Sunday, August 5, 2018

देश की सीमा से बड़ी है मानवता

पल्स- अजय शुक्ल

देश की सीमा से बड़ी है मानवता
हमारी धर्म-संस्कृति हो या संस्कार सभी में यह स्पष्ट है कि मानवता किसी भी देश की सीमा से बड़ी होती है। हम इसे सदैव आत्मसात करके ही समृद्ध और विजयी हुए हैं। हमारी सहिष्णुता और ज्ञान ने ही हमें विश्व गुरू की उपाधि दिलाई थी। हम शरणागत को न केवल ससम्मान स्थान देते हैं बल्कि उनके संघर्ष में भी साथी बनते रहे हैं। हम संकुचित सोच के लोग नहीं थे। हम वैश्विक बुद्धि विद्या से युक्त देश के नागरिक हैं। बीते कुछ सालों से जिस तरह संकुचित विचारधाराओं वाली सोच हमारे देश में पनपी है, वह दुखद है क्योंकि हम सीमाओं से परे मानवता के दुख दर्द बांटने वाले लोग रहे हैं। यह चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि नागरिकता रजिस्टर की राजनीति देश में चल रही है। निश्चित रूप से किसी देश में वहां के नागरिकों का ही बड़ा हक होता है। यह भी सच है कि शरणागत या विपत्ति का मारा अगर हमारे यहां आता है तो उसे मौका देते हैं कि वह अपना जीवन सुधार सके।
यह उचित है कि तुष्टीकरण की सियासत नहीं होनी चाहिए। तुष्टीकरण जाति, धर्म और क्षेत्र किसी भी तरह का हो सकता है। जैसा कि केंद्र सरकार ने बताया कि हमारे देश में कुछ लाख बांग्लादेशी परिवार अवैध तरीके से रह रहे हैं। अगर यह प्रमाणित है तब भी हमें दो बातें जरूर सोचनी चाहिए, पहली कि बांग्लादेश कभी हमारे देश का हिस्सा था और दूसरा कि वहां के नागरिक भी हमारे ही नश्ली भाई हैं। हम जब वृहद भारतवर्ष की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि बर्मा से लेकर बलूचिस्तान तक हमारी सीमाएं थीं। इस कथित अवैध आबादी को देश से खदेड़ने की जब हम बात करते हैं तो यह भी भूल जाते हैं कि संपूर्ण मानव जाति कभी न कभी किसी न किसी राज्य देश सीमा में अवैध रूप से ही पहुंची है। इस आबादी ने एक कालखंड में अगर हमारे देश में आश्रय लिया है तो उसने अपनी श्रमशक्ति भी दी है। इस श्रम ने देश को आगे ले जाने में मदद की है।
हाल के दिनों में हमने रोहिंग्या की बदतर हालत को देखा है। नन्हें बच्चों को भी मरते देखा है। हमारे देश का संविधान कहता है कि जिसका जन्म भारत देश की सीमा में हुआ है वह भारतीय है। कारण स्पष्ट है कि जन्म लेने वाले का यह दोष नहीं होता कि वह किस देश की सीमा में पैदा हो रहा है। यह दोष उनके माता-पिता का है कि वह कहीं के वैध नागरिक हैं या अवैध। निश्चित रूप से भारत देश की आबादी विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी है। ऐसे में यहां चिंतन का विषय है कि आबादी को संयमित किया जाये। विज्ञान के अनुसार मानवजाति का उद्भव दो लाख वर्ष पहले जब अफ्रीका में हुआ था तब उसे यह ज्ञात नहीं था कि कहां और कैसे जाना है। एक लाख वर्ष तक मानव सिर्फ अफ्रीका में भटकता रहा। धीरे-धीरे उसने बाहर निकलना सीखा। कुछ हजार वर्ष पहले मानवजाति भारत पहुंची। यहां की जलवायु मुफीद होने के कारण आबादी तेजी से बढ़ी और विभिन्न देशों और संस्कृति के लोग यहां आते गये। हमने किसी को खदेड़ा नहीं बल्कि उन्हें अपनाया, जिससे हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति की विशेषता विविधता में एकता की बनी।
निश्चित रूप से यह उचित है कि किसी भी देश में उसके विधिक नागरिक ही निवास करें। इसके बावजूद मानवता सर्वश्रेष्ठ है। हमें अब कोशिश करनी चाहिए कि न केवल हमारी आबादी नियंत्रित हो बल्कि बाहर से आने वालों की संख्या कम हो। जो लोग कई दशकों या सदियों से यहां रह रहे हैं, उनके लिए कोई मानवता के अनुकूल व्यवस्था की जाये। अगर उनके मूल देश अब उन्हें लेने को तैयार नहीं हैं तो ऐसे लोगों की कालोनियां विकसित कर उन्हें श्रमशक्ति के रूप में इस्तेमाल किया जाये, जिससे देश की उत्पादकता में वृद्धि हो। हम किसी भी मानव को असहाय नहीं छोड़ सकते। यह हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। मनुष्यता और सभ्य राष्ट्र की यही एक शाश्वत पूंजी है। कोई भी विनाशात्मक कार्य न कर रक्षात्मक एवं रचनात्मक कार्य करने के लिए जुटना ही भारतीय सभ्यता रही है। प्रत्येक व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिये कटिबद्ध हो जाए, तो निश्चय ही हमारे परिवार, मुहल्ले, प्रान्त, देश और विश्व से पशुता, बर्बरता एवं भ्रष्टाचार का अंत हो सकता है।
देशभक्ति और राष्ट्र की सीमाएं किसी भी देश के लिए जरूरी हैं। वहां के नागरिकों का सहिष्णु और उत्पादक होना उससे भी अधिक जरूरी है। इन सब के बीच एक और चीज जरूरी है कि स्वार्थ के स्थान पर दूसरों के गुणों के प्रीति सम्मान, गुण ग्रहीता, को विकसित किया जाये। हम दूसरों के उन्नत गुणों को आत्मसात करें और उनके सद्गुणों की प्रशंसा तो मित्र-बन्धुत्व का भाव उत्पन्न होगा। ऐसा होने पर वैश्विक प्रेम पनपेगा और समाज शत्रुभाव से मुक्त होगा। यह पाठ हमें वैदिक सनातन धर्म में सीखने को मिलता है। जब हम अखंड भारत की उम्मीद करते हैं तो हमें यह पाठ जरूर अपनाना चाहिए न कि देश के नाम की संकुचित मानसिकता से ग्रसित होना चाहिए। अतः जरूरत है कि हम राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के नाम पर दशकों से भारत में रह रहे लोगों को निकालने के बजाय उनके जीवन को सुव्यवस्थित करने के विकल्प तलाशें, जिससे मानवता का कत्ल न हो और राष्ट्रीय भावना भी मजबूत हो।

जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

ajay.shukla@itvnetwork.com

No comments: