Sunday, August 5, 2018

यौन अपराधों को रोकने के लिए संजीदा हों वरिष्ठ

पल्स- अजय शुक्ल
यौन अपराधों को रोकने के लिए संजीदा हों वरिष्ठ 
हम 21वीं सदी के युवा देश हैं मगर हमारी मानसिक दशा अभी भी किसी जंगली आदम से कम नहीं। सभ्य समाज में जीने की बात करने वाले हम लोग किसी लड़की को देखते ही आदमखोर बन जाते हैं। पता नहीं क्यों, हमें किसी भी लड़की में अपनी हवस की भूख मिटती नजर आती है। शायद यही वजह है कि देश में होने वाले यौन अपराधों में कमी आने के बजाय बढ़ोत्तरी हो रही है। हालात ये हैं कि न बच्चे सुरक्षित हैं और न महिलाएं। दुख तब अधिक होता है जब जिम्मेदार लोगों के इस तरह के अपराधों में शामिल होने की सूचना आती है। ऐसे लोग अपने अपराध पर क्षमा मांगकर भविष्य में गलती न करने की बात करने के बजाय उसे न्यायोचित ठहराते या झुठलाते नजर आते हैं। शिक्षक, जिन पर देश का भविष्य निर्मित करने का भार है वे भी भविष्य को बरबाद करते दिखते हैं।
हम यह चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि पिछले एक सप्ताह में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जो किसी भी सभ्य और संस्कारी समाज-देश को कलंकित करने वाली हैं। हरियाणा के शिक्षा विभाग के एक अतिरिक्त निदेशक ने अपने कार्यालय में कार्यरत युवती का कई बार पीछा किया। वह जब इस एचसीएस अधिकारी के जाल में नहीं फंसी तो उसे काम के बहाने दफ्तर के अपने कमरे में बुलाकर दबोच लिया। युवती ने शोर मचाया तब वह बच सकी। युवती अपनी शिकायत लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुंची मगर सब ने अनसुना कर दिया। वह भाई के साथ महिला थाने गई तो वहां उसे करीब 18 घंटे तक मानसिक यातना दी गई। डीजीपी से लेकर एसएचओ तक भटकी मगर एफआईआर मीडिया के आने पर लिखी गई। खिलाड़ी पुलिस ने ऐसा केस बनाया कि अधिकारी को तत्काल जमानत मिल गई। विभागीय जांच समिति बनी और उसने रिपोर्ट में उस अधिकारी को दोषी बताया मगर सरकारी अफसर 10 दिनों तक फाइल भटकाते रहे। मीडिया ने फिर नकाब उठाया तब निलंबन का ड्रामा हुआ मगर वास्तव में अब तक नहीं।
बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में रहने वाली तीन दर्जन से अधिक लड़कियों के साथ वहां के शिक्षक और केयरटेकर वह सभी कुकर्म करते रहे जिनसे बचाने के लिए यह गृह सरकार ने बनाया है। पूणे के एक मदरसे में दर्जनों बच्चों का वहीं के शिक्षक लंबे समय से यौन उत्पीड़न कर रहे थे। ये घटनायें सिर्फ बानगी हैं। देश के अधिकतर राज्यों से इस तरह की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट को आधार मानें तो हर तीसरा बच्चा और हर दूसरी महिला यौन अपराध का शिकार होती है। वर्ष 2012 में भारत सरकार ने बाल सुरक्षा एक्ट और 2013 में कार्यस्थलों पर महिला यौन उत्पीड़न निरोधक एक्ट लागू किया। इन कानूनों के अस्तित्व में आने का मतलब यह नहीं है कि यौन अपराध के मामले रुक गये। मंत्रालय के अधीन किये गये सर्वे में यह चौकाने वाली बात सामने आई कि 95 फीसदी मामलों को रिपोर्ट ही नहीं किया जाता है।
हम अपने लोकतांत्रिक विधि से बने प्रतिनिधियों से उम्मीद करते हैं कि वह ऐसे मामलों में संजीदगी का परिचय देंगे और सहनुभूति रखेंगे मगर हो उलट रहा है। भाजपा के एक सांसद हरि ओम पांडेय ने ऐसे मामलों पर कड़े कदम की बात करने के बजाय अल्पसंख्यक समुदायों को इसके लिए दोषी ठहरा दिया। वह भूल गये कि एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक अधिकतर दोषी बहुसंख्यक समुदाय से ही हैं। दुख तब होता है जब बेटियों-बच्चों की सुरक्षा का दम भरने के बड़े बड़े भाषण देने वाले नेता दोषियों पर कार्रवाई के नाम पर सुस्त हो जाते हैं। भारत सरकार के डीओपीटी ने कार्यस्थलों पर यौन अपराध के मामले की जांच 30 दिनों में पूरी करके रिपोर्ट देने का नियम बनाया है। इस नियम के रहते भी 30 दिनों में कार्रवाई नहीं हो रही। दोषी को बचाव का पूरा मौका दिया जाता है और जिम्मेदार वरिष्ठ खामोश हैं।
मनोविशेषज्ञ मानते हैं कि अधिकतर मामलों में बच्चों और महिलाओं के परिजन उन्हें अनसुना करते हैं। वह तत्काल कार्रवाई के पक्ष में नहीं होते। दूसरी तरफ जहां महिलायें और बच्चे कानूनी कार्रवाई करते हैं, वहां पहले जांच में हीलाहवाली और फिर लंबी अदालती प्रक्रिया का वे शिकार होते हैं। देश की अदालतों में ऐसे 85 फीसदी मामले लंबित हैं। यौन अपराधों के बढ़ने का जब हम अध्यन करते हैं तो पता चलता है कि यह मानसिक विकृति का नतीजा है। हमारी सामाजिक व्यवस्था दोषपूर्ण है। हम अपने बच्चों को यौन शिक्षा देने में कतराते हैं। नैतिक शिक्षा को भुला चुके हैं और विद्यालयों में यह सिर्फ कागजी हो गया है। घर और समाज में भी संस्कारों का सृजन करने के बजाय धार्मिक चोला ओढ़ने का चलन अधिक हुआ है। इन हालात में हम एक अच्छे समाज और देश का निर्माण नहीं कर सकते। जरूरत यह है कि शिक्षा सिर्फ रोजगार के लिए न हो बल्कि ज्ञान और संस्कारों से जुड़ी हो। हम बच्चों को धर्म का लबादा न उढ़ायें बल्कि उन्हें आधुनिकता और वैज्ञानिक तरीके से संस्कारित करें। यह जिम्मा सेवानिवृत्त हो चुके समाज के लोगों पर डालें, जिससे उन्हें वरिष्ठ संरक्षक होने का अहसास भी रहे। जब यह सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर विकसित होगा और बच्चे बड़ों से सीखेंगे तब ही कुछ बेहतर हो सकेगा अन्यथा नहीं।
जय हिंद
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
ajay.shukla@itvnetwork.com

हिंदू पार्टी या मुस्लिम पार्टी?

पल्स- अजय शुक्ल
हिंदू पार्टी या मुस्लिम पार्टी?
भारतीय संस्कृति, धर्म और राजनीति तीनों का मूल आदिकाल से सभी को आत्मसात करने वाला रहा है। यही कारण है कि हम सबसे समृद्ध संस्कृति और धर्म के अवलंबी हैं। अंग्रेजी हुकूमत के आने के पहले भले ही मुस्लिम आक्रांताओं ने हमें लूटा हो मगर वो हमें विभाजित नहीं कर पाये। मुगल काल तक जाति व्यवस्था हमारे समाज की पोषक थी न कि शोषक। हालात विध्वंसक हो रहे हैं, न केवल समाज में बल्कि राजनीति में भी। सियासत जाति और धर्म के आधार पर बंट चुकी है। हर घर के पड़ोस में एक दुश्मन का घर नजर आने लगा है। परिवारों में भी विभाजन रेखा खिंच रही है। सच को अपने मुताबिक देखने और दिखाने का दौर तेजी से उभरा है। ऐसे में एक सप्ताह के दौरान हिंदू पार्टी और मुस्लिम पार्टी पर चर्चा तेज हो गई है।
विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में भारतीय धर्म संस्कृति को बेहतर तरीके से समझाया गया है। यह वेद स्पष्ट करता है कि प्रकृति ही ईश्वर है और उसके प्रति कृतज्ञ रहो। हम प्रकृति के साथ हमजोली करेंगे तो सदैव सुखी रहेंगे अन्यथा संकट आएंगे। यह ग्रंथ स्पष्ट करता है कि कोई भी व्यक्ति किसी वर्ण विशेष का पैदा नहीं होता बल्कि वह अपने संस्कारों द्वारा वर्ण का निर्माण करता है। इससे यह स्पष्ट है कि न कोई जाति और न कोई धर्म। जो अपनी जैसी प्रकृति बनाएगा, वही हो जाएगा। दुख तब होता है जब हमें धर्म का पाठ वो पढ़ाते हैं जो स्वयं उसका “कखग” नहीं जानते। यही देश की भी पीड़ा है। हम यह चर्चा क्यों कर रहे हैं? यह सवाल उठना लाजिमी है। बताते चलें कि 1858 में जब अंग्रेजी हुकूमत सत्ता में आई तब देश जाति प्रथा के जाल में फंस चुका था। आक्रांताओं की हुकूमत के दौरान सती प्रथा भी भयावह हो चुकी थी। देश सामाजिक क्रांति चाहता था। हालात का फायदा उठाकर अंग्रेजी हुकूमत ने हमें हर तरह से बांटकर अपनी सत्ता स्थापित की। हम आपस में ही लड़ते रहे। धर्म के नाम पर हिंदू-मुस्लिम के बीच गहरी खांई खींच दी गई और हमने पीढ़ियों के अपने भाई, धर्म के नाम पर खो दिये।
हमारे सामने चुनौती थी कि देश को न केवल अंग्रेजी हुकूमत से बल्कि जाति-धर्म की कट्टरता से भी निजात दिलाई जाये। लाखों शहादतों के बाद आजादी की लड़ाई परिणित के करीब पहुंची तो अंग्रेजी हुकूमत ने एक और खेल किया। पाकिस्तान की मांग करने वाले मुस्लिम लीग के सरपरस्त मोहम्मद अली जिन्ना से दावा कराया कि कांग्रेस हिन्दुओ की पार्टी है और इसलिए मुस्लिम लीग की अगुआई में पाकिस्तान बनना चाहिए। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि लोग अंग्रेजी हुकूमत की इस चाल को नहीं समझे और देश बंट गया। देश का तीसरा हिस्सा न हो, इसलिए भारत के नेताओं ने अपनी मूल संस्कृति के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता को अपनाने का फैसला किया। धर्मनिर्पेक्षता और सहिष्णुता को आत्मसात करके भारत जहां तेजी के साथ आगे बढ़ा, वहीं धार्मिक कट्टरता अपनाने वाला पाकिस्तान बरबादी के कगार पहुंच गया। धर्मनिर्पेक्षता हमारी ताकत बनी। 70 के दशक में हमारे देश में भी धार्मिक उन्माद फैलाया जाने लगा। नतीजतन देश में दंगे फसाद और आतंकवाद की शुरूआत हुई। बीते एक दशक में यह खेल सिर चढ़कर बोलने लगा है। अब विकास और समृद्धि नहीं बल्कि धार्मिक उन्माद पर चर्चा अधिक होती है। सियासी फायदे के लिए जाति धर्म के आधार पर दल बंटने लगे हैं।
कोई सियासी दल खुद को हिंदूवादी घोषित करके गर्व महसूस कर रहा है तो कोई मुस्लिम परस्ती दिखा रहा है। कोई पिछड़ी जातियों का दल बन चुका है तो कोई दलित समुदाय की जातियों के सरपरस्त। इन सब के बीच देश, समाज और विकास की बात करने वाले नागरिक बेचारे हो गये हैं।11 जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ बैठक कर उनके सामाजिक और सियासी मुद्दों पर चर्चा क्या की, हिंदूवादी पार्टी के समर्थक एक उर्दू अखबार ने कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी शीर्षक से खबर छाप दी। सच जाने बिना ही आरोपों-प्रत्यारोपों का सियासी दौर शुरू हो गया। सत्य यह है कि कौन हिंदू, कौन मुसलमान परस्त है? यह वो लोग भी नहीं जानते जो इन दलों का इस आधार पर समर्थन करते हैं।

हम बारीकी से समीक्षा करें तो मुसलमान कांग्रेस पर सवाल उठाते हैं और हिंदू भाजपा पर। जो जातिविहीन राजनीति की बात करते थे, वह जाति के आधार पर देश के वरिष्ठ पदों पर अयोग्य लोगों को बैठाने से गुरेज नहीं करते। देश को विकास की जरूरत है। देश को समृद्धि की जरूरत है। युवाओं से भरे इस देश को भारी तादाद में सुयोग्य रोजगार की जरूरत है। देश के लोगों में उत्पादकता भरने की जरूरत है। देश को न हिंदू सियासी दल चाहिए और न मुस्लिम परस्त। देश को दोनों समुदाय के लोगों में सेतु बनाकर उनका उपयोग विकास और समृधि के लिए करने वाला दल चाहिए।
जय हिंद।
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
ajay.shukla@itvnetwork.com

शेयर बाजार ही समृद्ध अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं

पल्स- अजय शुक्ल
शेयर बाजार ही समृद्ध अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं 
शेयर बाजार ने वीरवार को अचानक तेजी का रुख पकड़ा और रिकार्ड ऊंचाइयों पर जा पहुंचा। यह अनायास नहीं था बल्कि विकास दर सूचकांकों के संकेत और देश की विकास दर के बारे में विश्व बैंक समेत दुनिया भर की वित्तीय संस्थाओं के अनुमान की रिपोर्ट थी। इस रिपोर्ट में भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और उसने फ्रांस जैसे समृद्ध यूरोपीय राष्ट्र को पछाड़ दिया। यह खबर सुखद और उत्साहवर्धक रही जिसने शेयर बाजार में उछाल ला दिया। निश्चित रूप से जो आर्थिक सुधार जीएसटी और आयकर कानूनों को लेकर किये गये हैं, उनसे अर्थव्यवस्था को फायदा होना तय है। यह फायदा कितना और कितने वक्त के लिए होगा, यह सवालों में है। विकास दर बढ़ाने को लेकर आंकड़ों का जो खेल देश के नौकरशाहों और सियासी गठजोड़ ने किया है वह समद्धि कारक नहीं है क्योंकि इससे आधार मजबूत नहीं होता। 
माना जाता है कि लोग व्यापार जगत के तात्कालिक मूड को तो भांप सकते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था की बढ़त को नहीं नापा जा सकता। शेयर बाजार अचानक ऊंचाइयां छूता है और धड़ाम हो जाता है। इनकी बुलंदी और गिरावट, दोनों क्षणभंगुर होती है, जबतक कि कोई बड़ा मजबूत आधार न हो। यह बाजार जिन उम्मीदों को सोचकर चढ़ता है, कुछ हल्का हुआ तो आशंकाओं में तेजी से गिरता भी है। वीरवार को बाजार जिस अर्थव्यवस्था की बढ़ती गति को लेकर आशांन्वित हुआ है, उसका आधार मजबूत नहीं है। कृतिम और उम्मीदों के टूटने का असर क्या होता है? हमारी अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है और दिशा सकारात्मक है। जीएसटी एक अच्छा उपाय है मगर उसका क्रियान्वयन सुरक्षित और सभी को साथ समेटने वाला होना चाहिए, जो नहीं दिख रहा। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में बताया है कि अधिक “कर” की बजाय कम “कर” अधिक लोगों पर लगाने से चोरी रुकती है और राजस्व बढ़ता है। सच तो यह है कि लोगों ने कर चोरी के दूसरे रास्ते तलाश लिए हैं। 
देश को जुगाली की नहीं बल्कि मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए भौतिक तौर पर काम करने की जरूरत है। हालात यह हैं कि हम वातानुकूलित कमरों में बैठकर सामाजिक सुरक्षा विहीन राष्ट्र के नागरिकों पर “राजस्व” का भार डालने की नीति तैयार करते हैं। इससे हमें सफलतायें नहीं बल्कि असफलतायें हाथ लगती हैं। अर्थव्यवस्था शेयर बाजार नहीं है। यह कुछ बड़े पूंजीपतियों के समूह का खेल अधिक है। इसके वनस्पति अर्थव्यवस्था अधिक स्थिर गति से बढ़ती या नीचे आती है। इसका आंकलन रोजाना नहीं किया जा सकता है। यह आशंकाओं या सिर्फ उम्मीदों पर खड़ी नहीं होती है। हमारे नीति नियंताओं और आर्थिक ढांचे से जुड़े लोगों को चाहिए कि वो शेयर बाजार के बजाय मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने के लिए उसके मूल आधार पर ध्यान दें। हमारे राज्य कर्जों में दबे हैं। नौकरियां खत्म हो रही हैं। वेतन वक्त पर नहीं मिल पा रहा। जनसुविधायें कर्ज लेकर जुटाई जा रही हैं। ये हालात देश के लिए ठीक नहीं हैं। 
अगर हम शेयर बाजार के इतिहास पर निगाह डालें तो पाएंगे कि इसमें एकरूपता या स्थायित्व का भाव कभी नहीं रहा। इसका उतार चढ़ाव भी कई बार अजब कारणों से हुआ। ऐसा माना जाता है कि विश्व का पहला शेयर बाजार बेल्जियम के एंटवर्प शहर में 1531 में बना था। इस बाजार में एकत्र व्यापारी कोमोडिटीज में सट्टा लगाते थे। विश्व का पहला स्टॉक एक्सचेंज 1602 में एमस्टरडम में बना। आज विश्व के शेयर बाजार को दिशा देने वाला न्यूयार्क स्टाक एक्सचेंज भी 18वीं सदी में अस्तित्व में आया था। भारत में शेयर बाजार का जन्म 1850 में मुंबई में एक बरगद के पेड़ के नीचे हुआ जो बाद में दलाल स्ट्रीट के रूप में 1875 में संगठित होकर तैयार हुआ। इस बाजार की अनिश्चितता और उम्मीद का ही नतीजा है कि निवेशक अपने धन को लेकर चिंतित रहते हैं। इसके लिए वो स्ट्रेटजी प्लानर्स की मदद भी लेते हैं, बावजूद इसके कोई यह नहीं कह सकता कि उसकी स्ट्रेटजी सदैव सफल रही। अधिकतर इस बाजार में नया निवेशक अपना धन गंवाकर जाता है। पूंजी बाजार का खेल बड़ी कंपनियों और सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। इसके बाद वैश्विक चिंताओं में बाजार गिरता-बढ़ता भी है। 
अभी मानसून सत्र शुरुआती दौर में है। कंपनियों की पहली तिमाही के नतीजे भी अच्छी उम्मीद जगा रहे हैं। ईरान ने भारत को उदार शर्तों पर कच्चा तेल देने का वादा किया है। इन सब का नतीजा वीरवार को शेयर बाजार में दिखा और 30 शेयरों वाला संवेदनशील सूचकांक पौन घंटे में ही ऐतिहासिक बुलंदी पर था। इससे साफ है कि उद्योग जगत खासा आशान्वित है। शेयर बाजार को सूक्ष्ता से देखें तो वीरवार को मुंबई शेयर बाजार के ही 50 शेयरों वाले संवेदनशील सूचकांक की निगेटिव स्थिति थी जबकि 30 शेयरों वाले सूचकांक में बढ़त। यह तब है जब शेयर बाजार बुलंदियों पर था। इससे यह समझा जा सकता है कि शेयर बाजार इस समय काफी उम्मीदें बांध रहा है, लेकिन सभी के लिए नहीं। जो बड़ी, महत्वपूर्ण व प्रतिनिधि कंपनियां हैं, वे इस समय लबरेज हैं जबकि दूसरा पहलू यह है कि बाजार की तेजी कुछ कंपनियों का खेल अधिक है स्थायित्व कम। हमें बाजार की तेजी नहीं अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ की आवश्यकता है। 
जय हिंद। 
(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)
ajay.shukla@itvnetwork.com

किसानों के आधार को मजबूत करे सरकार

पल्स : अजय शुक्ल

किसानों के आधार को मजबूत करे सरकार

केंद्र सरकार ने किसानों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए उसकी उपज का वाजिब मूल्य दिलाने की पहल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाकर की है। यह देर से उठाया गया एक सही कदम है मगर इसे चुनावी प्रलोभन के तौर पर देखा जा रहा है। अच्छा होता कि सरकार बनते ही इस दिशा में काम किया जाता क्योंकि स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करवाने को लेकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार को भाजपा पिछले कई सालों से घेरती चली आ रही थी। सरकार को इसके लिए व्यवस्था करनी थी न कि कोई अन्य रिपोर्ट बनवानी थी, दुर्भाग्य से ऐसा नहीं किया गया। अब तक स्वामीनाथन रिपोर्ट जीन में बंद है और उसे लागू करवाने की लड़ाई लड़ने वाले खामोश सत्ता का सुख भोग रहे हैं।

हमारे देश में औसतन हर साल 12 हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर लेते हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अपनी किरकिरी से बचने के लिए 2016 से केंद्र सरकार ने किसानों की आत्महत्या का डाटा तैयार करना बंद कर दिया। यह बात संसद में किसानों की आत्महत्या और दिन ब दिन बिगड़ती हालत को लेकर पूछे गये एक सवाल के जवाब मे बताई गई। सरकार ने यह भी माना कि जो सर्वे विभिन्न संगठनों ने किये हैं उनके मुताबिक रोजाना करीब ढाई हजार किसान कृषि व्यवसाय को छोड़ रहे हैं। इसके पीछे एक नही बल्कि कई कारण हैं। केद्र सरकार ने किसानों से वादा किया था कि वह उनकी आय दोगुनी कर देंगे। सरकार ने उस दिशा में कदम आगे बढ़ाये हैं मगर यह भी सच है कि किसान की उपज की लागत भी 2014 के मुकाबले चार साल में दोगुनी हो चुकी है और 2022 आते आते चार गुनी हो जाएगी। इससे किसान की हालत सुधरने के बजाय बिगड़ना तय है।

हम आगरा क्षेत्र के आलू किसानों से मिलने निकले तो दुखद हालात सामने आये जिनका जिक्र करना चाहूंगा। राज्य सरकार ने जो एमएसपी तय किया था, उस पर किसी भी सरकारी खरीद केंद्र में कोई खरीददारी नहीं हुई। किसानों को किसी न किसी बहाने उनके उत्पाद के लिए नीचा जरूर दिखाया गया। किसान नेता कप्तान सिंह चाहर और धर्मपाल सिंह से इस दौरान मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा कि सरकार के सिर्फ एमएसपी तय कर देने मात्र से कुछ नहीं होने वाला। सरकारी मुलाजिम तभी उत्पाद खरीदते हैं जब उनको फायदा होता है। मजबूरन किसान को आढ़ती और दलालों का सहारा लेने पड़ता है। कोल्ड स्टोर संचालक अतुल गुप्ता कहते हैं कि उनका स्टोर आलू से पटा है मगर किसान माल उठाने नहीं आ रहा क्योंकि किराया इतना हो चुका है कि उसको आलू की कीमत नहीं मिल सकती। ऐसे में हमें आलू रखवाई और ढुलाई का खर्च अपने पल्ले से देना पड़ रहा है। मजबूरन हम भी कोल्ड स्टोर बंद करने पर विचार कर रहे हैं।

समस्या कहां है? यह एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है। असल में जरूरत किसानों की मूल दशा को सुधारने की है। उन्हें अनुदान देने के बजाय उनके लिए संसाधनों का मूलभूत ढांचा तैयार करने की आवश्यकता है। आज भी देश की 50 फीसदी से अधिक आबादी कृषि के व्यवसाय से जुड़ी है। उसकी उपज की कीमत दिलाने के लिए सरकार ने 15 हजार करोड़ की व्यवस्था की जो ऊंट के मुंह में जीरा है। अगर सरकार कृषि को नियोजित तरीके से करने और उत्पाद के लिए बाजार गांव में ही उपलब्ध कराने की व्यवस्था करे तो अनुदान और मदद की जरूरत ही नहीं रहेगी। वक्त पर किसान को बीज, उर्वरक और कीटनाशक पंचायत स्तर पर ही उपलब्ध हो जायें। सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी सहित जिला अधिकारी की एसीआर में इसका जिक्र करने की व्यवस्था हो तभी बात बनेगी। उनकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर कृषि उत्पाद के उठान और उसके बाजारी मूल्य का भुगतान करवाने के लिए कारपोरेट स्तर पर सामंजस्य बनाया जाये। किसान के खेत पर ही उत्पादन सामग्री और उत्पाद का बाजार मिले। किसान की मजदूरी, डीजल, बिजली और सिंचाई की लागत के बाद क्या फायदा दिया जा सकता है यह तय करते हुए दाम मिलें। दो रुपये का आलू खरीदकर 10 रुपये में बेचने वाले बिचौलियों की बजाय पांच रुपये का आलू सरकारी-कारपोरेट गठजोड़ के जरिए खरीदा जाये। अगर ऐसा होगा तो न किसान भिखारी रहेगा और न बिचौलिया मालामाल। किसान से लेकर उपभोक्ता तक सभी फायदे में होंगे। सरकार जब हमसे किसान सेस वसूल रही है तो उस धन से किसान को मुफ्त में बीज, सिंचाई, खाद और बाजार उपलब्ध करवा सकती है। उपज से सरकार और कंपनियां फायदा उठा सकती हैं जो उनकी आय बढ़ाने वाला होगा। कृषि बीमा की फीस सरकार उस फायदे से अदा करे जो वह कृषि से कमाये। जब तक ऐसा नहीं होगा किसान की दशा नहीं सुधरेगी। एमएसपी सिर्फ चुनावी स्टंट ही समझे जाएंगे। जरूरत है कि सही दिशा में सार्थक कदम तत्काल बढ़ाये जायें, न कि किसान को भिखारी बनाकर भीख देने के चुनावी खेल खेले जायें। किसानी सम्मान का व्यवसाय बने न कि दुखद कहानी।
जय हिंद।

देश की सीमा से बड़ी है मानवता

पल्स- अजय शुक्ल

देश की सीमा से बड़ी है मानवता
हमारी धर्म-संस्कृति हो या संस्कार सभी में यह स्पष्ट है कि मानवता किसी भी देश की सीमा से बड़ी होती है। हम इसे सदैव आत्मसात करके ही समृद्ध और विजयी हुए हैं। हमारी सहिष्णुता और ज्ञान ने ही हमें विश्व गुरू की उपाधि दिलाई थी। हम शरणागत को न केवल ससम्मान स्थान देते हैं बल्कि उनके संघर्ष में भी साथी बनते रहे हैं। हम संकुचित सोच के लोग नहीं थे। हम वैश्विक बुद्धि विद्या से युक्त देश के नागरिक हैं। बीते कुछ सालों से जिस तरह संकुचित विचारधाराओं वाली सोच हमारे देश में पनपी है, वह दुखद है क्योंकि हम सीमाओं से परे मानवता के दुख दर्द बांटने वाले लोग रहे हैं। यह चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि नागरिकता रजिस्टर की राजनीति देश में चल रही है। निश्चित रूप से किसी देश में वहां के नागरिकों का ही बड़ा हक होता है। यह भी सच है कि शरणागत या विपत्ति का मारा अगर हमारे यहां आता है तो उसे मौका देते हैं कि वह अपना जीवन सुधार सके।
यह उचित है कि तुष्टीकरण की सियासत नहीं होनी चाहिए। तुष्टीकरण जाति, धर्म और क्षेत्र किसी भी तरह का हो सकता है। जैसा कि केंद्र सरकार ने बताया कि हमारे देश में कुछ लाख बांग्लादेशी परिवार अवैध तरीके से रह रहे हैं। अगर यह प्रमाणित है तब भी हमें दो बातें जरूर सोचनी चाहिए, पहली कि बांग्लादेश कभी हमारे देश का हिस्सा था और दूसरा कि वहां के नागरिक भी हमारे ही नश्ली भाई हैं। हम जब वृहद भारतवर्ष की बात करते हैं तो भूल जाते हैं कि बर्मा से लेकर बलूचिस्तान तक हमारी सीमाएं थीं। इस कथित अवैध आबादी को देश से खदेड़ने की जब हम बात करते हैं तो यह भी भूल जाते हैं कि संपूर्ण मानव जाति कभी न कभी किसी न किसी राज्य देश सीमा में अवैध रूप से ही पहुंची है। इस आबादी ने एक कालखंड में अगर हमारे देश में आश्रय लिया है तो उसने अपनी श्रमशक्ति भी दी है। इस श्रम ने देश को आगे ले जाने में मदद की है।
हाल के दिनों में हमने रोहिंग्या की बदतर हालत को देखा है। नन्हें बच्चों को भी मरते देखा है। हमारे देश का संविधान कहता है कि जिसका जन्म भारत देश की सीमा में हुआ है वह भारतीय है। कारण स्पष्ट है कि जन्म लेने वाले का यह दोष नहीं होता कि वह किस देश की सीमा में पैदा हो रहा है। यह दोष उनके माता-पिता का है कि वह कहीं के वैध नागरिक हैं या अवैध। निश्चित रूप से भारत देश की आबादी विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी है। ऐसे में यहां चिंतन का विषय है कि आबादी को संयमित किया जाये। विज्ञान के अनुसार मानवजाति का उद्भव दो लाख वर्ष पहले जब अफ्रीका में हुआ था तब उसे यह ज्ञात नहीं था कि कहां और कैसे जाना है। एक लाख वर्ष तक मानव सिर्फ अफ्रीका में भटकता रहा। धीरे-धीरे उसने बाहर निकलना सीखा। कुछ हजार वर्ष पहले मानवजाति भारत पहुंची। यहां की जलवायु मुफीद होने के कारण आबादी तेजी से बढ़ी और विभिन्न देशों और संस्कृति के लोग यहां आते गये। हमने किसी को खदेड़ा नहीं बल्कि उन्हें अपनाया, जिससे हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति की विशेषता विविधता में एकता की बनी।
निश्चित रूप से यह उचित है कि किसी भी देश में उसके विधिक नागरिक ही निवास करें। इसके बावजूद मानवता सर्वश्रेष्ठ है। हमें अब कोशिश करनी चाहिए कि न केवल हमारी आबादी नियंत्रित हो बल्कि बाहर से आने वालों की संख्या कम हो। जो लोग कई दशकों या सदियों से यहां रह रहे हैं, उनके लिए कोई मानवता के अनुकूल व्यवस्था की जाये। अगर उनके मूल देश अब उन्हें लेने को तैयार नहीं हैं तो ऐसे लोगों की कालोनियां विकसित कर उन्हें श्रमशक्ति के रूप में इस्तेमाल किया जाये, जिससे देश की उत्पादकता में वृद्धि हो। हम किसी भी मानव को असहाय नहीं छोड़ सकते। यह हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। मनुष्यता और सभ्य राष्ट्र की यही एक शाश्वत पूंजी है। कोई भी विनाशात्मक कार्य न कर रक्षात्मक एवं रचनात्मक कार्य करने के लिए जुटना ही भारतीय सभ्यता रही है। प्रत्येक व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिये कटिबद्ध हो जाए, तो निश्चय ही हमारे परिवार, मुहल्ले, प्रान्त, देश और विश्व से पशुता, बर्बरता एवं भ्रष्टाचार का अंत हो सकता है।
देशभक्ति और राष्ट्र की सीमाएं किसी भी देश के लिए जरूरी हैं। वहां के नागरिकों का सहिष्णु और उत्पादक होना उससे भी अधिक जरूरी है। इन सब के बीच एक और चीज जरूरी है कि स्वार्थ के स्थान पर दूसरों के गुणों के प्रीति सम्मान, गुण ग्रहीता, को विकसित किया जाये। हम दूसरों के उन्नत गुणों को आत्मसात करें और उनके सद्गुणों की प्रशंसा तो मित्र-बन्धुत्व का भाव उत्पन्न होगा। ऐसा होने पर वैश्विक प्रेम पनपेगा और समाज शत्रुभाव से मुक्त होगा। यह पाठ हमें वैदिक सनातन धर्म में सीखने को मिलता है। जब हम अखंड भारत की उम्मीद करते हैं तो हमें यह पाठ जरूर अपनाना चाहिए न कि देश के नाम की संकुचित मानसिकता से ग्रसित होना चाहिए। अतः जरूरत है कि हम राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के नाम पर दशकों से भारत में रह रहे लोगों को निकालने के बजाय उनके जीवन को सुव्यवस्थित करने के विकल्प तलाशें, जिससे मानवता का कत्ल न हो और राष्ट्रीय भावना भी मजबूत हो।

जय हिंद।

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

ajay.shukla@itvnetwork.com