Sunday, August 5, 2018

शेयर बाजार ही समृद्ध अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं

पल्स- अजय शुक्ल
शेयर बाजार ही समृद्ध अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं 
शेयर बाजार ने वीरवार को अचानक तेजी का रुख पकड़ा और रिकार्ड ऊंचाइयों पर जा पहुंचा। यह अनायास नहीं था बल्कि विकास दर सूचकांकों के संकेत और देश की विकास दर के बारे में विश्व बैंक समेत दुनिया भर की वित्तीय संस्थाओं के अनुमान की रिपोर्ट थी। इस रिपोर्ट में भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और उसने फ्रांस जैसे समृद्ध यूरोपीय राष्ट्र को पछाड़ दिया। यह खबर सुखद और उत्साहवर्धक रही जिसने शेयर बाजार में उछाल ला दिया। निश्चित रूप से जो आर्थिक सुधार जीएसटी और आयकर कानूनों को लेकर किये गये हैं, उनसे अर्थव्यवस्था को फायदा होना तय है। यह फायदा कितना और कितने वक्त के लिए होगा, यह सवालों में है। विकास दर बढ़ाने को लेकर आंकड़ों का जो खेल देश के नौकरशाहों और सियासी गठजोड़ ने किया है वह समद्धि कारक नहीं है क्योंकि इससे आधार मजबूत नहीं होता। 
माना जाता है कि लोग व्यापार जगत के तात्कालिक मूड को तो भांप सकते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था की बढ़त को नहीं नापा जा सकता। शेयर बाजार अचानक ऊंचाइयां छूता है और धड़ाम हो जाता है। इनकी बुलंदी और गिरावट, दोनों क्षणभंगुर होती है, जबतक कि कोई बड़ा मजबूत आधार न हो। यह बाजार जिन उम्मीदों को सोचकर चढ़ता है, कुछ हल्का हुआ तो आशंकाओं में तेजी से गिरता भी है। वीरवार को बाजार जिस अर्थव्यवस्था की बढ़ती गति को लेकर आशांन्वित हुआ है, उसका आधार मजबूत नहीं है। कृतिम और उम्मीदों के टूटने का असर क्या होता है? हमारी अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है और दिशा सकारात्मक है। जीएसटी एक अच्छा उपाय है मगर उसका क्रियान्वयन सुरक्षित और सभी को साथ समेटने वाला होना चाहिए, जो नहीं दिख रहा। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में बताया है कि अधिक “कर” की बजाय कम “कर” अधिक लोगों पर लगाने से चोरी रुकती है और राजस्व बढ़ता है। सच तो यह है कि लोगों ने कर चोरी के दूसरे रास्ते तलाश लिए हैं। 
देश को जुगाली की नहीं बल्कि मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए भौतिक तौर पर काम करने की जरूरत है। हालात यह हैं कि हम वातानुकूलित कमरों में बैठकर सामाजिक सुरक्षा विहीन राष्ट्र के नागरिकों पर “राजस्व” का भार डालने की नीति तैयार करते हैं। इससे हमें सफलतायें नहीं बल्कि असफलतायें हाथ लगती हैं। अर्थव्यवस्था शेयर बाजार नहीं है। यह कुछ बड़े पूंजीपतियों के समूह का खेल अधिक है। इसके वनस्पति अर्थव्यवस्था अधिक स्थिर गति से बढ़ती या नीचे आती है। इसका आंकलन रोजाना नहीं किया जा सकता है। यह आशंकाओं या सिर्फ उम्मीदों पर खड़ी नहीं होती है। हमारे नीति नियंताओं और आर्थिक ढांचे से जुड़े लोगों को चाहिए कि वो शेयर बाजार के बजाय मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने के लिए उसके मूल आधार पर ध्यान दें। हमारे राज्य कर्जों में दबे हैं। नौकरियां खत्म हो रही हैं। वेतन वक्त पर नहीं मिल पा रहा। जनसुविधायें कर्ज लेकर जुटाई जा रही हैं। ये हालात देश के लिए ठीक नहीं हैं। 
अगर हम शेयर बाजार के इतिहास पर निगाह डालें तो पाएंगे कि इसमें एकरूपता या स्थायित्व का भाव कभी नहीं रहा। इसका उतार चढ़ाव भी कई बार अजब कारणों से हुआ। ऐसा माना जाता है कि विश्व का पहला शेयर बाजार बेल्जियम के एंटवर्प शहर में 1531 में बना था। इस बाजार में एकत्र व्यापारी कोमोडिटीज में सट्टा लगाते थे। विश्व का पहला स्टॉक एक्सचेंज 1602 में एमस्टरडम में बना। आज विश्व के शेयर बाजार को दिशा देने वाला न्यूयार्क स्टाक एक्सचेंज भी 18वीं सदी में अस्तित्व में आया था। भारत में शेयर बाजार का जन्म 1850 में मुंबई में एक बरगद के पेड़ के नीचे हुआ जो बाद में दलाल स्ट्रीट के रूप में 1875 में संगठित होकर तैयार हुआ। इस बाजार की अनिश्चितता और उम्मीद का ही नतीजा है कि निवेशक अपने धन को लेकर चिंतित रहते हैं। इसके लिए वो स्ट्रेटजी प्लानर्स की मदद भी लेते हैं, बावजूद इसके कोई यह नहीं कह सकता कि उसकी स्ट्रेटजी सदैव सफल रही। अधिकतर इस बाजार में नया निवेशक अपना धन गंवाकर जाता है। पूंजी बाजार का खेल बड़ी कंपनियों और सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। इसके बाद वैश्विक चिंताओं में बाजार गिरता-बढ़ता भी है। 
अभी मानसून सत्र शुरुआती दौर में है। कंपनियों की पहली तिमाही के नतीजे भी अच्छी उम्मीद जगा रहे हैं। ईरान ने भारत को उदार शर्तों पर कच्चा तेल देने का वादा किया है। इन सब का नतीजा वीरवार को शेयर बाजार में दिखा और 30 शेयरों वाला संवेदनशील सूचकांक पौन घंटे में ही ऐतिहासिक बुलंदी पर था। इससे साफ है कि उद्योग जगत खासा आशान्वित है। शेयर बाजार को सूक्ष्ता से देखें तो वीरवार को मुंबई शेयर बाजार के ही 50 शेयरों वाले संवेदनशील सूचकांक की निगेटिव स्थिति थी जबकि 30 शेयरों वाले सूचकांक में बढ़त। यह तब है जब शेयर बाजार बुलंदियों पर था। इससे यह समझा जा सकता है कि शेयर बाजार इस समय काफी उम्मीदें बांध रहा है, लेकिन सभी के लिए नहीं। जो बड़ी, महत्वपूर्ण व प्रतिनिधि कंपनियां हैं, वे इस समय लबरेज हैं जबकि दूसरा पहलू यह है कि बाजार की तेजी कुछ कंपनियों का खेल अधिक है स्थायित्व कम। हमें बाजार की तेजी नहीं अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ की आवश्यकता है। 
जय हिंद। 
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
ajay.shukla@itvnetwork.com

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