद्ध के नतीजे अच्छे नहीं रहे हैं। जंग में जनहानि के साथ ही इतने नुकसान होते हैं कि उनकी भरपाई करना संभव नहीं होता। हमें गांधीवादी तरीका अपनाना होगा। हम बातचीत का माहौल बनाएं। समस्याओं को हल करने के लिए मुद्दों पर बात करें। विंग कमांडर अभिनंदन को दबाव में ही सही मगर वक्त पर बगैर नुकसान छोड़कर अगर इमरान खान ने बड़ा दिल दिखाया है तो हमें भी उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए। उन्होंने अगर करतारपुर कारीडोर बनाने की पहल की तो हमें भी कम से कम कृतज्ञता दिखानी चाहिए थी मगर हमारी तरफ से ऐसा नहीं हुआ। युद्धोन्मादी बातें करने वाले यह नहीं जानते कि अगर पाकिस्तान का 50 फीसदी नुकसान होगा तो हमारा भी कम से कम 25 फीसदी नुकसान होगा। हम भी अपने जवान खोएंगे। हम विकास की राह पर आगे दौड़ने की बजाय पीछे भागेंगे। भारत-पाक के बीच अगर युद्ध होगा, तो वह सामान्य युद्ध नहीं रहेगा क्योंकि हमारी भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि हम किसी भी पड़ोसी पर यकीन नहीं कर सकते। चीन, अमेरिका, रूस जैसे देश तटस्थ नहीं रह सकते। हथियार बेचने वाले देश युद्ध को बढ़ावा देंगे। नुकसान हमारे देश को सबसे ज्यादा होगा। ऐसे में जरूरत है कि हम कृतज्ञता प्रकट करते हुए वैश्विक मंच पर खुले दिल से बात करें। उपजी समस्याओं का स्थाई समाधान कर आगे बढ़ें। अमन-चैन होता है तभी समृद्धि आती है। यह भारत के विपक्ष की सकारात्मक राष्ट्रीय पहल का लाभ उठाने का वक्त है। जय हिंद।

जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

‘भगवान’ मत बनिये मि. सुप्रीम कोर्ट, न्याय कीजिए

पल्स,, Ajay Shukla 
‘भगवान’ मत बनिये मि. सुप्रीम कोर्ट, न्याय कीजिए

विकास हो या नियम, दोनों के नाम पर होने वाले अन्याय और अत्याचार लोगों को व्यवस्था भंग करने के लिए मजबूर करते हैं। देश में पनपे नक्सली आंदोलन और आतंकवाद की जड़ को जब हम खंगालते हैं, तो यह बात सामने आती है। व्यवस्था और नियमों के नाम पर जब हमने आदिवासियों-गरीबों के जीवन से खिलवाड़ किया तब वे हिंसक हुए। आतंकवाद के मूल में वे घटनाएं हैं, जिनको लंबे वक्त तक पनपाया गया। उससे तंग होकर पीड़ितों ने हथियार उठाए। उनके बाद वाली पीढ़ी ने इसे ही अपनी नियति समझ लिया, क्योंकि अदालतों ने उनसे इंसाफ नहीं किया। जब तक इस रोग का समुचित उपचार नहीं होगा, कोई बड़ा नतीजा नहीं निकल सकता। हाल के दिनों में जो घटनाएं हुई हैं, वे सिर्फ चिंताजनक ही नहीं, भविष्य में खतरे के बढ़ने की ओर इशारा कर रही हैं। जरूरत अन्याय, अत्याचार और शोषण रोककर इंसाफ करने की है। दुख तब होता है, जब इस काम को न सरकारें सही तरीके से करती हैं और न हमारी अदालतें। दोनों संस्थाओं में समाज की आखिरी पंक्ति के लोगों के लिए कुछ नहीं है। साधन संपन्नों और कारपोरेट को खुश करने के लिए वह किया जा रहा है, जिसको रोकना ही इनकी जिम्मेदारी है।
आप सोचेंगे कि हम इस तरह की चर्चा क्यों कर रहे हैं, तो बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने एक एनजीओ (जो कथित रूप से जल जंगल की रक्षा करना चाहता है) ने जनहित याचिका के जरिए मांग की कि लंबे समय से जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के कब्जे से जंगल को मुक्त कराया जाए। उसने इसके लिए वन अधिनियम का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को अनुसूचित जनजाति एवं परंपरागत वन निवास (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 के तहत जंगलों में रहने वाले 11 लाख आदिवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया। जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस अरुण सिन्हा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की पीठ ने लिखित आदेश 20 फरवरी को जारी किया, जिसमें राज्य सरकारों को उन आदिवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया है जिनके दावे खारिज कर दिए गए हैं। याचिका में एनजीओ ने मांग की थी कि उन सभी आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर दिया जाए, जिनके पारंपरिक वनभूमि पर दावे वन अधिकार कानून के तहत खारिज हो जाते हैं। मोदी सरकार को आदिवासियों के हित और अपने कानून के समर्थन में पैरवी करनी थी, जो उसने नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वत: इस पर कोई भी कदम उठाने के बजाय देश के 20 राज्यों के जंगलों में रहने वाले 11 लाख से अधिक लोगों को वहां से बेदखल करने का आदेश पारित कर दिया। पीड़ित आदिवासियों का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट लाखों जंगलवासियों को बेदखल करने का आदेश देते वक्त यह भूल गया कि वह भी संविधान के तहत मिली शक्तियों से युक्त न्याय के नाम पर अभिजात्य होने का लुत्फ उठा रहा है। कोई भी कानून, संविधान की मूल अवधारणा और मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने विधाता बनकर फैसला सुना दिया। वे यह भी भूल गए कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को जीवन का अधिकार है। नागरिकों को उनके मूल अधिकार से वंचित करने की शक्ति किसी में नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस माकंर्डेय काटजू ने कहा कि मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बेहद दुखी हूं। 11 लाख आदिवासियों को जंगलों से भी भगाया जा रहा है। वे अब कहां जाएंगे? क्या उन्हें समुद्र में फेंक दिया जाएगा या गैस चैंबर में डाल दिया जाएगा? क्या वन अधिनियम, संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार के अनुच्छेद 21 के ऊपर है? काटजू कहते हैं कि जज साहबान आर्टिकल 21 क्यों भूल गए, जिसमें संविधान हम सभी को जीने का अधिकार देता है? जस्टिस काटजू के सवाल और गुस्सा बेवजह नहीं है। देशवासी जानते हैं कि कारपोरेट अपने फायदे के लिए कुछ भी करता है। तमाम एनजीओ उसके इशारे पर काम करते हैं। माना जाता है कि इस वक्त सरकारें भी कारपोरेट घराने चला रहे हैं। जो सदैव से जल, जमीन और जंगल पर काबिज होना चाहते हैं।
समस्या यहीं है। हाल के दिनों में पुलवामा में दर्दनाक हादसा हुआ। सरकार कहती है कि एक स्थानीय युवक आतंकी संगठनों का टूल बन गया। उसने आरडीएक्स से लदी कार को सुरक्षा बल की बस में टकरा दी। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि कश्मीर का हर तीसरा युवा बागी हो रहा है? उसके मन में भारत के शेष लोगों के प्रति गुस्सा क्यों है? यह एक दिन की कहानी नहीं है। इसका कारण लंबे वक्त तक सैन्य बलों और सरकार की वे नीतियां, कार्यकलाप हैं, जिन्होंने कश्मीरियों के जीवन में जहर बोया है। उनकी संपत्तियों पर कब्जे के लिए कारपोरेट ऐसे साजिशें रचता रहा है, जिससे उसे कश्मीर की अकूत प्राकृतिक संपदा पर मालिकाना हक मिले। संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण यह नहीं हो पाया। 1990 में जनता दल सरकार के दौरान उन कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर भगा दिया गया जो कश्मीरियत का मूल थे। आस्थिर सरकारों और कश्मीरी अलगाववाद के समर्थक मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृह मंत्री बनने से हालात और बिगड़े। नरसिम्हां राव सरकार में इसे संभालने के नाम पर कारपोरेट को कश्मीर में प्रवेश देने की शुरूआत हुई, जो अब तक जारी है। मालिकाना हक न होने के कारण कारपोरेट को दिक्कत है। जिससे सरकार अनुच्छेद 370 खत्म करने के लिए जनमत बनाने में लगी है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कश्मीर में सरकार ने कुछ ऐसा नहीं किया कि कश्मीरियों में भारतीय होने का गर्व पैदा हो। न ही कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने की कार्ययोजना पर काम किया गया।
यह देखने में आ रहा है कि न्यायपालिका मूल कार्यों से अधिक कार्यपालिका के कार्यों में रुचि ले रही है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने संवैधानिक दायित्वों और सीमाओं में काम करने के बजाय शक्ति केंद्र बनने के लिए काम करता दिखता है। नतीजतन वह मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अपने निजी हितों को साधने में लगे हैं। सरकारें और कारपोरेट मिलकर उसे संचालित करते दिखते हैं। सियासी दलों की महात्वाकांक्षाओं की पूर्ति में न्यायपालिका अहम भूमिका निभाने लगी है। यह चिंता का विषय है। शायद तभी अब लोगों के दिलों से न्यायपालिका के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों को इस दिशा में गंभीर चिंतन करना होगा, नहीं तो वे भी दूसरी संस्थाओं की तरह बेइज्जत होते दिखेंगे।
जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक

मर्ज के कारगर इलाज की जरूरत

PULSE...Ajay Shukla 
मर्ज के कारगर इलाज की जरूरत
सीआरपीएफ काफिले पर पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में हमने अपने 40 जवान खो दिए। हमारे देश की सीमाओं के साथ ही आंतरिक सुरक्षा में सबसे बड़ी भूमिका अर्ध सैन्य बलों की है। यह अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला है, जिसमें हमने एक साथ इतनी अधिक संख्या में अपने जवान खोये हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि आतंकियों ने इतना बड़ा फिदायीन हमला किया। हम जब इस सवाल के जवाब को खोजते हैं तब जो उत्तर सामने आता है, वो और भी दुखद है। पिछले दिनों हमारे सियासी लोगों ने राजनीतिक लाभ के लिए जिस तरह से कश्मीर में आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने के दावे और प्रचार किए, उन्होंने आतंकियों को भड़काने का काम किया। हमारी खुफिया एजेंसियों को इसकी सूचना मिली मगर वो लाचार थे, क्योंकि सरकार के खिलाफ बोलने की इजाजत नहीं होती। सियासी समर्थकों ने सोशल मीडिया पर अपने दल के महिमा मंडन में उसको भुनाने की कोशिश की। इससे भड़के आतंकी संगठनों ने हमला करने की साजिश रची। इस साजिश की भी सूचना 10 दिन पहले पहुंच चुकी थी मगर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया। आतंक के खिलाफ लड़ाई जरूरी है। आतंकियों का मनोबल तोड़ने के काम भी किए जाने आवश्यक हैं मगर उनके सियासी फायदे की सोच सदैव संकटकारक होती है।
इस विषय पर चर्चा से पहले कश्मीर के इतिहास पर गौर करना जरूरी है। कश्मीरियत ऋषि परंपरा के त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम है। यहां की संस्कृति में कट्टरता का कोई स्थान नहीं था। 1589 में यहां मुगल शासन स्थापित हुआ और फिर 1814 में राजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को सिख शासन का हिस्सा बना लिया। 1846 में कश्मीर ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा हो गया। अंग्रेजों ने गुलाब सिंह को यहां का राजा बनाकर स्वतंत्र सत्ता सौंप दी। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत कश्मीर को मित्र राज्य की तरह शामिल करने का प्रस्ताव पारित हुआ। राजा हरि सिंह ने लगातार पठानों के संघर्ष से जूझते हुए कश्मीर को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारतीय संघ में शामिल होने का प्रस्ताव किया, जिसे लार्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर 1947 को मंजूरी दे दी। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पठानों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना कश्मीर भेजी। जनवरी 1948 में कश्मीर विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ पहुंचा तो भारत ने वचन दिया कि वह भारतीय संघ में विलय के लिए जनमत कराएगा, जो नहीं हुआ। नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनवाकर दावा किया कि कश्मीर का जनमत भारत के पक्ष में है। संयुक्त राष्ट्र आयोग ने अगस्त 1948 में विवाद खत्म होने की रिपोर्ट पारित की। 1950 में शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के भारत में विलय का प्रस्ताव को पास किया। पाकिस्तान के उकसाने के बाद भी आवाम शेख के साथ थी जिससे शांति बरकरार रही। 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने पठानों से सख्ती से निपटाने की कोशिश की तब कश्मीरी बंट गए और पाकिस्तान की साजिश सफल हुई। ताशकंद समझौते से पनपी बीमारी ने हमारे देश का जान-माल के साथ ही बहुत नुकसान किया है।
कश्मीर एक ऐसी बीमारी बन गया है, जिसका इलाज कभी बंदूक और बारूद नहीं हो सकता है। इसके लिए हमें गांधीवादी तरीका अपनाना होगा। कश्मीरी पंडित पहले ही दरबदर हो चुके हैं और मौजूदा आवाम भारत को अपना नहीं मानती। आवश्यकता यह है कि उनके साथ समस्याओं पर चर्चा हो। उनके समाधान निकाले जाएं। वहां रोजगार के अच्छे अवसर उपलब्ध कराने के साथ ही ज्यादती का शिकार हुए परिवारों को मुख्य धारा से जोड़ा जाए। जो कश्मीर हमारे कब्जे में है, उसको सुलभ बनाया जाए, फिर जो हिस्सा हमसे निकल गया है उस पर ध्यान दिया जाए। सामुदायिक कार्यक्रम चलाकर देश के विभिन्न हिस्सों से इसे जोड़ा जाए। सख्त निगरानी के साथ ही सुरक्षा कार्यकलापों की पारदर्शी समीक्षा की जाए। समस्या यह है कि हमारी सरकारें बातचीत के लिए कुछ लोगों को भेजकर इतिश्री कर लेती हैं, जो कभी समाधान नहीं निकाल पाए। वहां की आवाम को मुख्यधारा में जोड़े बिना किसी बड़ी उम्मीद की आस लगाना बेमानी है।
गुरुवार को पुलवामा में जो हुआ उसके लिए हमारी सियासत जिम्मेदार है। पहले अलगाववादी सोच रखने वाले दल के साथ सत्ता सुख हासिल किया और फिरकापस्तों को पनपने का मौका दिया। जब पानी सिर के ऊपर निकल गया तब वह कदम उठाया जो पहले करना चाहिए था। राष्ट्रपति शासन लगने के बाद फिरकापरस्तों से निपटने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ाए गए मगर आवाम को विश्वास में लेने की कोशिश नहीं की गई। सियासी फायदे के लिए बढ़-चढ़कर बयानबाजी की गई। यही बयानबाजी आग में घी का काम कर गई। नतीजतन हताशा का शिकार आतंकी संगठनों ने सत्ता को चुनौती देने के लिए बड़ी घटना करने की तैयारी की। जिसकी खबर खुफिया एजेंसीज ने समय रहते सरकार को दी। सरकार ने खुफिया तथ्यों पर गंभीरता से काम नहीं किया गया और देश को अपने 40 जवान खोने पड़े। हमारे सामने 1959 का उदाहरण है जब पंडित नेहरू ने बड़े सलीके से कश्मीर में भारतीय सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग बाध्यकारी बनवा लिया था क्योंकि आवाम विश्वास में था। 1963 में भी हजरतबल में हुई घटना को संभाल लिया गया था मगर 1965 में पाकिस्तानी घुसपैठ करने में कारगर रहे। यही स्थिति आज भी बन रही है। हमें जरूरत यह है कि हम तीन मोर्चों पर काम करें। पहला घुसपैठ रोकें, दूसरा आंतरिक सुरक्षा चौकसी पारदर्शी और मजबूत बनाएं। तीसरा स्थानीय नागरिकों से खुली चर्चा शुरू करें। उनकी समस्याओं के समाधान निकालें। उनके बीच सामुदायिक भावना उत्पन्न करें।
देश के सभी सियासी दलों को खुले दिल से कश्मीर में शांति बहाली और विश्वास के लिए काम करने की जरूरत है। जिस दिन कश्मीरियों में भारतीय और सरकार के प्रति विश्वास कायम होगा पाकिस्तानी साजिशें कभी सफल नहीं हो पाएंगी। पाकिस्तान के साथ सख्ती से इस विषय पर निपटें और वैश्विक मंच पर भारतीय पक्ष को स्पष्ट करें। सियासी फायदे के लिए सेना या अर्धसैन्य बलों का इस्तेमाल करने के बजाय शांति बहाली के सार्थक उपाय करें। पारदर्शी न्याय प्रणाली और कानून व्यवस्था जब तक कायम नहीं होगी, तब तक हम न कश्मीर समस्या का समाधान नहीं निकाल पाएंगे और हमारे जवान मरते रहेंगे। विश्व का इतिहास बताता है कि कभी, कहीं भी बंदूक से शांति स्थापित नहीं हुई है। जहां भी इसका इस्तेमाल हुआ, वहां आस्थायी शांति ही मिली और बाद में बद से बदतर हालात हुए हैं। देश को कश्मीर के स्थाई इलाज की दरकार है क्योंकि हम बजट और सेना एवं अर्धसैन्य बल का बड़ा हिस्सा यहां स्वाहा कर रहे हैं फिर भी नतीजा सिफर है। खुले दिल दिमाग से देश के लिए सोचिये और करिये।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

मर्ज के कारगर इलाज की जरूरत

मर्ज के कारगर इलाज की जरूरत
सीआरपीएफ काफिले पर पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में हमने अपने 40 जवान खो दिए। हमारे देश की सीमाओं के साथ ही आंतरिक सुरक्षा में सबसे बड़ी भूमिका अर्ध सैन्य बलों की है। यह अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला है, जिसमें हमने एक साथ इतनी अधिक संख्या में अपने जवान खोये हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि आतंकियों ने इतना बड़ा फिदायीन हमला किया। हम जब इस सवाल के जवाब को खोजते हैं तब जो उत्तर सामने आता है, वो और भी दुखद है। पिछले दिनों हमारे सियासी लोगों ने राजनीतिक लाभ के लिए जिस तरह से कश्मीर में आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने के दावे और प्रचार किए, उन्होंने आतंकियों को भड़काने का काम किया। हमारी खुफिया एजेंसियों को इसकी सूचना मिली मगर वो लाचार थे, क्योंकि सरकार के खिलाफ बोलने की इजाजत नहीं होती। सियासी समर्थकों ने सोशल मीडिया पर अपने दल के महिमा मंडन में उसको भुनाने की कोशिश की। इससे भड़के आतंकी संगठनों ने हमला करने की साजिश रची। इस साजिश की भी सूचना 10 दिन पहले पहुंच चुकी थी मगर कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया। आतंक के खिलाफ लड़ाई जरूरी है। आतंकियों का मनोबल तोड़ने के काम भी किए जाने आवश्यक हैं मगर उनके सियासी फायदे की सोच सदैव संकटकारक होती है।
इस विषय पर चर्चा से पहले कश्मीर के इतिहास पर गौर करना जरूरी है। कश्मीरियत ऋषि परंपरा के त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम है। यहां की संस्कृति में कट्टरता का कोई स्थान नहीं था। 1589 में यहां मुगल शासन स्थापित हुआ और फिर 1814 में राजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को सिख शासन का हिस्सा बना लिया। 1846 में कश्मीर ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा हो गया। अंग्रेजों ने गुलाब सिंह को यहां का राजा बनाकर स्वतंत्र सत्ता सौंप दी। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत कश्मीर को मित्र राज्य की तरह शामिल करने का प्रस्ताव पारित हुआ। राजा हरि सिंह ने लगातार पठानों के संघर्ष से जूझते हुए कश्मीर को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत भारतीय संघ में शामिल होने का प्रस्ताव किया, जिसे लार्ड माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर 1947 को मंजूरी दे दी। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पठानों को खदेड़ने के लिए भारतीय सेना कश्मीर भेजी। जनवरी 1948 में कश्मीर विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ पहुंचा तो भारत ने वचन दिया कि वह भारतीय संघ में विलय के लिए जनमत कराएगा, जो नहीं हुआ। नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनवाकर दावा किया कि कश्मीर का जनमत भारत के पक्ष में है। संयुक्त राष्ट्र आयोग ने अगस्त 1948 में विवाद खत्म होने की रिपोर्ट पारित की। 1950 में शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर के भारत में विलय का प्रस्ताव को पास किया। पाकिस्तान के उकसाने के बाद भी आवाम शेख के साथ थी जिससे शांति बरकरार रही। 1965 में लाल बहादुर शास्त्री ने पठानों से सख्ती से निपटाने की कोशिश की तब कश्मीरी बंट गए और पाकिस्तान की साजिश सफल हुई। ताशकंद समझौते से पनपी बीमारी ने हमारे देश का जान-माल के साथ ही बहुत नुकसान किया है।
कश्मीर एक ऐसी बीमारी बन गया है, जिसका इलाज कभी बंदूक और बारूद नहीं हो सकता है। इसके लिए हमें गांधीवादी तरीका अपनाना होगा। कश्मीरी पंडित पहले ही दरबदर हो चुके हैं और मौजूदा आवाम भारत को अपना नहीं मानती। आवश्यकता यह है कि उनके साथ समस्याओं पर चर्चा हो। उनके समाधान निकाले जाएं। वहां रोजगार के अच्छे अवसर उपलब्ध कराने के साथ ही ज्यादती का शिकार हुए परिवारों को मुख्य धारा से जोड़ा जाए। जो कश्मीर हमारे कब्जे में है, उसको सुलभ बनाया जाए, फिर जो हिस्सा हमसे निकल गया है उस पर ध्यान दिया जाए। सामुदायिक कार्यक्रम चलाकर देश के विभिन्न हिस्सों से इसे जोड़ा जाए। सख्त निगरानी के साथ ही सुरक्षा कार्यकलापों की पारदर्शी समीक्षा की जाए। समस्या यह है कि हमारी सरकारें बातचीत के लिए कुछ लोगों को भेजकर इतिश्री कर लेती हैं, जो कभी समाधान नहीं निकाल पाए। वहां की आवाम को मुख्यधारा में जोड़े बिना किसी बड़ी उम्मीद की आस लगाना बेमानी है।
गुरुवार को पुलवामा में जो हुआ उसके लिए हमारी सियासत जिम्मेदार है। पहले अलगाववादी सोच रखने वाले दल के साथ सत्ता सुख हासिल किया और फिरकापस्तों को पनपने का मौका दिया। जब पानी सिर के ऊपर निकल गया तब वह कदम उठाया जो पहले करना चाहिए था। राष्ट्रपति शासन लगने के बाद फिरकापरस्तों से निपटने के लिए सही दिशा में कदम बढ़ाए गए मगर आवाम को विश्वास में लेने की कोशिश नहीं की गई। सियासी फायदे के लिए बढ़-चढ़कर बयानबाजी की गई। यही बयानबाजी आग में घी का काम कर गई। नतीजतन हताशा का शिकार आतंकी संगठनों ने सत्ता को चुनौती देने के लिए बड़ी घटना करने की तैयारी की। जिसकी खबर खुफिया एजेंसीज ने समय रहते सरकार को दी। सरकार ने खुफिया तथ्यों पर गंभीरता से काम नहीं किया गया और देश को अपने 40 जवान खोने पड़े। हमारे सामने 1959 का उदाहरण है जब पंडित नेहरू ने बड़े सलीके से कश्मीर में भारतीय सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग बाध्यकारी बनवा लिया था क्योंकि आवाम विश्वास में था। 1963 में भी हजरतबल में हुई घटना को संभाल लिया गया था मगर 1965 में पाकिस्तानी घुसपैठ करने में कारगर रहे। यही स्थिति आज भी बन रही है। हमें जरूरत यह है कि हम तीन मोर्चों पर काम करें। पहला घुसपैठ रोकें, दूसरा आंतरिक सुरक्षा चौकसी पारदर्शी और मजबूत बनाएं। तीसरा स्थानीय नागरिकों से खुली चर्चा शुरू करें। उनकी समस्याओं के समाधान निकालें। उनके बीच सामुदायिक भावना उत्पन्न करें।
देश के सभी सियासी दलों को खुले दिल से कश्मीर में शांति बहाली और विश्वास के लिए काम करने की जरूरत है। जिस दिन कश्मीरियों में भारतीय और सरकार के प्रति विश्वास कायम होगा पाकिस्तानी साजिशें कभी सफल नहीं हो पाएंगी। पाकिस्तान के साथ सख्ती से इस विषय पर निपटें और वैश्विक मंच पर भारतीय पक्ष को स्पष्ट करें। सियासी फायदे के लिए सेना या अर्धसैन्य बलों का इस्तेमाल करने के बजाय शांति बहाली के सार्थक उपाय करें। पारदर्शी न्याय प्रणाली और कानून व्यवस्था जब तक कायम नहीं होगी, तब तक हम न कश्मीर समस्या का समाधान नहीं निकाल पाएंगे और हमारे जवान मरते रहेंगे। विश्व का इतिहास बताता है कि कभी, कहीं भी बंदूक से शांति स्थापित नहीं हुई है। जहां भी इसका इस्तेमाल हुआ, वहां आस्थायी शांति ही मिली और बाद में बद से बदतर हालात हुए हैं। देश को कश्मीर के स्थाई इलाज की दरकार है क्योंकि हम बजट और सेना एवं अर्धसैन्य बल का बड़ा हिस्सा यहां स्वाहा कर रहे हैं फिर भी नतीजा सिफर है। खुले दिल दिमाग से देश के लिए सोचिये और करिये।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

भ्रष्ट आचरण को न्यायोचित मत ठहराइये

PULSE... 
भ्रष्ट आचरण को न्यायोचित मत ठहराइये
ऋषि शुक्ल को सबसे अहम जांच एजेंसी सीबीआई के मुखिया का पद संभालने के साथ ही उसकी साख बचाने की गंभीर चुनौती भी मिली है। इन दिनों जिसकी साख शून्य हो चुकी है। पहली बार यह बात देश की सर्वोच्च अदालत में गूंजी कि निदेशक भ्रष्ट है या सेकेंड मैन? सीबीआई निदेशक ने अदालत में माना कि सीबीआई भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। देश और सरकार के लिए इससे अधिक शर्मनाक स्थिति कोई अन्य नहीं हो सकती। सीबीआई को देश के अहम मामलों की जांच करने और उसका दायरा पूरे देश तक बढ़ाने के 1963 के शासनादेश का आशय यही था कि भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म किया जाए मगर हो उलट रहा है। हमें इसकी जड़ तक जाना होगा। भ्रष्टाचार न तो सीबीआई ने फैलाया है और न ही सरकार ने। आचरण से ईमानदारी और भ्रष्टाचार आता है। जब देशवासियों ने भ्रष्टाचार को जीवन का अंग बना लिया, तो कोई सियासी दल हो या उसका नेता, सरकार हो या संस्थाएं सभी का पीड़ित होना स्वाभाविक है। हमें भ्रष्टाचार से अधिक भ्रष्ट आचरण का उपचार करने की जरूरत है। उसके खिलाफ आवाज बुलंद करने की जरूरत है।
देश सीबीआई को एक प्रतिष्ठित जांच एजेंसी मानता है हालांकि उसका कोई संवैधानिक अस्तित्व नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत के जिस दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 के तहत 1963 में एक शासनादेश जारी कर सीबीआई बनाई गई, उसपर तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर तक नहीं हैं। सीबीआई पर सदैव यह आरोप रहा है कि वह गणतंत्र के ढांचे के विरुद्ध है। सत्तारूढ़ दल अपने विरोधियों को दबाने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं। इसी तरह इन्फोर्समेंट डायरेक्ट्रेट पर भी दुरुपयोग के आरोप लग रहे हैं। इन संस्थाओं पर यह भी आरोप हैं कि उन्हें सत्तारूढ़ जनों के भ्रष्टाचार नजर नहीं आते। सीबीआई ने जिस तरह से कोलकाता में प्रपोगंडा किया वह दुखद है। सीबीआई ने दावा किया कि कोलकाता पुलिस आयुक्त को जांच में मदद के लिए नोटिस भेजे गए, मगर सच्चाई यह है कि जो नोटिस 30 नवंबर को भेजा, उसमें 6 नवंबर को जांच में शामिल होने को कहा गया। जो नोटिस 12 दिसंबर को भेजा उसमें 10 दिसंबर को पेश होने को कहा गया। पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के घर सीबीआई 40 लोगों के साथ ऐसे घुसती है जैसे वह कोई अपराधी हो। विरोध हुआ, तो ड्रामा शुरू हो गया। विचारक शेखर गुप्ता मानते हैं कि सीबीआई ने अपनी विश्वसनीयता शून्य कर ली है।
कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि जब कोई व्यक्ति या पदाधिकारी किसी विरोधी खेमे में होता है, तब हम उसे भ्रष्ट, झूठा, बेईमान जैसी तमाम संज्ञाएं देते हैं मगर जब वह हमारे पाले में आ जाता है, तो उसके अपराधों को न्यायोचित सिद्ध करने लगते हैं। हमारी यही सोच हमें भ्रष्ट और भ्रष्टाचार का पोषक बनाती है। इसकी परिणिति यह है कि भ्रष्टाचार निरोध के लिए जिम्मेदार भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो रहे हैं। वो मानते हैं कि भ्रष्ट आचरण से कुछ अधिक कमा लेंगे और सत्ता पर काबिज दलों को अनुग्रहित करके, न केवल बच निकलेंगे बल्कि सम्मान भी खरीद लेंगे। इसी सोच ने सीबीआई की साख पर बट्टा लगाने के साथ ही संवैधानिक व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया है। इस अपराध में कोई एक दोषी नहीं है बल्कि वो सभी हैं, जो भ्रष्टाचार करते, समर्थन और संरक्षण देते हैं।
हम अपने कुछ बुद्धिजीवी मित्रों के साथ, जिनमें कुछ सरकारी अफसर भी शामिल थे, दिल्ली में चर्चा कर रहे थे। एक मित्र ने मंत्रालय की एक फाइल दिखाई कि कैसे इन कागजों का प्रयोग विरोधी दलों को घेरने के लिए किया गया था। जब आरोपी नेता सत्ताधारी दल के समर्थन में आ गया तो न केवल उसे संरक्षण दिया गया बल्कि फाइल को रद्दी में डाल दिया गया। भ्रष्ट आचरण में शामिल वह नेता अब अपने पुराने दल के नेताओं को ही आरोपित करता है। सीबीआई के एक सेवानिवृत्त निदेशक और सुप्रीम कोर्ट के जज ने चर्चा के दौरान कई ऐसे वृत्तांत बताये, जो चौकाने वाले हैं। उन्हें देश के सामने लाना चाहिए मगर समस्या नेताओं के तथाकथित उन समर्थकों से है, जो न सच सुनना चाहते हैं और न देखना। शायद अपने नेताओं के पाप का बचाव करना उनका नैतिक धर्म बन चुका है। यह सोच किसी भी लोकतांत्रिक देश के पतन के लिए पर्याप्त है। इसके लिए हम किसी नेता या दल को दोषी नहीं ठहरा सकते क्योंकि भ्रष्ट सोच उनके समर्थकों के कारण विकसित होती है। हाल यह है कि अब सच पर चर्चा के बजाय धमकाने और निजी हमले करने की परंपरा शुरू हो चुकी है।
समस्या यह भी है कि हम सच बोलें-लिखें या उस भीड़ का हिस्सा हो जायें, जो चाटुकारिता के चलते झूठ, लूट और नफरत फैलाने वालों का साथ देती है। देश के नामचीन वकील प्रशांत भूषण 2014 तक कुछ दलों को मुफीद थे। उनकी विद्वत्ता और ईमानदार कोशिशों से तत्कालीन सत्ता को चुनौती दी जाती थी। प्रशांत के पिता ने भी लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ी थी। अब सच की वकालत करने पर उनके मुंह पर कालिख फेंकी जाती है। अवमानना की कार्यवाही की जाती है, क्योंकि वह मौजूदा सत्ता के लिए मुफीद नहीं। आश्चर्य होता है, जब चिट एंड फंड घोटाले में आरोपी मुकुल राय, हेमंत बिश्वा शर्मा सत्तारूढ़ दल का दामन थामकर विशुद्ध हो जाते हैं। केंद्रीय मंत्री का नाम इसी तरह के घोटाले में आता है मगर उनसे पूछताछ भी नहीं होती। फोन टैपिंग सामने आती है, जिसमें एक बड़ा नेता इस घोटाले का खुलासा करने वाले आईपीएस राजीव कुमार को रगड़ने की बात कहता है। नेता के समर्थक सच को नजरांदाज कर झूठ-लूट और नफरत का समर्थन करते हैं।
हम स्कूल के दिनों में दोस्तों के साथ चर्चा करते थे कि 21वीं सदी में पारदर्शी ईमानदार भारत होगा। 1990 की बात है 12वीं की परीक्षा पास कर हम यह मंथन कर रहे थे कि भविष्य में क्या करना है? हमारे कुछ मित्र दक्षिण भारत के इंजीनियरिंग कॉलेजों में भारी भरकम रकम देकर पढ़ने चले गए। हमारे पुलिस अफसर पिता ने अपने मित्र विजय चाचा से कर्ज लेकर हमें भी बैंगलूरू भेजने का मन बनाया, हमारी अंतरात्मा ने पिता को कर्जदार बनाने वाली पढ़ाई से रोक दिया। इतना धन खर्च करके भविष्य में हम ईमानदार रहेंगे, यह निश्चत नहीं था। हमारे पिता ने संस्कृति, संस्कार, ईमानदारी और साहस सिखाया था। हम वापस लौटे और सिविल सेवा के लिए तैयार होने लगे। परीक्षा दी और रैंक हासिल करने के बाद पत्रकारिता करने का फैसला किया, क्योंकि सच के साथ खड़े होने की ललक थी। पिताजी नाराज हुए मगर सोच को समर्थन किया। उन्होंने कहा पूरे ज्ञान से ईमानदारी, साहस और सौहार्द के साथ अपनी राह बनाओ, नहीं हारोगे। मुश्किलों का सामना करना मगर गलत राह न पकड़ना। उनकी इस सीख का नतीजा यह हुआ कि हमने अपने पिता की गलती पर खबर छापी। उनको बहुत दिनों तक संकट का सामना करना पड़ा था। कई लोगों ने हमें भला बुरा कहा मगर पिताजी ने मजबूती दी। हाल के दिनों में हमने ऐसा ही कुछ सच लिखा तो किसी ने हमसे कहा कि इसे हटा दो नहीं तो हमें तुमको हटाना पड़ेगा। हमने कहा जो आपकी मर्जी, वो करें। कल मरूं या आज फर्क नहीं पड़ता।
देश जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें जरूरत सियासी या निजी प्रतिबद्धता से अधिक साहस के साथ सच बोलने की है। किसी का समर्थन करने का अर्थ यह नहीं कि गलत-सही न देखें। गलत का साथ देकर देश से गद्दारी करने के बजाय सच को समझें, और बोलें। झूठ, लूट और नफरत फैलाने वालों का विरोध करें। गलत सदैव गलत होता है और सही सदैव सही। यही राष्ट्रभक्ति और प्रेम है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं

गुणवत्ता परक जीवन की दिशा में काम हो

गुणवत्ता परक जीवन की दिशा में काम हो
केंद्र की मोदी सरकार का आखिरी बजट संतुलित मगर चुनावी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि हर राजनीतिक दल चुनाव में लाभ लेने के लिए झूठे-सच्चे वादे करता है। बजट में घाटे को संतुलित रखते हुए मौजूदा 3.3 फीसदी के सापेक्ष घाटा 3.4 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान दिया गया है। बजट में जो लोकलुभावन घोषणाएं की गई हैं, उनसे भी वित्तीय संतुलन बिगड़ने का कोई खतरा नहीं है। छोटे किसानों, मजदूरों और मुलाजिमों के साथ ही महिलाओं को आकर्षित करने वाला बजट बना है। एक सच यह भी है कि इन रियायतों से किसी को भी बहुत फायदा नहीं मिलेगा, मगर बहुतायत वोटरों के चेहरे पर उम्मीद के भाव जरूर दिखने लगे हैं। यह एक कुशल रणनीति का परिचायक है। बजट का प्रस्ताव इस तरह से बना है कि ‘हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा’। इस परिपक्कता की परिणिति भी अच्छी रही और 24 घंटे तक बजट की रियायतें लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। कोई क्षेत्र को कुछ मिलने की बात कर रहा है, तो कोई आयकर सीमा में छूट को लेकर प्रफुल्लित है। किसी को खाते में रुपए आने का इंतजार है, तो किसी को कर्ज में रियायत का।
नरेंद्र मोदी सरकार की यह सफलता है कि उन्होंने अपने चार साल में पेश किए गए किसी भी बजट में कोई ऐसी रियायत नहीं दी मगर लोगों में निराशा नहीं थी। अच्छे दिनों के इतंजार में बैठे लोगों को आफत का सामना भी करना पड़ा। इन सब के बीच 2019 के अंतरिम बजट में यह उम्मीद की जा रही थी कि कुछ बड़ी घोषणाएं होंगी, हुर्इं भी। इन घोषणाओं से कुछ वर्ग विशेष को फायदा हुआ मगर जीवन की गुणवत्ता सुधारने जैसा कुछ नहीं मिला। बजट भी इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसे अग्रमि सरकार मोदी की ही होगी। जहां किसानों को ढांचागत सुधार की उम्मीद थी, उस दिशा में कुछ नहीं किया गया। सीमांत किसानों को साल में छह हजार रुपए देने जैसी खैराती व्यवस्था की गई। यह सच है कि देश के किसानों को मदद की दरकार है मगर भीख की नहीं। जरूरत यह थी कि किसानों की उपज को तैयार करने से लेकर बेचने तक की सुविधाएं उनके ग्राम पंचायतों के स्तर पर पहुंचाने की व्यवस्था की जाती, जो नहीं हुआ। उन्हें कर्ज में फंसे रहने और फिर कुछ खैरात देकर लुभाने जैसा काम किया गया है। किसान बीमा योजना अब तक कारपोरेट बीमा कंपनियों के फायदे का सौदा साबित हुई हैं, किसानों के नहीं। निश्चित रूप से पिछले पौने पांच सालों में सरकार ने तमाम सुधारों की दिशा में काम किया है मगर नतीजे अब तक नकारात्मकता के रहे हैं।
सरकार ने पिछले चार सालों में आयकर सीमा में रियायत देने का कोई प्रावधान नहीं किया गया था, जिसको एक बार में ही पांच लाख करके सियासी दांव खेला गया है। चुनावी साल में यह सौगात वोटबैंक में बदलने की कोशिश मात्र है। इस रियायत के साथ जो शर्तें लगी हैं, वो इसका उतना लाभ नहीं होने देंगी, जितना दिखाया जा रहा है। मध्यम वर्ग खुद को ठगा महसूस कर रहा है। वहीं सबसे बड़ी समस्या युवाओं के समक्ष खड़ी हुई है। उनको रोजगार कैसे मिले और जो रोजगार में हैं, वह कैसे बचा रहे, इसके बारे में कोई व्यवस्था नहीं होना दिशाहीन होते युवाओं के लिए संकटों के मकड़जाल में उलझाने वाला है। लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए कर्ज में रियायत की गई है मगर उनको जरूरत की सुविधाएं दिए जाने के बारे में बजट मौन है। इस वर्ग को कर्ज से अधिक सुविधाओं की जरूरत थी। सरकारी तंत्र के जाल से मुक्ति की आवश्यकता सबसे अधिक इन्हें ही थी, जिस पर काम नहीं किया गया। देश में सबसे अधिक रोजगार इसी क्षेत्र में मिलता है। रोजगार देने वालों को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी सरकार ने कुछ नहीं किया है। हर साल देश में 50 लाख से अधिक व्यवसायिक शिक्षा से युक्त युवा बेरोजगारों की लिस्ट में नाम दर्ज करा रहे हैं।
कौशल विकास को लेकर सरकार पिछले कई सालों से ढिंढोरा पीट रही है मगर चिंता का विषय यह है कि जो युवा कौशल से परिपूर्ण हो चुके हैं, उनके लिए रोजगार कहां है? करोड़ों नौकरियों का वादा सरकार करती रही है मगर उस दिशा में भी वह आगे नहीं बढ़ सकी। केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों में नौकरियों में कटौती करके बजट को संतुलित किया गया है। बीमार सरकारी उद्यमों को स्वस्थ बनाकर रोजगार देने की बातें भी हवा में रह गर्इं। निजी और कारपोरेट सेक्टर में शोषण का शिकार हो रहे युवाओं के लिए भी कोई सार्थक पहल नहीं की गई है। ग्रामीण कुटीर उद्योगों के लिए भी कोई व्यवस्था बजट में नहीं होने से निराशा हुई है। किसान को कृषि आय के साथ ग्रामीण उद्योगों की आय का सहारा मिले तो उन्हें किसी भी खैरात की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। मोदी सरकार ने सीधे तौर पर छह करोड़ मतदाताओं को ध्यान में रखकर आयकर और सीमांत किसानों को नकद छह हजार रुपए देने का प्रस्ताव किया है। हालांकि इसमें भी 30 फीसदी से अधिक किसान और करदाता फायदा नहीं ले पाएंगे। ध्यान से देखें, तो लगता है कि सरकार ने पिछले कुछ सालों में बहुत सी घोषणाएं चुनावी बजट के लिए रोक रखी थीं।
देश का नागरिक, उद्यमी और भविष्य जीएसटी, आयकर सहित अन्य तमाम तरह के करों के जाल में फंसा हुआ है। विश्व के किसी भी समर्थ देश से तुलना करें तो भारतीय किसी से कम टैक्स नहीं देते हैं। इतना अधिक टैक्स देने के बाद भी उसको सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं मिलती, जबकि हम कल्याणकारी राज्य होने का दम भरते हैं। मोदी सरकार से उम्मीद की जाती थी कि वह देश के नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा और युवाओं को रोजगार के सुयोग्य अवसर देकर जीवन की गुणवत्ता बढ़ाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी इसके वादे किए गए थे। इसके लिए 60 महीने का वक्त मोदी ने अपनी हर चुनावी सभा में मांगा था मगर क्या हुआ और क्या मिला, यह यक्ष प्रश्न है। सरकार ने अंतत: वोटबैंक बनाने की दिशा में ही फैसले लिए, जो इस बजट से स्पष्ट होता है। मोदी सरकार से व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव की उम्मीद की गई थी मगर वह नहीं हुआ। ईश्वर करे, मोदी सरकार एक बार फिर से सत्ता संभाले किंतु उसे याद रखना होगा कि वोटबैंक की नहीं जनहित की राजनीति ही इतिहास में स्वर्णिम पन्ना बनाती है। इस दिशा में सजगता से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं हुआ तो सत्ता बदलाव निरर्थक समझा जाएगा।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

फेक न्यूज : एजेंडा या चरित्रहनन की पत्रकारिता

पल्स : Ajay Shukla
फेक न्यूज : एजेंडा या चरित्रहनन की पत्रकारिता
इस वक्त “फेक न्यूज” पर चर्चा गर्म है। यह चर्चा निर्रथक नहीं है। चिंता का विषय है। तकनीक का विकास होने के साथ ही उसका दुरुपयोग भी होना स्वाभाविक है। फेक न्यूज का भी यह माध्यम बन रहा है। सोशल मीडिया की अपनी कोई जवाबदेही नहीं होने से कोई भी कुछ भी पोस्ट करता है। “शिक्षित टाइप के जाहिल” लोग सच जाने बगैर उसे फारवर्ड करते हैं। यह फारवर्डिंग कहीं न कहीं गलत और भ्रामक स्थिति उत्पन्न करती है, जो विध्वंसक हो जाती है। फेक न्यूज किसी का चरित्रहनन करती हैं, तो किसी के एजेंडे को पूरा करती हैं मगर इसका नुकसान आमजन को होता है। आप सोचेंगे कि आखिर हम फेक न्यूज पर चर्चा क्यों कर रहे हैं, तो बताते चलें कि मौजूदा समय में भारतीय मीडिया सवालों के घेरे में है। आखिर भारतीय मीडिया ने ऐसा क्या कर दिया कि उस पर सवालिया निशान लग रहे हैं? सच यह है कि भारतीय मीडिया अभी भी भरोसेमंद और सच के ज्यादा करीब है। विश्वस्तर पर सर्वे करके रैंकिंग तैयार करने वाली संस्थाओं का यह मानना है। विश्वसनीयता के मामले में भारत का मीडिया विश्व का तीसरा सबसे भरोसेमंद मीडिया है।
सांप्रदायिकता को भड़काने, किसी नेता या विशिष्ट व्यक्ति का चरित्रहनन करके सियासी फायदा उठाने के लिए इस तरह के मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है। इसी कड़ी में हमें यूपी का खनन घोटाला भी दिखता है। घोटाले का जो भी आपराधिक चरित्र है, उसकी जांच देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी सीबीआई कर रही है। जो भी होगा सामने आएगा। देखने को मिला कि कुछ मीडिया पोर्टल में कुछ विशिष्ट लोगों के नाम इसमें उछाले गये, जिनका सीबीआई की जांच में कोई जिक्र नहीं है। यही नहीं मनगढंत कहानियां रचकर एजेंडे के तहत उन लोगों पर दाग लगाने का काम किया गया, जिनका इससे दूर-दूर तक कोई वास्ता ही नहीं है। हमने जब ऐसी खबर एक पोर्टल पर देखी तो सीबीआई के एक अफसर मित्र और हाईकोर्ट के एक जज से पूरा मामला जाना। उन्होंने बताया कि न तो सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में ऐसा कोई तथ्य है और न हीं हाईकोर्ट के संज्ञान में ऐसी कोई शिकायत आई है। हमने लखनऊ के मीडिया में पता किया तो जनकारी मिली कि सरकार में पद पाये एक पत्रकार ने बेकार घूम रहे कुछ मीडिया पोर्टल चलाने वालों के जरिए इस तरह की खबर प्लांट की थी।
हम “डिजिटल एरा” में जी रहे हैं। डिजिटलाइजेशन के दौर में बहुत कुछ आसानी से सुलभ हुआ है। हमारे यहां कड़ी कानूनी व्यवस्था न होने के कारण उसका दुरुपयोग अधिक होने लगा है। भारत में जो समस्या खड़ी हुई है वह परंपरागत मीडिया से नहीं बल्कि सोशल और डिजिटल मीडिया से है। सोशल मीडिया के जरिए परंपरागत मीडिया पर सवाल उठाये जाते हैं। “शिक्षित टाइप के जाहिल” लोग उस पर ताली ठोकते हैं। डिजिटल मीडिया के नाम पर पोर्टल और यूट्यूब चैनल बनाकर कुछ लोग-संगठन उसमें मनमानी करते हैं। एडिट करके फोटो, वीडियो का प्रयोग करके किसी की छवि पर धब्बा लगाया जाता है तो किसी की ब्रांडिंग की जाती है। जब तक सच सामने आता है, हालात बिगड़ चुके होते हैं। भारत में अब तक सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल्स पर चलाई गईं, चरित्रहननकारी खबरों के कारण तीन सालों में 48 आत्महत्या के मामले सामने आ चुके हैं। हमें यूपी के कासगंज और अलीगढ़ के सांप्रदायिक दंगों की घटना याद आती है, जब एक छोटी की कहासुनी को इस तरह से सोशल मीडिया में एडिट करके प्रस्तुत किया गया कि यह इलाका कई हफ्तों तक सुलगता रहा।
2014 के लोकसभा चुनाव के पहले फेक न्यूज का दौर शुरू हुआ था। यह एक एजेंडे के तहत हो रहा था। जब तक इस बारे में लोग कुछ समझ पाते देश के हालात बदल गये। दादरी में एक निर्दोष वृद्ध को पीट-पीट कर मार डाला गया। इसी तरह दिल्ली, राजस्थान, यूपी और कर्नाटक से लेकर देश के तमाम हिस्सों में हिंसक घटनाएं हुईं। आम निर्दोष लोग इसका शिकार हुए। इन घटनाओं से एक खौफ पैदा हुआ, जो सांप्रदायिक रंग लेने लगा। सांप्रदायिकता के तनाव का फायदा कुछ सियासी दलों और लुटेरों ने उठाया। जो इसका शिकार हुए उन्होंने अपना बहुत कुछ खोया। जिन्होंने ऐसी फेक न्यूज फारवर्ड कीं, उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ, जबकि जिन्होंने ऐसी न्यूज क्रिएट उनको बहुत थोड़ा मिला मगर जो षड़यंत्रकारी थे उन्होंने बहुत कुछ पाया। इससे नुकसान न केवल सामाजिक सौहार्द को हुआ बल्कि आमजन के दिलों में नफरत के बीज बोये गये। ऐसे वक्त में परंपरागत मीडिया के लिए यह चुनौती बनकर खड़ा हो गया। उस पर सवाल उठाया जाने लगा कि वह सच को नहीं दिखा रहा है जबकि सच कुछ और ही था। आपको याद होगा कि कैसे फेक न्यूज ने जमाने के स्टार रहे दिलीप कुमार को न जाने कितने बार मौत के मुंह में भेज दिया।
हम वैश्वीकरण के दौर में हैं। डिजिटल प्लेटफार्म हमारे लिए एक सुविधाजनक स्थान है, जहां बहुत कुछ भरा पड़ा है। कुछ अच्छा तो कुछ बुरा, समुद्र के मानिंद। जरूरत है कि हम चीजों को परखें। सच को करीब से जानें और समझें। जो जवाबदेय नहीं है, उस पर बगैर परखे यकीन करना सदैव संकट पैदा कर सकता है। परंपरागत मीडिया अधिकतर तथ्यों को बारीकी से परखता है, तब कुछ प्रकाशित करता या दिखाता है। विश्लेषण में पक्ष-विपक्ष हो सकता है मगर तथ्यों के सच वह नहीं। हमने जब पत्रकारिता की शुरुआत की थी, तब पत्रकारिता मिशन है या व्यवसाय, इस पर चर्चा हो रही थी। अंततः तय हुआ कि यह एक पवित्र व्यवसाय है, जो जनहित को ध्यान में रखकर किया जाता है। उस वक्त पीत पत्रकारिता पर चर्चा होती थी। उसे हेय माना जाता था। पीत पत्रकारिता वह थी जिसमें तथ्यों से खेलकर खबर को बिकाऊ-सनसनीखेज बनाया जाता था, न कि झूठ दिखाया जाता था। आज के समय में सवाल तथ्यों की सत्यता को लेकर ही हैं। हमने परंपरागत मीडिया में भी फेक न्यूज देखी हैं मगर वो बहुत कम हैं।
जब मीडिया एक उद्योग बन चुका है, इसमें करोड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है, तो उसे विश्वसनीय बनाये रखना उसी की जिम्मेदारी है। जब तक हम भरोसे को कायम रखेंगे, तब तक बाजार में टिकेंगे, नही तो वैश्वीकरण के दौर में नकार दिये जाएंगे। जरूरत है कि हम किसी के एजेंडे का यंत्र न बनकर सच को बेचने का काम करें। फेक न्यूज नहीं बल्कि जिम्मेदारी की खबर के साथ खड़े हों। जब ऐसा करेंगे तभी हमारी साख रहेगी और लोग सम्मान के साथ उसकी कीमत देंगे, अन्यथा नहीं।

जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

पिंजरे का तोता फड़फड़ाया तो काट दिये पंख

पिंजरे का तोता फड़फड़ाया तो काट दिये पंख
हमें पांच वर्ष पहले (मई 2013) देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आरएम लोढा, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ की तीन सदस्यीय खंडपीठ की वह टिप्पणी याद आती है, जब उन्होंने कोयला घोटाले में सरकारी हस्तक्षेप पर तल्खी व्यक्त करते कहा था कि सीबीआई पिंजरे का एक तोता है, इसे आजाद होना चाहिए। उस वक्त भाजपा ने इसे जोर शोर से प्रचारित किया और कहा था कि उनकी सरकार में सीबीआई पिंजरे का तोता नहीं रहेगी। जनता ने यकीन जताया, देश में बदलाव हुआ। भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ न केवल केंद्र में बल्कि देश के दो तिहाई राज्यों में सरकार बनाई। इस वक्त सीबीआई जैसी प्रतिष्ठित जांच एजेंसी में जो घट रहा है, वह किसी भी लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था वाले राष्ट्र के लिए कलंकित करने वाला है। एक उम्मीद की किरण सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग से थी मगर उनके रुख ने निराशा को खत्म करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उच्चाधिकार प्राप्त नियुक्ति समिति के फैसले ने निराशा को और भी बढ़ा दिया। कमेटी के बहुमत के फैसले से तो यही साबित हो रहा है कि अगर पिंजरे का तोता फड़फड़ाएगा तो उसके पंख काट दिये जाएंगे।
अंग्रजी हुकूमत ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आपूर्ति में घोटाले पकड़ने के लिए सैन्य विभाग के अधीन विशेष जांच का विभाग बनाया था, जो 1946 में गृह विभाग के अधीन पुलिस जांच व्यवस्था में सुधार के लिए दिल्ली पुलिस संस्थापन अधिनियम के तहत विधिक रूप से स्वतंत्र संस्था बन गया। हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1963 में इसे केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो नाम देकर एक ऐसी जांच संस्था बनाई जो केंद्र और राज्यों के उन मामलों की जांच कर सके, जहां बड़े शामिल हों। सीबीआई को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इसे पीएमओ के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अधीन कर दिया गया। इस विभाग को भी सीबीआई की जांच में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया गया। इसे केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में रख दिया गया। सीबीआई पर यह आरोप लगता था कि वह केंद्र सरकार की जांच एजेंसी है, जो राज्यों को डराने का काम करती है। कई बार सीबीआई का सियासी इस्तेमाल भी हुआ। यूपीए सरकार के दौरान भाजपा ने आरोप लगाया था कि यह सीबीआई असल में कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टीगेशन है।
निश्चित रूप से सीबीआई अभी भी देश की सबसे विश्वसनीय जांच एजेंसी है। देश की उच्च न्यायपालिका भी लोगों में यह विश्वास दिलाने का काम करती है कि वहां से इंसाफ मिलेगा मगर बीते कुछ सालों में सीबीआई का जिस तरह से सियासी फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वह दुखद है। वहीं संवैधानिक संस्थाओं का भी अब राजनीतिक दुरुपयोग होने लगा है। ऐसी संस्थाओं के नियंत्रकों का सत्ता के आगे रीढ़विहीन होकर झुक जाना, लोकतंत्र के लिए खतरा है। उच्च और उच्चतम न्यापालिका पर जिस तरह की टिप्पणियां सोशल मीडिया और चर्चाओं में सामने आ रही हैं, वो हमारे विश्वास को हिलाने वाली हैं। ऐसी संस्थाएं यकीन और दिली सम्मान से ही अपनी जगह बनाती हैं, न कि लोकलुभावन कार्यों से। न्यापालिका और संवैधानिक संस्थाओं में जब सियासी पहुंच और विचारधाराओं के आधार पर नियुक्तियां होने लगेंगी, तब ऐसे संकट खड़े होना लाजिमी है। यह वही देश है जहां तत्कालीन सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था। उस वक्त अगर जज, इंदिरा गांधी से प्रभावित हो जाते तो निश्चित रूप से न्याय की हत्या होती। जब राजीव गांधी सहित तमाम कद्दावरों के खिलाफ बोफोर्स के कथित दलाली मामले में सीबीआई ने जांच शुरू की, तब अगर अफसर डर गए होते तो सीबीआई इतनी ताकतवर और यकीनी न होती।
हमें यह कहते हुए भी कोई गुरेज नहीं कि डॉ. मनमोहन सरकार के वक्त में कैग ने जब टूजी स्कैम की रिपोर्ट दी, तब डॉ. मनमोहन सिंह ने कोई हस्तक्षेप न करके बड़ा दिल दिखाया था। उन्होंने कथित कोयला घोटाले में भी जांच से भागने का काम नहीं किया। जब सीबीआई ने इसकी जांच में कोताही बरती तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर नाराजगी व्यक्त करने के बजाय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की ही देखरेख में ही जांच कराने की बात कही थी। इस बार भी ऐसा ही होना चाहिए था। आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक बनाने का फैसला नरेंद्र मोदी सरकार का था। वर्मा को बेदाग और बेहतरीन अफसर बताकर सीबीआई को पिंजरे से मुक्त करने का दावा किया गया था। वर्मा ने जब दागदार क्षवि के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश आस्थाना को सीबीआई में रखने पर आपत्ति जताई तो उनपर ही संकट टूट पड़े। वर्मा ने जिस अफसर की शिकायत की, उसी अफसर की शिकायत पर न केवल उन्हें रातोंरात हटाया गया बल्कि अपमानित भी किया गया। अंत में सीवीसी की एक रिपोर्ट के चंद बिंदुओं के आधार पर तबादला भी कर दिया गया। इस साजिश में अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई जज शामिल होता है तो यह और भी दुखद है। हालांकि उन्होंने अपरोक्ष रूप से सफाई दी है कि प्रथम दृष्टया वर्मा आरोपित थे। उधर, वर्मा ने पद से इस्तीफा देते हुए कहा यह इंसाफ का कत्ल है।
सवाल यहीं खड़ा होता है, अगर वर्मा जांच में पाए गए तथ्यों में आरोपित हैं तो उनको सुने बिना तबादले का फैसला क्यों ले लिया गया? एफआईआर का अर्थ होता है प्रथम सूचना रिपोर्ट, तो आरोपित वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई? पुलिस सेवा नियमावली के मुताबिक तबादला कोई दंड नहीं है, ऐसे में वर्मा के खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही के बजाय तबादला ही क्यों किया गया? सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस एके पटनायक ने कहा कि उन्होंने आलोक वर्मा पर लगे आरोपों की सीवीसी की जांच की बारीकी से निगरानी की थी, उन्हें वर्मा के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं मिला। जब कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं था, तो अचानक क्या आफत आ गई कि सरकार आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के रूप में 24 दिन भी बर्दास्त नहीं कर पाई? क्या आलोक वर्मा सीबीआई को बंद पिंजरे में फड़फड़ाने के दोषी हैं? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब वक्त के साथ सरकार और उसके नेताओं को देना ही पड़ेगा? सुप्रीम कोर्ट को भी अगर अपनी साख बचानी है तो उसे दूध का दूध और पानी का पानी करना होगा।
वक्त रहते अगर हमारी सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सियासी नेताओं ने मर्यादा के दायरे में रहते हुए निष्पक्षता के साथ प्रभावी कदम नहीं उठाए तो लोकतंत्र के मूल की निर्मम हत्या हो जाएगी। संवैधानिक संस्थाओं को लोग सम्मान की नजर से नहीं देखेंगे। रीढ़विहीन न्यापालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं एक स्वस्थ एवं सम्मानित राष्ट्र का निर्माण नहीं करतीं।
जय हिंद।

बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ओढ़नी होगी

पल्स : Ajay Shukla
बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ओढ़नी होगी
देश की अर्थव्यवस्था सबसे बेहतरीन होने का दावा लंबे वक्त से मोदी सरकार करती आ रही है। तीन दिन पहले सेंटर फार मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) ने जैसे ही वित्त वर्ष 2018-19 की दिसंबर तिमाही के आंकड़े जारी किए, सरकारी दावे हवा हो गए। यह तिमाही बेहद निराशाजनक तस्वीर सामने लेकर आई है। निवेश से लेकर नई परियोजनाओं तक में भारी गिरावट देखने को मिली। यह पिछले 14 वर्षों में सबसे खराब अर्थव्यवस्था का सबूत है। गिरावट सिर्फ निजी क्षेत्र में ही नहीं हुई बल्कि सरकारी क्षेत्र में भी आई है। अगर हम 2014 से मुकाबला करें तो हालात बद से बदतर हुए हैं। इसके पीछे गलत नीतियां और नगण्य सुधारात्मक कदम सामने आये हैं। देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था हम सभी के लिए चिंता का विषय है। 2014 मई में जब नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब यह उम्मीद की जा रही थी कि हालात सुधरेंगे। त्वरित एवं विकासात्मक नीतियों का निर्धारण होगा मगर ऐसा नहीं हो सका। नोटबंदी और जीएसटी के गलत क्रियान्वयन ने अर्थतंत्र को हिलाकर रख दिया। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार पर नीतिगत निर्णय लेने में अक्षमता का आरोप लगता था मगर जब निर्णय लेने वाली सरकार आई तो उसके फैसले दिशा हीन हो गए।
मोदी सरकार को जल्द ही जनादेश के लिए जनता के बीच जाना है। जनता को अपने किए कामों को बताने के साथ ही उसके नतीजों का भी आंकलन करवाना है। ऐसे हालात में यह भी बताना पड़ेगा कि सरकार के कड़े फैसलों और कड़वे घूंट वाली दवाओं का आखिर क्या असर रहा? यह समझाने के लिए जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में सुधार किया जाए। इस तिमाही में सितंबर तिमाही की अपेक्षा सरकारी क्षेत्र में भी 37 प्रतिशत कम निवेश हुआ जबकि निजी क्षेत्र में इसी वक्त के दौरान 62 फीसदी कमी आई है। फुटकर समेत सभी क्षेत्रों में निराशाजनक हालत सामने आ रहे हैं। इसका असर रोजगार पर पड़ना लाजिमी है। उद्योग-धंधों में रोजगार के न केवल अवसर कम हुए हैं बल्कि नए साल में नौकरियां जाने का भय युवाओं-कामगारों में सता रहा है। नए रोजगार सृजन के वक्त कटौती की तलवार किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक संकेत देती है। बैंकों की सख्ती और सरकार की नीतियों का मैत्रीपूर्ण न होना संकट का विषय बना हुआ है। चुनावी खर्चों और लोकलुभावन निर्णयों के बाद तय है कि आगे की अर्थनीतियां अर्थव्यवस्था को सुधारने के माकूल नहीं होंगी।
मौजूदा वक्त में देश की अर्थव्यवस्था के लिए एनपीए बैंक खाते और डेड मनी बड़े संकट के तौर पर सामने हैं। आरबीआई के आंकड़ों में यह स्पष्ट है कि पिछले साढ़े चार साल में पूंजीपतियों को कर्ज में दी गई एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम डेड मनी हो चुकी है। ऐसे में अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए समझपूर्ण नीतियां बनाने और उनके बेहतर क्रियान्वयन की जरूरत है। यह निर्विवादित रूप से साबित हो चुका है कि नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था का काला अध्याय था। देश इस संकट से निपट पाता उसके पहले ही बगैर व्यापक क्रियान्वयन नीति बनाए ही जीएसटी लागू कर दिया जाना, संकट को और भी गहराने वाला साबित हुआ। यही कारण है कि आशातीत नतीजे नहीं आए। सरकारों ने भी देश के आर्थिक, सामाजिक और ढांचागत विकास से ज्यादा जाति-धर्म के वोटबैंक साधने पर जोर दिया, जिनसे भय का माहौल खड़ा हुआ। सियासी घमासान के बीच जो सड़क नेटवर्क तैयार हुआ, उस पर टोल का बोझ इतना बढ़ा है कि ट्रांसपोर्ट सहित तमाम व्यवसाय संकट में घिर गए हैं। लघु उद्योगों की हालत पतली है और मध्ययम उद्योग संघर्ष से जूझ रहे हैं। इनको समर्थन और संरक्षण देने पर एमएसएमई मंत्रालय अब तक कुछ नहीं कर सका है।
कृषि आय दोगुनी करने के सरकारी दावे भी हवा हो गए हैं क्योंकि खर्च के सापेक्ष आमदनी नहीं बढ़ी है। कृषि लागत बढ़ने का बड़ा कारण डीजल उर्वरक से लेकर अन्य जरूरी उपकरणों का बहुत महंगा हो जाना है। जीएसटी की मार से कृषि क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। इससे कृषि और किसान दोनों की हालत दयनीय हुई है। इस क्षेत्र में रोजगार का औसत इतना खराब है कि जरूरत से एक हजार गुना ज्यादा लोग काम कर रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी नगण्य है। दूसरी तरफ, बैंकिंग धोखाधड़ी ने हालात बिगाड़े हैं। सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के बजाय पूंजीपतियों को साधने का काम किया और उनके हित में जो फैसले लिए वो अर्थव्यवस्था के लिए फांसी साबित हो रहे हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि पिछले एक साल में (2017-18) धोखाधड़ी करने वालों ने बैंकिंग व्यवस्था से 41,167.7 करोड़ रुपए हजम कर लिए। जो पिछले वित्तीय वर्ष (2016-17) के 23,933 करोड़ रुपए की बैंक धोखाधड़ी की तुलना में 72 फीसदी अधिक है। यह रकम न केवल एनपीए हुई है बल्कि डेड मनी घोषित कर दी गई है। आरबीआई भी मानता है कि इनमें से कई मामले एनपीए के इसलिए हुए क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी से वो संभल नहीं सके। बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले पिछले चार साल से तेजी से बढ़े हैं और सरकार तथा बैंके इसे नियंत्रित नहीं कर सकीं। जो अर्थव्यवस्था को घातक मोड़ पर ले आया है। आॅफ-बैलेंस शीट आॅपरेशन, विदेशी मुद्रा लेनदेन, जमा खातों और साइबर गतिविधि से संबंधित धोखाधड़ी पिछले वित्तीय वर्ष में प्रमुख रहे हैं। इसमें भी सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि सार्वजनिक (पीएसयू) बैंकों में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की धोखाधड़ी के 93 प्रतिशत मामले हुए जबकि इसमें निजी बैंकों की हिस्सेदारी छह प्रतिशत ही रही है। रिजर्व बैंक ने माना है कि धोखाधड़ी ने एनपीए को बढ़ा दिया है। मार्च 2018 में एनपीए 10,39,700 करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर पौने 11 करोड़ के करीब पहुंच गया है।
सरकार और हमें यह गंभीरता से सोचना होगा कि किसी भी देश के समृद्ध होने में उसकी बैंकिग व्यवस्था आधार होती है। अर्थव्यवस्था अगर मजबूत नहीं होती तो आधार कमजोर हो जाता है। ऐसे में न निवेश मिलता है और न ही विकास का पहिया आगे बढ़ पाता है। जरूरी है कि हमारे नीति नियंता न केवल बेहतरीन और मैत्रीपूर्ण नीति बनाएं बल्कि उनके सही क्रियान्वयन पर भी जोर दें। जब तक अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी, न रोजगार के अवसर सृजित होंगे और न ही पुराने बचे रह पाएंगे। सरकारों के मुखिया और सियासी दल जब श्रेय लेने में पीछे नहीं रहते तो उन्हें बिगड़ती अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी भी ईमानदारी से ओढ़नी चाहिए। उनको जनता जनार्दन को भी इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए क्योंकि वास्तव में डूब रही लाखों करोड़ रुपए की धनराशि जनता की ही है।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)