पल्स- अजय शुक्ल
यौन अपराधों को रोकने के लिए संजीदा हों वरिष्ठ
हम 21वीं सदी के युवा देश हैं मगर हमारी मानसिक दशा अभी भी किसी जंगली आदम से कम नहीं। सभ्य समाज में जीने की बात करने वाले हम लोग किसी लड़की को देखते ही आदमखोर बन जाते हैं। पता नहीं क्यों, हमें किसी भी लड़की में अपनी हवस की भूख मिटती नजर आती है। शायद यही वजह है कि देश में होने वाले यौन अपराधों में कमी आने के बजाय बढ़ोत्तरी हो रही है। हालात ये हैं कि न बच्चे सुरक्षित हैं और न महिलाएं। दुख तब अधिक होता है जब जिम्मेदार लोगों के इस तरह के अपराधों में शामिल होने की सूचना आती है। ऐसे लोग अपने अपराध पर क्षमा मांगकर भविष्य में गलती न करने की बात करने के बजाय उसे न्यायोचित ठहराते या झुठलाते नजर आते हैं। शिक्षक, जिन पर देश का भविष्य निर्मित करने का भार है वे भी भविष्य को बरबाद करते दिखते हैं।
हम यह चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पिछले एक सप्ताह में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जो किसी भी सभ्य और संस्कारी समाज-देश को कलंकित करने वाली हैं। हरियाणा के शिक्षा विभाग के एक अतिरिक्त निदेशक ने अपने कार्यालय में कार्यरत युवती का कई बार पीछा किया। वह जब इस एचसीएस अधिकारी के जाल में नहीं फंसी तो उसे काम के बहाने दफ्तर के अपने कमरे में बुलाकर दबोच लिया। युवती ने शोर मचाया तब वह बच सकी। युवती अपनी शिकायत लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुंची मगर सब ने अनसुना कर दिया। वह भाई के साथ महिला थाने गई तो वहां उसे करीब 18 घंटे तक मानसिक यातना दी गई। डीजीपी से लेकर एसएचओ तक भटकी मगर एफआईआर मीडिया के आने पर लिखी गई। खिलाड़ी पुलिस ने ऐसा केस बनाया कि अधिकारी को तत्काल जमानत मिल गई। विभागीय जांच समिति बनी और उसने रिपोर्ट में उस अधिकारी को दोषी बताया मगर सरकारी अफसर 10 दिनों तक फाइल भटकाते रहे। मीडिया ने फिर नकाब उठाया तब निलंबन का ड्रामा हुआ मगर वास्तव में अब तक नहीं।
बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में रहने वाली तीन दर्जन से अधिक लड़कियों के साथ वहां के शिक्षक और केयरटेकर वह सभी कुकर्म करते रहे जिनसे बचाने के लिए यह गृह सरकार ने बनाया है। पूणे के एक मदरसे में दर्जनों बच्चों का वहीं के शिक्षक लंबे समय से यौन उत्पीड़न कर रहे थे। ये घटनायें सिर्फ बानगी हैं। देश के अधिकतर राज्यों से इस तरह की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट को आधार मानें तो हर तीसरा बच्चा और हर दूसरी महिला यौन अपराध का शिकार होती है। वर्ष 2012 में भारत सरकार ने बाल सुरक्षा एक्ट और 2013 में कार्यस्थलों पर महिला यौन उत्पीड़न निरोधक एक्ट लागू किया। इन कानूनों के अस्तित्व में आने का मतलब यह नहीं है कि यौन अपराध के मामले रुक गये। मंत्रालय के अधीन किये गये सर्वे में यह चौकाने वाली बात सामने आई कि 95 फीसदी मामलों को रिपोर्ट ही नहीं किया जाता है।
हम अपने लोकतांत्रिक विधि से बने प्रतिनिधियों से उम्मीद करते हैं कि वह ऐसे मामलों में संजीदगी का परिचय देंगे और सहनुभूति रखेंगे मगर हो उलट रहा है। भाजपा के एक सांसद हरि ओम पांडेय ने ऐसे मामलों पर कड़े कदम की बात करने के बजाय अल्पसंख्यक समुदायों को इसके लिए दोषी ठहरा दिया। वह भूल गये कि एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक अधिकतर दोषी बहुसंख्यक समुदाय से ही हैं। दुख तब होता है जब बेटियों-बच्चों की सुरक्षा का दम भरने के बड़े बड़े भाषण देने वाले नेता दोषियों पर कार्रवाई के नाम पर सुस्त हो जाते हैं। भारत सरकार के डीओपीटी ने कार्यस्थलों पर यौन अपराध के मामले की जांच 30 दिनों में पूरी करके रिपोर्ट देने का नियम बनाया है। इस नियम के रहते भी 30 दिनों में कार्रवाई नहीं हो रही। दोषी को बचाव का पूरा मौका दिया जाता है और जिम्मेदार वरिष्ठ खामोश हैं।
मनोविशेषज्ञ मानते हैं कि अधिकतर मामलों में बच्चों और महिलाओं के परिजन उन्हें अनसुना करते हैं। वह तत्काल कार्रवाई के पक्ष में नहीं होते। दूसरी तरफ जहां महिलायें और बच्चे कानूनी कार्रवाई करते हैं, वहां पहले जांच में हीलाहवाली और फिर लंबी अदालती प्रक्रिया का वे शिकार होते हैं। देश की अदालतों में ऐसे 85 फीसदी मामले लंबित हैं। यौन अपराधों के बढ़ने का जब हम अध्यन करते हैं तो पता चलता है कि यह मानसिक विकृति का नतीजा है। हमारी सामाजिक व्यवस्था दोषपूर्ण है। हम अपने बच्चों को यौन शिक्षा देने में कतराते हैं। नैतिक शिक्षा को भुला चुके हैं और विद्यालयों में यह सिर्फ कागजी हो गया है। घर और समाज में भी संस्कारों का सृजन करने के बजाय धार्मिक चोला ओढ़ने का चलन अधिक हुआ है। इन हालात में हम एक अच्छे समाज और देश का निर्माण नहीं कर सकते। जरूरत यह है कि शिक्षा सिर्फ रोजगार के लिए न हो बल्कि ज्ञान और संस्कारों से जुड़ी हो। हम बच्चों को धर्म का लबादा न उढ़ायें बल्कि उन्हें आधुनिकता और वैज्ञानिक तरीके से संस्कारित करें। यह जिम्मा सेवानिवृत्त हो चुके समाज के लोगों पर डालें, जिससे उन्हें वरिष्ठ संरक्षक होने का अहसास भी रहे। जब यह सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर विकसित होगा और बच्चे बड़ों से सीखेंगे तब ही कुछ बेहतर हो सकेगा अन्यथा नहीं।
जय हिंद
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
ajay.shukla@itvnetwork.com
यौन अपराधों को रोकने के लिए संजीदा हों वरिष्ठ
हम 21वीं सदी के युवा देश हैं मगर हमारी मानसिक दशा अभी भी किसी जंगली आदम से कम नहीं। सभ्य समाज में जीने की बात करने वाले हम लोग किसी लड़की को देखते ही आदमखोर बन जाते हैं। पता नहीं क्यों, हमें किसी भी लड़की में अपनी हवस की भूख मिटती नजर आती है। शायद यही वजह है कि देश में होने वाले यौन अपराधों में कमी आने के बजाय बढ़ोत्तरी हो रही है। हालात ये हैं कि न बच्चे सुरक्षित हैं और न महिलाएं। दुख तब अधिक होता है जब जिम्मेदार लोगों के इस तरह के अपराधों में शामिल होने की सूचना आती है। ऐसे लोग अपने अपराध पर क्षमा मांगकर भविष्य में गलती न करने की बात करने के बजाय उसे न्यायोचित ठहराते या झुठलाते नजर आते हैं। शिक्षक, जिन पर देश का भविष्य निर्मित करने का भार है वे भी भविष्य को बरबाद करते दिखते हैं।
हम यह चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पिछले एक सप्ताह में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जो किसी भी सभ्य और संस्कारी समाज-देश को कलंकित करने वाली हैं। हरियाणा के शिक्षा विभाग के एक अतिरिक्त निदेशक ने अपने कार्यालय में कार्यरत युवती का कई बार पीछा किया। वह जब इस एचसीएस अधिकारी के जाल में नहीं फंसी तो उसे काम के बहाने दफ्तर के अपने कमरे में बुलाकर दबोच लिया। युवती ने शोर मचाया तब वह बच सकी। युवती अपनी शिकायत लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुंची मगर सब ने अनसुना कर दिया। वह भाई के साथ महिला थाने गई तो वहां उसे करीब 18 घंटे तक मानसिक यातना दी गई। डीजीपी से लेकर एसएचओ तक भटकी मगर एफआईआर मीडिया के आने पर लिखी गई। खिलाड़ी पुलिस ने ऐसा केस बनाया कि अधिकारी को तत्काल जमानत मिल गई। विभागीय जांच समिति बनी और उसने रिपोर्ट में उस अधिकारी को दोषी बताया मगर सरकारी अफसर 10 दिनों तक फाइल भटकाते रहे। मीडिया ने फिर नकाब उठाया तब निलंबन का ड्रामा हुआ मगर वास्तव में अब तक नहीं।
बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में रहने वाली तीन दर्जन से अधिक लड़कियों के साथ वहां के शिक्षक और केयरटेकर वह सभी कुकर्म करते रहे जिनसे बचाने के लिए यह गृह सरकार ने बनाया है। पूणे के एक मदरसे में दर्जनों बच्चों का वहीं के शिक्षक लंबे समय से यौन उत्पीड़न कर रहे थे। ये घटनायें सिर्फ बानगी हैं। देश के अधिकतर राज्यों से इस तरह की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट को आधार मानें तो हर तीसरा बच्चा और हर दूसरी महिला यौन अपराध का शिकार होती है। वर्ष 2012 में भारत सरकार ने बाल सुरक्षा एक्ट और 2013 में कार्यस्थलों पर महिला यौन उत्पीड़न निरोधक एक्ट लागू किया। इन कानूनों के अस्तित्व में आने का मतलब यह नहीं है कि यौन अपराध के मामले रुक गये। मंत्रालय के अधीन किये गये सर्वे में यह चौकाने वाली बात सामने आई कि 95 फीसदी मामलों को रिपोर्ट ही नहीं किया जाता है।
हम अपने लोकतांत्रिक विधि से बने प्रतिनिधियों से उम्मीद करते हैं कि वह ऐसे मामलों में संजीदगी का परिचय देंगे और सहनुभूति रखेंगे मगर हो उलट रहा है। भाजपा के एक सांसद हरि ओम पांडेय ने ऐसे मामलों पर कड़े कदम की बात करने के बजाय अल्पसंख्यक समुदायों को इसके लिए दोषी ठहरा दिया। वह भूल गये कि एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक अधिकतर दोषी बहुसंख्यक समुदाय से ही हैं। दुख तब होता है जब बेटियों-बच्चों की सुरक्षा का दम भरने के बड़े बड़े भाषण देने वाले नेता दोषियों पर कार्रवाई के नाम पर सुस्त हो जाते हैं। भारत सरकार के डीओपीटी ने कार्यस्थलों पर यौन अपराध के मामले की जांच 30 दिनों में पूरी करके रिपोर्ट देने का नियम बनाया है। इस नियम के रहते भी 30 दिनों में कार्रवाई नहीं हो रही। दोषी को बचाव का पूरा मौका दिया जाता है और जिम्मेदार वरिष्ठ खामोश हैं।
मनोविशेषज्ञ मानते हैं कि अधिकतर मामलों में बच्चों और महिलाओं के परिजन उन्हें अनसुना करते हैं। वह तत्काल कार्रवाई के पक्ष में नहीं होते। दूसरी तरफ जहां महिलायें और बच्चे कानूनी कार्रवाई करते हैं, वहां पहले जांच में हीलाहवाली और फिर लंबी अदालती प्रक्रिया का वे शिकार होते हैं। देश की अदालतों में ऐसे 85 फीसदी मामले लंबित हैं। यौन अपराधों के बढ़ने का जब हम अध्यन करते हैं तो पता चलता है कि यह मानसिक विकृति का नतीजा है। हमारी सामाजिक व्यवस्था दोषपूर्ण है। हम अपने बच्चों को यौन शिक्षा देने में कतराते हैं। नैतिक शिक्षा को भुला चुके हैं और विद्यालयों में यह सिर्फ कागजी हो गया है। घर और समाज में भी संस्कारों का सृजन करने के बजाय धार्मिक चोला ओढ़ने का चलन अधिक हुआ है। इन हालात में हम एक अच्छे समाज और देश का निर्माण नहीं कर सकते। जरूरत यह है कि शिक्षा सिर्फ रोजगार के लिए न हो बल्कि ज्ञान और संस्कारों से जुड़ी हो। हम बच्चों को धर्म का लबादा न उढ़ायें बल्कि उन्हें आधुनिकता और वैज्ञानिक तरीके से संस्कारित करें। यह जिम्मा सेवानिवृत्त हो चुके समाज के लोगों पर डालें, जिससे उन्हें वरिष्ठ संरक्षक होने का अहसास भी रहे। जब यह सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर विकसित होगा और बच्चे बड़ों से सीखेंगे तब ही कुछ बेहतर हो सकेगा अन्यथा नहीं।
जय हिंद
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
ajay.shukla@itvnetwork.com






